डीएनए एक्सप्लेनर
BRICS Digital Currency Payments Impact on Indian Market: ब्रिक्स देशों में स्थानीय करेंसी में कारोबार और सीमा-पार पेमेंट बढ़ाने की कोशिश तेज हो रही है. अगर डॉलर पर निर्भरता घटती है तो भारत के रुपये, पेट्रोल, सोना, शेयर बाजार और आम आदमी की खरीदारी पर असर पड़ सकता है, लेकिन बदलाव तुरंत नहीं होगा.
सोचिए, भारत को रूस से तेल खरीदना है और इसके लिए हर बार डॉलर की जरूरत ही न पड़े. भुगतान रुपये, रूबल या किसी दूसरे स्थानीय करेंसी सिस्टम के जरिए हो सके. पहली नजर में यह बदलाव सिर्फ बड़े देशों और सरकारों का मामला लगता है, लेकिन इसका असर आगे चलकर पेट्रोल की कीमत, रुपये की चाल, सोने के भाव और शेयर बाजार तक पहुंच सकता है.
यही वजह है कि इस समय ब्रिक्स की स्थानीय करेंसी और सीमा-पार भुगतान व्यवस्था पर हो रही चर्चा महत्वपूर्ण है. 2024 की कजान घोषणा में ब्रिक्स देशों ने स्थानीय करेंसी में वित्तीय लेनदेन और सीमा-पार भुगतान व्यवस्था को आगे बढ़ाने का समर्थन किया था. 2025 की रियो घोषणा में भी सीमा-पार पेमेंट सिस्टम को ज्यादा तेज, कम लागत वाला और आपस में जुड़ा बनाने पर काम जारी रखने की बात कही गई थी.
लेकिन यहां सबसे बड़ा भ्रम भी दूर करना जरूरी है. इसका मतलब यह नहीं है कि ब्रिक्स ने डॉलर को हटाकर अपनी एक नई करेंसी लॉन्च कर दी है. भारत भी फिलहाल ऐसी किसी साझा ब्रिक्स करेंसी की बजाय स्थानीय करेंसी और अलग-अलग पेमेंट सिस्टम को जोड़ने पर ज्यादा जोर दे रहा है. रॉयटर्स के मुताबिक भारत ब्रिक्स देशों की डिजिटल करेंसी यानी केंद्रीय बैंक की डिजिटल करेंसी को जोड़ने का प्रस्ताव आगे बढ़ा रहा है, जिसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय लेनदेन को आसान बनाना है, न कि डॉलर को तुरंत रिजर्व करेंसी की जगह से हटाना.
अगर भारत और उसके बड़े व्यापारिक साझेदार स्थानीय करेंसी में ज्यादा कारोबार करने लगते हैं तो कुछ लेनदेन में डॉलर की जरूरत कम हो सकती है. इसका मतलब है कि हर व्यापार के लिए पहले रुपये को डॉलर और फिर डॉलर को दूसरी करेंसी में बदलने की जरूरत कम हो सकती है.
भारत के लिए इसका सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि कुछ द्विपक्षीय कारोबार में मुद्रा बदलने की लागत और डॉलर की उपलब्धता पर निर्भरता घटे. भारत और रूस के बीच पहले से ही स्थानीय करेंसी में भुगतान के प्रयोग हो रहे हैं. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार भारत रूसी कच्चे तेल के भुगतान में अपनी करेंसी का इस्तेमाल बढ़ा रहा है, लेकिन यहां एक बड़ी परेशानी व्यापार संतुलन की है. रूस भारत से उतना सामान नहीं खरीदता जितना भारत रूस से खरीदता है, इसलिए बड़ी मात्रा में रुपये रूस के पास जमा होने की समस्या पैदा हो सकती है.
यानी स्थानीय करेंसी का इस्तेमाल अपने आप रुपये को मजबूत नहीं कर देगा. रुपये की कीमत पर तेल का भाव, विदेशी निवेश, व्यापार घाटा, अमेरिकी ब्याज दरें और डॉलर की वैश्विक मांग जैसे कई दूसरे कारक भी असर डालते हैं.
डॉलर की भूमिका को कम करना आसान नहीं है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के 2026 की पहली तिमाही के आंकड़ों के अनुसार दुनिया के आधिकारिक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी 57.13 प्रतिशत थी. 2025 की चौथी तिमाही में यह 56.42 प्रतिशत थी. यानी डॉलर की हिस्सेदारी में उतार-चढ़ाव जरूर है, लेकिन वह अभी भी वैश्विक रिजर्व का सबसे बड़ा हिस्सा है.
