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एक नहीं दो बार हुआ था भारत-पाक का बंटवारा, क्यों 14 साल बाद फिर से हुई थी गांवों की अदला-बदली

India-Pakistan का बंटवारा 15 अगस्त, 1947 को हुआ था. ब्रिटिश गुलामी से आजादी के इस दिन के 14 साल बाद दोनों देश एक बार फिर बंटवारे की मेज पर बैठे थे, लेकिन इसका एक खास कारण था. चलिए आपको इस बारे में बताते हैं.

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एक नहीं दो बार हुआ था भारत-पाक का बंटवारा, क्यों 14 साल बाद फिर से हुई थी गांवों की अदला-बदली
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India-Pakistan Partition: भारत और पाकिस्तान का बंटवारा कब हुआ था? यदि आपसे कोई ये सवाल पूछे तो आप एकदम कहेंगे कि 15 अगस्त, 1947 को देश को ब्रिटिश गुलामी से मिली आजादी के साथ ही बंटवारे का दर्द भी सामने आया था. लेकिन हम आपको कहें कि इसके बाद भी एक बार हमारे देश को पाकिस्तान के साथ अपनी जमीन बांटने के लिए मजबूर होना पड़ा है तो शायद आप हैरान हो जाएंगे. यदि आप इस बारे में नहीं जानते हैं तो चलिए हम आपको वो कारण बताते हैं, जिसके चलते 14 साल बाद एक बार फिर भारत-पाकिस्तान के नेता बंटवारे की टेबल पर आमने-सामने बैठे थे. इस बार हुए लेनदेन में भारत ने एक गांव लेने के बदले पाकिस्तान को 12 गांव दे दिए थे. 

देश के शहीदों की याद को वापस लेने के लिए हुआ था बंटवारा
भारत ने साल 1961 में पाकिस्तान के साथ दोबारा बंटवारा महज एक गांव 'हुसैनीवाला' को अपने पास लाने के लिए किया था. मुस्लिम सूफी संत के नाम पर बसे इस गांव का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से खास नाता था और यहां देश के शहीदों की अमर यादें बसी हैं. वर्तमान में हुसैनीवाला गांव पंजाब के फिरोजपुर जिले का हिस्सा है, जहां भारत-पाकिस्तान के बीच हुसैनीवाला बॉर्डर पोस्ट से आवागमन भी होता है. यहां भी अटारी-वाघा बॉर्डर की तरह बीटिंग रिट्रीट का आयोजन किया जाता है. सतलुज नदी के किनारे मौजूद इस गांव के ठीक सामने पाकिस्तान के कसूरज जिले का गांव गंदा सिंह वाला मौजूद है.

स्वतंत्रता संग्राम से यह है हुसैनीवाला गांव का खास नाता
हुसैनीवाला गांव में ही देश के अमर शहीदों भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की समाधि बनी हुई है, जिन्हें अंग्रेजों ने 23 मार्च, 1931 को चुपके से लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी थी. लाहौर जेल के बाहर इन तीनों वीर शहीदों को अंतिम विदाई देने के लिए हजारों लोगों की भीड़ जुट गई थी. अंग्रेजों को यह डर हुआ कि यह भीड़ जेल तोड़कर कहीं तीनों स्वतंत्रता सेनानियों को छुड़ा ना ले जाए. इस कारण 24 मार्च की तय तारीख से एक दिन पहले ही तीनों को फांसी दे दी गई थी. इसके बाद अंग्रेज जेल की दीवार तोड़कर उनके शव चुपके से हुसैनीवाला गांव ले गए और वहां अंतिम संस्कार करने लगे. इस दौरान लोगों को इसकी खबर लग गई तो सारी भीड़ हुसैनीवाला पहुंच गई. भीड़ को देखकर अंग्रेज शवों को अधजला छोड़कर ही फरार हो गए. इसके बाद ग्रामीणों ने तीनों शहीदों के शवों का पूरे सम्मान के साथ सही तरीके से अंतिम संस्कार किया और वहीं उनकी समाधि बनाई थी.

hussainiwala

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किया था अयूब खान से आग्रह
हुसैनीवाला गांव 1947 के बंटवारे में पाकिस्तान के हिस्से में आए पंजाब में चला गया था. कुछ साल बाद देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को शहीदों के परिजनों और अन्य लोगों ने इसकी याद दिलाई. इसके बाद पंडित नेहरू ने पाकिस्तान के तानाशाह जनरल अयूब खान को चिट्ठियां लिखकर यह गांव भारत को देने का आग्रह किया. बदले में उन्होंने फजिल्का बॉर्डर से सटे 12 भारतीय गांव पाकिस्तान को देने की पेशकश की. इसके बाद दोनों देशों ने आपसी सहमति से ये गांव बांट लिए थे. इस तरह हुसैनीवाला गांव भारत को मिल गया था. भगत सिंह के साथ दिल्ली असेंबली में 1929 में बम फेंकने वाले क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त का अंतिम संस्कार भी 1965 में उनका देहांत होने पर हुसैनीवाला में ही किया गया था. भगत सिंह की मां विद्यावती देवी का निधन भी 1975 में इसी गांव में किया गया. यहां 23 मार्च को शहीदी मेला और 14 अप्रैल को बहुत बड़ा बैसाखी मेला भी लगाया जाता है.

पहले यहीं से होकर पेशावर तक जाती थी ट्रेन
हुसैनीवाला में रेलवे स्टेशन भी मौजूद है, लेकिन यहां कोई भी ट्रेन नहीं जाती है. बंटवारे से पहले मुंबई से पेशावर तक चलने वाली पंजाब मेल यहीं से होकर जाती थी. हुसैनीवाला की रेलवे लाइन फिरोजपुर को लाहौर से जोड़ती थी, जिसमें सतलुज नदी पर दिल्ली के लोहे के पुल जैसी ही पुल बनाकर पटरी गुजारी गई थी. देश के बंटवारे के बाद यह रेलवे लाइन बंद कर दी गई थी. अब साल में दो बार 23 मार्च व 14 अप्रैल को मेले के कारण फिरोजपुर कैंट स्टेशन से हुसैनीवाला तक स्पेशल ट्रेन चलाई जाती है.

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