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Dark Web Drug Trade: डार्क वेब पर फैल रहा नशे का कारोबार, क्यों खुफिया एजेसियों से बचते जा रहे गुनहगार?

डार्क वेब अपराधियों के लिए सुरक्षित पनाहगार बन गया है. यहीं से अब वे ड्रग रैकेट भी चला रहे हैं. आइए जानते हैं कैसे वे एजेंसियों से बच रहे हैं.

Dark Web Drug Trade: डार्क वेब पर फैल रहा नशे का कारोबार, क्यों खुफिया एजेसियों से बचते जा रहे गुनहगार?

Dark Web पर बढ़ता जा रहा है ड्रग्स का कारोबार.

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डीएनए हिंदी: डार्क वेब (Dark Web) ड्रग तस्करी के लिए सबसे बड़ा खुला बाजार बन गया है. डार्क वेब पर भांग, गाजा, शराब और कोकीन से लेकर ड्रग से जुड़े हर उत्पाद की खुले आम सप्लाई और बिक्री हो रही है. यह प्लेटफॉर्म अवैध तस्करी का केंद्र बन गया है. न तो यहां के गुनहगार को पुलिस जानती है, न ही क्रेता को, न विक्रेता को. 

सिर्फ ड्रग ही नहीं, डार्क वेब का सिंडिकेट अप साइब क्राइम से लेकर ह्युमन ट्रैफिकिंग तक फैल गया है.रिपोर्ट्स के मुताबिक दिल्ली डार्क वेब सिंडिकेट के लिए एक हॉटस्पॉट के रूप में उभर रही है.

दिल्ली में कई आपराधिक समूह जुर्म और तस्करी के लिए डार्क वेब का इस्तेमाल कर रहे हैं. ये समूह गुमनाम ट्रांजैक्सन करने के लिए बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी का उपयोग कर रहे हैं. इस तरह से होने वाले ट्रांजैक्शन को न तो ED ट्रैक कर पा रही है, न ही CBI. NCB जैसी एक्टिव संस्थाओं का भी यही हाल है.

इसे भी पढ़ें- क्या है Dark Web, कैसे अपराधी करते हैं इसका इस्तेमाल?

ड्रग, मनी लॉन्ड्रिंग, ह्युमन ट्रैफिकिंग, डार्क वेब पर बेहद आम

डार्क वेब पर ड्रग, हथियारों की तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग जैसी घटनाएं आम हो गई है. क्रेडिट कार्ड डीटेल्स और पर्सनल डेटा समेत सहित चोरी किए गए डेटा को बेचने के लिए भी डार्क वेब का इस्तेमाल हो रहा है.

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, 'डार्क वेब से मुकाबला करने के लिए दिल्ली पुलिस ने डार्क वेब सिंडिकेट की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए साइबर सेल की एक विशेष टीम का गठन किया है. 

डार्क वेब पर हो रहा क्राइम कैसे होगा कंट्रोल?

दिल्ली पुलिस की एक टीम अन्य सुरक्षा एजेंसियों के साथ काम कर रही है, ताकि इन अवैध गतिविधियों में शामिल लोगों को ट्रैक किया जा सके और उन्हें पकड़ा जा सके. हाल के महीनों में पुलिस ने डार्क वेब सिंडिकेट के खिलाफ कई सफल ऑपरेशन भी किए हैं. 

एक ऑपरेशन में, वे ऐसे व्यक्तियों के एक समूह को गिरफ्तार करने में सक्षम हुए, जो डार्क वेब पर ड्रग्स बेचने में शामिल थे. पुलिस ने बड़ी मात्रा में जब्ती की . छापेमारी के दौरान भारी मात्रा में मादक पदार्थ और अन्य अवैध सामान बरामद किया गया.

गांजा, भांग, LSD, डार्क वेब है अपराध का शॉपिंग मॉल

पिछले साल सितंबर में दिल्ली पुलिस ने IIM ड्रॉपआउट, बीबीए छात्र और एक फैशन डिजाइनर सहित सात लोगों को गिरफ्तार किया था, जो विदेशों से एलएसडी, एमडीएमए और मारिजुआना जैसी रासायनिक दवाओं की सोर्सिंग करते थे, जिससे कॉलेज को कूरियर सर्विस के जरिए ड्रग भेजी जा सके.

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LSD के 28 ब्लॉटिंग पेपर, एमडीएमए के 12.6 ग्राम, क्यूरेटेड मारिजुआना के 84 ग्राम और हशीश के 220 ग्राम की बरामदगी के बाद पुलिस ने गुप्त सूचना के बाद गिरफ्तारियां कीं.
इतना ही नहीं, डार्क वेब का इस्तेमाल गिरोह और सिंडिकेट द्वारा हैश, अफीम, चरस, अफीम युक्त आयुर्वेदिक गोलियों के कारोबार में हो रहा है. विदेश तक इसके जरिए सप्लाई हो रही है.

कैसे काम करता है डार्क वेब सिंडिकेट?

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कार्यप्रणाली के बारे में बताते हुए कहा कि ये डार्क वेब सिंडिकेट 'TOR' का इस्तेमाल करते हैं. वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) के जरिए डीलरों से संपर्क करने के बाद लेनदेन आमतौर पर क्रिप्टोकरेंसी के जरिए किए जाते हैं.'

क्या कहते हैं डार्क वेब के यूजर?

एक डार्क नेट यूजर से जब बातचीत की तो पता चला कि इन दिनों टीओआर पर 'प्याज डोमेन' ड्रग ट्रेडिंग के लिए इस्तेमाल हो रहा है. यहां रजिस्ट्रेशन तक नहीं करना होता है. प्याज का URL फीड करते वक्त वेबसाइट को होस्ट करने के लिए एक हैश की सामने आती है. फिर वेबसाइट का URL फीड किया जाता है. यहीं से खरीदार और विक्रेता के बीच एक नेटवर्क बनता है.

डार्क वेब पर कुछ सर्च इंजनों पर भी, ब्लॉग, वेबसाइट और वेबसाइट के URL को WhatsApp ग्रुप, टेलीग्राम आदि के जरिए शेयर किया जाता है.

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सिंडिकेट ग्राहकों को उन विज्ञापनों के जरिए लुभाता है, जो किसी रेस्टोरेंट के मेन्यू की तरह होते हैं. लोगों को इंस्टाग्राम, टेलीग्राम, स्काइप पर सर्विस प्रोवाइड कराई जाती है.

सुरक्षा एजेंसियों के लिए जी का जंजाल बना डार्क वेब

दिल्ली में डार्क वेब सिंडिकेट का बढ़ता चलन एजेंसियों की मुश्किलें बढ़ा रहा है. डार्क वेब की गुमनामी सुरक्षा एजेंसियों के लिए अवैध गतिविधियों में शामिल लोगों को ट्रैक करना मुश्किल बना देती है. क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल लेन-देन को और जटिल बना देता है, जिसकी वजह से अपराधियों को ट्रेस करना असंभव हो जाता है. (इनपुट: IANS हिंदी)

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