डीएनए एक्सप्लेनर
तालिबान का कहना है कि उसने दशकों पुराना युद्ध खत्म कर देश में शांति कायम की है. लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज अफ़गानिस्तान भी गरीबी और पैसे की तंगी से जूझ रहा है. आखिर इन 5 सालों में तालिबान के शासन में क्या-क्या बदलाव आए हैं? आइए विस्तार से जानते हैं.
Taliban Human Rights Crisis: 15 अगस्त 2026 को अफगानिस्तान में तालिबान शासन की वापसी के 5 साल पूरे हो गए हैं. इस मौके पर काबुल के ऐतिहासिक 'लोया जिरगा' असेंबली हॉल में एक बड़ा समारोह आयोजित किया गया, जिसमें तालिबान नेताओं ने इसे अमेरिकी सेना से मुक्ति और दशकों के संघर्ष के अंत के रूप में मनाया.
तालिबान सरकार का दावा है कि उसने देश में शांति और स्थिरता कायम की है. इसके ठीक विपरीत, संयुक्त राष्ट्र (UN) और वैश्विक संस्थाएं इसे दुनिया का सबसे बड़ा मानवाधिकार संकट कह रही हैं. आखिर अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने ऐसा क्यों कहा? आइए इसके पीछे की असली वजहें जानते हैं.
15 अगस्त 2021 को अमेरिकी और नाटो (NATO) सेनाओं की वापसी के साथ ही तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया था. 2026 में इसके 5 साल पूरे होने पर काबुल की सड़कों पर तालिबान समर्थक झंडे लेकर निकले और सरकार के समर्थन में नारे लगाए.
तालिबान के उप प्रधानमंत्री अब्दुल सलाम हनफी ने दावा किया कि उनके शासन ने बाहरी हस्तक्षेप और आंतरिक संघर्ष के युग को समाप्त कर दिया है, जिससे हर दिन होने वाली सैकड़ों मौतों का सिलसिला थम गया है. हालांकि, इस जश्न के बीच एक कड़वा सच यह भी था कि उस भव्य समारोह में एक भी महिला मौजूद नहीं थी.
तालिबान ने जब सत्ता संभाली थी, तब महिलाओं को पढ़ाई और नौकरी के अधिकार देने का वादा किया था. लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ नहीं हुआ. अब 12 साल से बड़ी लड़कियों के स्कूल जाने पर पूरी रोक है. यूनेस्को के मुताबिक, करीब 24 लाख लड़कियां स्कूल नहीं जा पा रही हैं.
महिलाओं के लिए कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दरवाजे भी बंद कर दिए गए हैं. वे अब पार्क, जिम या किसी खेल में हिस्सा नहीं ले सकतीं. यहां तक कि बिना किसी पुरुष के वे लंबी दूरी का सफर भी नहीं कर सकतीं. संयुक्त राष्ट्र (UN) के विशेष दूत रिचर्ड बेनेट ने इसे महिलाओं पर अत्याचार और मानवता के खिलाफ अपराध कहा है.
तालिबान का दावा है कि उनकी सरकार 'शरिया' पर आधारित है. सरकार के प्रवक्ता हमदुल्लाह फितरत के अनुसार, वे देश को असुरक्षा और कब्जे से बचाकर समृद्धि की ओर ले जाने का प्रयास कर रहे हैं. शासन ने बुनियादी ढांचे और रोजगार सृजन की बात तो की है, लेकिन मानवाधिकारों के सवाल पर वे अक्सर चुप्पी साध लेते हैं.
सुरक्षा के मोर्चे पर, काबुल और अन्य प्रांतों में तालिबान ने भारी सुरक्षा बल तैनात कर रखे हैं और जगह-जगह चेकपॉइंट्स बनाए गए हैं ताकि किसी भी प्रकार के विरोध या खतरे को रोका जा सके.
5 साल बीतने के बाद भी दुनिया के ज्यादातर देशों ने तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है. हालांकि,रूस एक ऐसा देश है जो तालिबान को आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है. लेकिन अभी अधिकांश देश अभी भी 'रुको और देखो' की नीति पर चल रहे हैं.
तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी ने दुनिया से अपील करते हुए कहा है कि वैश्विक समुदाय को अपना नजरिया बदलना चाहिए और तालिबान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहिए.