डीएनए एक्सप्लेनर
Indus Waters Treaty: छह दशकों से अधिक समय तक दोनों देशों के बीच पानी के बंटवारे का आधार रही यह संधि आज आतंकवाद और रणनीतिक तनाव के कारण एक नए मोड़ पर आ खड़ी हुई है.
भारत और पाकिस्तान के बीच नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर बना ऐतिहासिक ढांचा सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) कहलाता है. दशकों पुराने इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच बहने वाली मुख्य नदियों के उपयोग को लेकर विवाद सुलझाना था, लेकिन बदलते सुरक्षा हालातों के बीच यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है.
1947 में बंटवारे के बाद नदियों का बहाव तो वही रहा, लेकिन सीमाएं बदल गईं. इससे पानी के इस्तेमाल पर खींचतान शुरू हो गई. इस संकट को टालने के लिए 19 सितंबर 1960 को कराची में इस ऐतिहासिक संधि पर दस्तखत किए गए. इस पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, पाकिस्तान के राष्ट्रपति अय्यूब खान और विश्व बैंक ने दस्तखत किए थे. विश्व बैंक ने इसमें मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी.
सिंधु नदी घाटी तंत्र की 6 मुख्य नदियों को दो हिस्सों में बांटा गया-
संधि के तहत 10 साल की एक समय-सीमा (ट्रॉन्जिशन पीरियड) तय की गई थी, जिसे जरूरत पड़ने पर 3 साल तक और बढ़ाया जा सकता था. इस दौरान भारत को पूर्वी नदियों का पानी पाकिस्तान को लगातार देना था, ताकि पाकिस्तान इस बीच अपनी पश्चिमी नदियों से पानी का इस्तेमाल करने के लिए नई नहरें और जलाशय बनाकर तैयार कर सके.
पाकिस्तान में नई नहरें और ढांचा तैयार करने में होने वाले खर्च के लिए भारत वित्तीय मदद देने पर राजी हुआ. भारत ने 'सिंधु बेसिन विकास कोष' में 6,20,60,000 पाउंड (उस समय के हिसाब से लगभग 17.4 करोड़ डॉलर) का एकमुश्त योगदान दिया था.
नदियों से जुड़ा डेटा शेयर करने और आपस में बेहतर तालमेल बनाए रखने के लिए एक स्थायी संस्था बनाई गई. इसमें भारत और पाकिस्तान दोनों तरफ से एक-एक कमिश्नर तैनात किए गए. किसी भी मुद्दे को सुलझाने के लिए तीन चरण तय किए गए-
भारत ने आतंकवाद के मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए इस संधि को स्थगित करने का कदम उठाया है. भारत का साफ कहना है कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते. पाकिस्तान अपनी खेती के 80% हिस्से और 93% पानी की जरूरतों के लिए सिंधु नदी तंत्र पर निर्भर है. संधि पर रोक से उस पर भारी आर्थिक व कृषि संकट मंडरा रहा है.
अब तक भारत पर बांधों में पानी रोकने या बड़ी गाद हटाने को लेकर कई पाबंदियां थीं. संधि के स्थगित रहने से भारत को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में नए जलाशय और पनबिजली परियोजनाएं बनाने की बड़ी छूट मिल गई है. साथ ही भारत ने बाढ़ और पानी के बहाव से जुड़ा डेटा साझा करना रोक दिया है, जिससे पाकिस्तान के लिए अचानक आने वाली आपदाओं से निपटना मुश्किल हो गया है.
पश्चिमी नदियों के पानी का पूरा इस्तेमाल करने के लिए भारत कई अहम प्रोजेक्ट्स पर काम तेज कर रहा है.
सलाल और बगलिहार बांधों की क्षमता बढ़ाने के लिए पहली बार बड़े पैमाने पर सफाई का काम शुरू किया गया है. सिंधु जल संधि ने 6 दशकों से ज्यादा समय तक कई युद्धों के बावजूद काम किया, लेकिन आतंकवाद और जल सुरक्षा के नए दौर में भारत का यह रणनीतिक कदम क्षेत्रीय राजनीति का रुख बदल रहा है.
ये भी पढ़ें- ट्रंप ने जेनेरिक दवाओं पर 200% टैरिफ का किया ऐलान, क्या भारत में महंगी होंगी दवाइयां? जानिए क्या होगा असर