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ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने की वजह कौन था- कमलनाथ, दिग्विजय या खुद राहुल गांधी?

ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने संसदीय क्षेत्र मुरैना आए थे. इसी दौरान एक सभा में समर्थकों ने पोस्टर लगाए थे जिस पर लिखा था- सिंधिया को मुख्यमंत्री बनाओ, नहीं तो अपनी खैर बचाओ. माना जा रहा है कि इसके जरिए सिंधिया के समर्थक बीजेपी नेतृत्व पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं...

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ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने की वजह कौन था- कमलनाथ, दिग्विजय या खुद राहुल गांधी?

Jyotiraditya Scindia (फाइल फोटो)

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क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं...या पांच साल बीजेपी में रहने के बाद उनका मोह भंग होने लगा है...या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस ऐसा माहौल बनाने की कोशिश कर रही है- इन सभी सवालों की जड़ में है एक पोस्टर जो पिछले दिनों मुरैना में एक सभा में लगाया गया था. सिंधिया विकास परियोजनाओं की सौगात देने अपने संसदीय क्षेत्र मुरैना आए थे. इसी दौरान एक सभा में समर्थकों ने पोस्टर लगाए थे जिस पर लिखा था- सिंधिया को मुख्यमंत्री बनाओ, नहीं तो अपनी खैर बचाओ. माना जा रहा है कि इसके जरिए सिंधिया के समर्थक बीजेपी नेतृत्व पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं. 

सीएम नहीं बनाए जाने से थे नाराज!

बीजेपी या खुद सिंधिया ने इस घटना को लेकर कुछ नहीं कहा है, लेकिन इसने करीब पांच साल पहले की यादें ताजा कर दी हैं जब महाराज कांग्रेस में थे. तब एमपी में कांग्रेस की ही सरकार थी, लेकिन पार्टी में अलग-थलग पड़े सिंधिया के समर्थक अक्सर सभाओं में ऐसे बैनर-पोस्टर लगाते थे. इसी की परिणति 10 मार्च 2020 को देखने को मिली थी जब सिंधिया अचानक पीएम नरेंद्र मोदी से मिलने पहुंच गए थे और उसी दिन बीजेपी ज्वॉइन कर ली थी. तब कहा गया कि सिंधिया सीएम नहीं बनाए जाने से नाराज थे. तात्कालिक कारण ये बताया गया कि दिग्विजय सिंह के चलते राज्यसभा चुनाव में वे कांग्रेस के फर्स्ट कैंडिडेट नहीं बन सके. 

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ऐसा कहने वाले शायद ये भूल जाते हैं कि सिंधिया तब कांग्रेस अध्यक्ष रहे राहुल गांधी की कोर टीम के सदस्य थे. दोनों के पिता दोस्त रहे थे. इस लिहाज से पारिवारिक रिश्ते भी थे. प्रियंका गांधी के बारे में कहा जाता है कि वो ज्योतिरादित्य को राहुल की तरह भाई जैसा स्नेह देती थीं. ज्योतिरादित्य ने कांग्रेस इसलिए छोड़ी थी क्योंकि उनका भरोसा टूटा था. किसी पद के लिए पार्टी छोड़नी होती तो सिंधिया 2018 में ही बीजेपी में चले गए होते जब कमलनाथ सीएम चुने गए थे. 

मुरैना में हार की टीस

सिंधिया का विश्वास टूटने की शुरुआत 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान ही हो गई थी जब उन्हें मुरैना सीट पर हार का सामना करना पड़ा था. सिंधिया ने इसके लिए राहुल गांधी को जिम्मेदार माना था. इसके दो कारण थे. ज्योतिरादित्य सिंधिया तब कांग्रेस के महासचिव थे और पार्टी ने उन्हें यूपी में बड़ी जिम्मेदारी दी थी. वो प्रियंका गांधी के साथ मिलकर यूपी में पार्टी के ध्वस्त पड़े संगठन को दोबारा खड़ा करने की कोशिश कर रहे थे. सिंधिया संगठन के काम में लगे थे और उन्होंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया था. 

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कहा जाता है कि राहुल ने चुनाव लड़ने के लिए उन पर दबाव डाला था. सिंधिया ने जब चुनाव प्रचार के लिए समय नहीं मिलने का तर्क दिया तो राहुल ने ही पत्नी प्रियदर्शिनी राजे को प्रचार में लगाने की सलाह दी थी. राहुल के कहने पर ही सिंधिया ने नामांकन किया, लेकिन खुद पार्टी के काम में व्यस्त हो गए. योजना के मुताबिक प्रियदर्शिनी राजे सिंधिया ने प्रचार किया. इसी चुनाव में पहली बार ज्योतिरादित्य के बेटे महाआर्यमन भी प्रचार करते दिखे थे. उनकी सभाओं में भीड़ तो खूब जुटी, लेकिन वोट नहीं मिले. ज्योतिरादित्य को केपी यादव जैसे सामान्य कार्यकर्ता ने हरा दिया जो कभी उनके साथ सेल्फी के लिए तरसता था. 

राहुल गांधी से नाराजगी

होम टर्फ पर मिली हार से सिंधिया इसलिए भी ज्यादा आहत थे क्योंकि उनके परिवार के किसी सदस्य की यह पहली पराजय थी. 1980 में ज्योतिरादित्य की दादी विजयाराजे सिंधिया चुनाव हारी थीं, लेकिन तब वे इंदिरा गांधी के खिलाफ फूलपुर से लड़ी थीं. भिंड-मुरैना ग्वालियर रियासत का हिस्सा थे जिसके राजा सिंधिया के पूर्वज थे. आज भी इस इलाके के बुजुर्ग उन्हें महाराज ही बुलाते हैं. मुरैना में हार के लिए राहुल को जिम्मेदार मानने के लिए सिंधिया के पास एक और वजह थी. उनका मानना था कि 2019 का चुनाव नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच सीधा मुकाबला था. इसमें किसी उम्मीदवार की खास अहमियत नहीं थी. राहुल इस मुकाबले में बुरी तरह पीछे रह गए और सिंधिया जैसे मजबूत उम्मीदवारों को भी हार का सामना करना पड़ा.

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...और टूट गया भरोसा

हालांकि, सिंधिया ने इस हार का गम पचाने की कोशिश जरूर की. उन्होंने चुनाव के नतीजों पर चुप्पी साध ली और इसके बाद भी राहुल के समर्थन में खड़े रहे. यदि याद हो तो चुनाव के नतीजे आने के बाद 25 मई 2019 को राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था. तब सिंधिया ने उनके समर्थन में जबरदस्त भाषण दिया था. उन्हें उम्मीद थी कि हार से सीख लेकर राहुल कांग्रेस में बड़े बदलाव करेंगे. हुआ इसका उल्टा. अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद राहुल छुट्टी मनाने विदेश चले गए. सिंधिया के लिए यह ताबूत में आखिरी कील साबित हुई. तभी उन्होंने अपने लिए नई राजनीतिक जमीन तलाशने का फैसला कर लिया था. इसके बाद तो इंतजार था बस मौके का. एमपी में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की सियासी चालबाजियों ने उन्हें यह मौका दिया और वे बीजेपी के पाले में चले गए.

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