इसलिए ब्रिक्स की कोशिश को डॉलर के अचानक अंत के तौर पर देखना गलत होगा. ज्यादा सही तस्वीर यह है कि कई देश अपने अंतरराष्ट्रीय भुगतान में विकल्प बढ़ाना चाहते हैं ताकि किसी एक करेंसी और वित्तीय सिस्टम पर पूरी तरह निर्भर न रहना पड़े.
यह सवाल सबसे ज्यादा आम आदमी की जेब से जुड़ा है. अगर ब्रिक्स देशों में स्थानीय करेंसी में तेल का कारोबार बढ़ता है तो क्या पेट्रोल और डीजल तुरंत सस्ता हो जाएगा. जवाब है नहीं.
कच्चे तेल की वैश्विक कीमत और भारत में पेट्रोल की खुदरा कीमत दो अलग चीजें हैं. तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत, रुपये की विनिमय दर, रिफाइनिंग लागत, टैक्स, डीलर मार्जिन और दूसरे खर्च पेट्रोल की कीमत को प्रभावित करते हैं.
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुसार ब्रेंट जैसे प्रमुख कच्चे तेल के सौदे आम तौर पर अमेरिकी डॉलर में तय होते हैं. इसलिए रुपये की कमजोरी भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए तेल की लागत बढ़ा सकती है.
इसका ताजा उदाहरण भी सामने है. 11 सितंबर 2026 को ब्रेंट कच्चा तेल करीब 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा और तेल की महंगाई तथा अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के दबाव के बीच रुपया 95.79 तक कमजोर हुआ, जिसके बाद करीब 95.71 पर कारोबार कर रहा था. रॉयटर्स के मुताबिक भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपये को सहारा देने के लिए बाजार में हस्तक्षेप भी किया.
इसलिए अगर भविष्य में स्थानीय करेंसी में तेल का भुगतान बढ़ता है तो भारत को कुछ लेनदेन में डॉलर की जरूरत कम होने का फायदा मिल सकता है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमत अगर बहुत बढ़ गई तो सिर्फ करेंसी बदलने से पेट्रोल सस्ता नहीं हो जाएगा.
डॉलर से दूरी बढ़ने की चर्चा में सोना शायद सबसे दिलचस्प कड़ी है. दुनिया के केंद्रीय बैंक पिछले कुछ सालों से अपने रिजर्व में सोने की भूमिका बढ़ा रहे हैं. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के 2026 सर्वे में 89 प्रतिशत रिजर्व मैनेजरों ने कहा कि अगले 12 महीनों में वैश्विक केंद्रीय बैंक गोल्ड होल्डिंग बढ़ा सकते हैं. 45 प्रतिशत ने अपने संस्थान की गोल्ड होल्डिंग बढ़ाने की उम्मीद जताई. वहीं 74 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना कि अगले पांच वर्षों में वैश्विक रिजर्व में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी मध्यम या काफी कम हो सकती है.
यहां एक महत्वपूर्ण छिपा हुआ एंगल है. अगर देश अपने रिजर्व में डॉलर की निर्भरता कम करते हैं और सोने को ज्यादा रणनीतिक रिजर्व एसेट मानते हैं तो सोने की वैश्विक मांग को लंबे समय में सपोर्ट मिल सकता है. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार 2026 की दूसरी तिमाही में केंद्रीय बैंकों ने 289 टन सोना खरीदा, जो पहली तिमाही के संशोधित 57 टन से काफी ज्यादा था. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि ब्रिक्स की हर स्थानीय करेंसी वाली डील से भारत में सोना उसी दिन महंगा हो जाएगा. सोने की कीमत पर डॉलर, वैश्विक ब्याज दरें, भू-राजनीतिक तनाव, निवेश मांग और केंद्रीय बैंक की खरीद सभी असर डालते हैं.
शेयर बाजार में असर सीधा नहीं बल्कि सेक्टर के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है. अगर स्थानीय करेंसी में कारोबार बढ़ने से डॉलर की उपलब्धता और मुद्रा बदलने की लागत पर कुछ दबाव कम होता है तो आयात पर निर्भर कंपनियों को फायदा मिल सकता है.
