Advertisement

जिस '₹' सिंबल को DMK नेता के बेटे ने बनाया, उसी को क्यों बदलने पर तुले MK स्टालिन?

Hindi Controversy: भारतीय करेंसी रुपये का सिंबल '₹' को उदय कुमार धर्मलिंगम ने डिजाइन किया था. उनके पिता एन धर्मलिंगम डीएमके के बड़े नेता थे. जिसको लेकर बीजेपी सवाल उठा रही है.

Latest News
जिस '₹' सिंबल को DMK नेता के बेटे ने बनाया, उसी को क्यों बदलने पर तुले MK स्टालिन?

Udaya Kumar Dharmalingam

Add DNA as a Preferred Source

देश में भाषा को लेकर चल रही बहस की बीच तमिलाडु की स्टालिन सरकार ने जो कदम उठाया है, उसने इसको और हवा दे दी है. राज्य सरकार ने बजट से आधिकारिक भारतीय रुपये के प्रतीक '₹' को 'ரூ' से रिप्लेस कर दिया है. इस चिन्ह का मतलब तमिल लिपी में 'रु' होता है. ऐसा पहली बार हुआ जब किसी राज्य सरकार ने रुपये के चिह्र को बदला है. सीएम स्टालिन के इस फैसले का बीजेपी-AIADMK समेत तमाम विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं. अब सवाल यह उठ रहा है कि स्टालिन को यह चिह्न बदले की जरूरत क्यों पड़ी? क्योंकि इस सिंबल को तो उनकी पार्टी के नेता के बेटे ने ही बनाया था. 

भारतीय करेंसी रुपये का सिंबल '₹' को उदय कुमार धर्मलिंगम ने डिजाइन किया था. उदय के पिता एन धर्मलिंगम डीएमके के विधायक रह चुके हैं. साल 2010 में जब भारत सरकार ने '₹' को रुपये का आधिकारिक प्रतीक माना तो डीएमके नेताओं ने भी उदय धर्मलिंगम को बधाई दी थी. इनमें एमके स्टालिन भी शामिल थे. एन धर्मलिंगम ने बेटे की इस कामयाबी को तमिलनाडु का गौरव बताया था.

स्टालिन के इस कदम पर बीजेपी ने घेरना शुरू कर दिया है. बीजेपी IT सेल के हेड अमित मालवीय ने इसे तमिलनाडु का अपमान बताया है. उन्होंने एक्स पर लिखा, 'उदय कुमार धर्मलिंगम एक भारतीय शिक्षाविद और डिजाइनर हैं, जो DMK के एक पूर्व विधायक के बेटे हैं. उन्होंने भारतीय रुपये '₹' चिह्न को डिजाइन किया था. जिसे भारत ने स्वीकर किया था. मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने तमिलनाडु के बजट 2025-26 के दस्तावेज से '₹' सिंबल हटाकर तमिल लोगों का अपमान कर रहे हैं.'

तमिलनाडु में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. लेकिन उससे पहले स्टालिन ने हिंदी का मुद्दा उठाकर फिर इस विवाद को तूल दे दिया है. क्योंकि नई शिक्षा पॉलिसी में हिंदी को लेकर डीएमके और केंद्र सरकार के बीच पहले से ही विवाद चल रहा है. स्टालिन का आरोप है कि केंद्र नई शिक्षा नीति के तहत तमिलनाडु पर हिंदी भाषा थोपना चाहती है. जबकि यहां अंग्रेजी और तमिल के अलावा किसी तीसरी भाषा की जरूरत नहीं है.

1968 से हिंदी भाषा लागू करने का विरोध

तमिलनाडु में तीन भाषा नीति का विरोध कोई नया नहीं है. 1968 में इंदिरा गांधी की सरकार में पूरे देश में जब तीन भाषा फॉर्म्युला लाया गया तो तमिलाडु ने इसे लागू करने से इनकार कर दिया था. राज्य में दो भाषा (तमिल और अंग्रेजी) नीति ही लागू है. राज्य के स्कूल, कॉलेज और शिक्षण संस्थानों में तमिल-इंग्लिश ही पढ़ाई जाती है. लेकिन केंद्र सरकार की नई शिक्षा पॉलिसी में मातृभाषा, दूसरी क्षेत्रीय भाषा और तीसरी अंग्रेजी को लागू करने की बात कही गई.

दरअसल, दक्षिणी राज्य तमिलनाडु की राजनीति में DMK की छवि एक ऐसी पार्टी के तौर पर ही है, जो तमिल विरासत, तमिल पहचान, तमिल सिनेमा औ साहित्य पर गर्व करती है. इस पार्टी के लिए उत्तर की किसी पहचान को अपनाना तमिल विरासत को साझा करना जैसा है. इसका असर वोटबैंक पर पड़ सकता है. स्टालिन को लगता है कि जिस पार्टी (डीएमके) का उदय द्रविड आंदोलन से हुआ वह अगर हिंदी अपनाएगी तो राज्य में उसकी राजनीति का क्या मतलब रह जाएगा. 

यह भी पढ़ें- तमिलनाडु में हिंदी को लेकर सियासी दांव, स्टालिन सरकार ने बजट से हटाया '₹' सिंबल, क्या देश में पहले भी हो चुका है ऐसा?

एक तीर से साधे दो निशाने

जबकि बीजेपी हिंदी भाषा लागू करके तमिलनाडु में पैर जमाने की कोशिश कर रही है. उसने एआईएडीएमके को गठजोड़ कर राजनीतिक साधने की कोशिश तो की थी, लेकिन लोकसभा चुनाव 2024 से दोनों पार्टियों का गठबंधन टूट गया था. AIADMK भी नहीं चाहती की तमिलनाडु में हिंदी भाषा लागू हो. यही वजह है कि स्टालिन ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं. स्टालिन को पता है कि जितना वह हिंदी भाषा मुद्दा बनाएंगे, उतनी ही AIADMK और बीजेपी के बीच गठबंधन की संभावना कम होती जाएंगी.

अपनी राय और अपने इलाके की खबर देने के लिए जुड़ें हमारे गूगलफेसबुकx,   इंस्टाग्रामयूट्यूब और वॉट्सऐप कम्युनिटी से.

Read More
Advertisement
Advertisement
Advertisement