दूसरी तरफ अगर डॉलर कमजोर होता है लेकिन वैश्विक पूंजी का रुख भारत से हटता है तो शेयर बाजार पर दबाव भी आ सकता है. इसलिए यह मान लेना कि डॉलर की निर्भरता कम होते ही सेंसेक्स और निफ्टी उछल जाएंगे, सही नहीं होगा.
बैंकों, तेल कंपनियों, आयातकों, निर्यातकों और उन कंपनियों पर असर अलग हो सकता है जिनकी कमाई डॉलर में होती है. उदाहरण के लिए डॉलर के मुकाबले रुपया मजबूत होता है तो विदेश से कच्चा माल खरीदने वाली कंपनियों की लागत को राहत मिल सकती है, जबकि डॉलर में कमाई करने वाले निर्यातकों के लिए तस्वीर अलग हो सकती है.
इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा फायदा शायद पेट्रोल के तुरंत सस्ता होने में नहीं बल्कि विकल्प बढ़ने में है. अगर भारत रूस, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान, चीन और दूसरे ब्रिक्स साझेदारों के साथ ज्यादा स्थानीय करेंसी में कारोबार कर पाता है तो अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए डॉलर पर निर्भरता कुछ हिस्सों में कम की जा सकती है. इससे भारत को किसी एक भुगतान व्यवस्था पर पूरी तरह निर्भर रहने की जरूरत कम होगी.
ब्रिक्स की मौजूदा चर्चा में भारत का रुख भी इसी दिशा में दिखाई दे रहा है. 11 सितंबर 2026 को वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने ब्रिक्स देशों के बीच पेमेंट सिस्टम जोड़ने और एक-दूसरे की स्थानीय करेंसी में व्यापार को बढ़ावा देने की बात कही.
लेकिन सबसे बड़ी चुनौती व्यापार संतुलन है. अगर भारत किसी देश से बहुत ज्यादा माल खरीदता है और बदले में उतना माल नहीं बेचता, तो स्थानीय करेंसी में भुगतान की व्यवस्था के बावजूद दूसरी तरफ जमा होने वाली भारतीय करेंसी का इस्तेमाल कैसे होगा, यह बड़ा सवाल रहेगा. भारत-रूस कारोबार में यही समस्या सामने आती रही है.
अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी. आईएमएफ के ताजा आंकड़ों में डॉलर अभी भी वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार की सबसे बड़ी करेंसी है. दूसरी तरफ ब्रिक्स स्थानीय करेंसी, सीमा-पार भुगतान और डिजिटल भुगतान ढांचे के विकल्प तैयार करने की कोशिश कर रहा है. दोनों बातें एक साथ सच हो सकती हैं. इसलिए असली बदलाव डॉलर के अचानक खत्म होने का नहीं बल्कि दुनिया में भुगतान के कई विकल्प बनने का हो सकता है.
अगर यह व्यवस्था धीरे-धीरे मजबूत होती है तो आम भारतीय के लिए सबसे अहम असर रुपये की स्थिरता, आयात की लागत और महंगाई के रास्ते से आएगा. पेट्रोल सस्ता होना इसका सीधा और तत्काल नतीजा नहीं होगा. वहीं सोने में केंद्रीय बैंक की मजबूत मांग लंबे समय में कीमतों को सपोर्ट कर सकती है.
निवेशक के लिए भी सबक साफ है. सिर्फ यह देखकर सोना खरीदना या शेयर बाजार में दांव लगाना सही रणनीति नहीं होगी कि ब्रिक्स डॉलर को चुनौती दे रहा है. असली नजर तेल की कीमत, रुपये की चाल, अमेरिकी ब्याज दर, विदेशी निवेश और केंद्रीय बैंकों की सोने की खरीद पर रखनी होगी.
सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि ब्रिक्स की कहानी डॉलर को रातोंरात हटाने की नहीं है. यह अंतरराष्ट्रीय कारोबार में विकल्प बढ़ाने की कहानी है. अगर स्थानीय करेंसी में कारोबार और डिजिटल पेमेंट नेटवर्क बड़े पैमाने पर सफल होते हैं तो आने वाले वर्षों में डॉलर की एकाधिकार जैसी स्थिति पर दबाव जरूर बढ़ सकता है. लेकिन भारत की जेब पर इसका असर धीरे-धीरे और कई दूसरे आर्थिक फैक्टर्स के साथ मिलकर दिखाई देगा.
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