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POK में अचानक क्यों गूंजने लगी पाकिस्तानी सेना हटाओ की मांग? 1948 के UN प्रस्ताव से क्या है कनेक्शन, समझिए पूरा मामला

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में बढ़ते जन-आक्रोश के बीच प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तानी सेना को वहां से हटाने की मांग की है. इस पूरे विवाद को बेहतर ढंग से समझने के लिए आइए जानते हैं पीओके का इतिहास, संयुक्त राष्ट्र (UN) का प्रस्ताव और उसके महत्व के बारे में.

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POK में अचानक क्यों गूंजने लगी पाकिस्तानी सेना हटाओ की मांग? 1948 के UN प्रस्ताव से क्या है कनेक्शन, समझिए पूरा मामला

पीओके में उठी पाकिस्तानी सेना को हटाने की मांग, AI मॉडिफाइड फोटो

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  • पीओके के रावलकोट में अब पाकिस्तानी सेना को क्षेत्र से पूरी तरह हटाने के लिए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.
  • पाकिस्तान ने कश्मीर के 78,000 वर्ग किमी से अधिक क्षेत्र पर 1947 से अवैध कब्जा कर रखा है, जो दिल्ली से 50 गुना बड़ा है.
  • अक्टूबर 1947 में पाकिस्तानी हमले के बाद महाराजा हरि सिंह ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाया था.
  • संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव 47 के तहत जनमत संग्रह की पहली शर्त पीओके से पाकिस्तानी सेना की पूर्ण वापसी थी, जो कभी पूरी नहीं हुई.

 

UN Resolution On POK: कश्मीर के एक विशाल भूभाग, जिसे दुनिया पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) के रूप में जानती है, वहां पिछले कुछ समय से हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं. करीब 78,000 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा बड़े इस क्षेत्र पर पाकिस्तान ने दशकों से अवैध कब्जा कर रखा है, जो क्षेत्रफल के लिहाज से देश की राजधानी दिल्ली से 50 गुना अधिक बड़ा है. हाल ही में यहां महंगाई और भेदभाव के खिलाफ शुरू हुआ विरोध अब पाकिस्तानी सेना को क्षेत्र से पूरी तरह हटाने की मांग में बदल गया है.

कैसे बना POK? 

15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी के समय कश्मीर एक स्वतंत्र रियासत थी, जिसके शासक महाराजा हरि सिंह ने इसे किसी भी देश में शामिल न करने का निर्णय लिया था. हालांकि, पाकिस्तान की नजर शुरू से ही कश्मीर पर थी और 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तानी सेना के समर्थन से हजारों कबायलियों ने कश्मीर पर हमला कर दिया. 

इस संकट की स्थिति में महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी और 27 अक्टूबर 1947 को 'विलय पत्र' पर हस्ताक्षर कर कश्मीर को आधिकारिक तौर पर भारत का हिस्सा बना दिया. इसके बाद भारतीय सेना ने हमलावरों को पीछे धकेलना शुरू किया, लेकिन जिस हिस्से पर पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया था, वह सीजफायर के बाद पाकिस्तान के नियंत्रण में ही रह गया, जिसे आज पीओके कहा जाता है.

POK में पाकिस्तानी सेना को हटाने की क्यों हो रही है मांग?

वर्तमान में पीओके के रावलकोट जैसे इलाकों में 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' के नेतृत्व में बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं. प्रदर्शनकारी नेता सरदार अमान खान ने संयुक्त राष्ट्र के 1948 के प्रस्ताव का हवाला देते हुए मांग की है कि पाकिस्तानी जनरल यह बताएं कि वे उनकी जमीन कब छोड़कर जाएंगे. 

POK पर संयुक्त राष्ट्र का क्या है प्रस्ताव?

साल 1948 में जब यह मामला संयुक्त राष्ट्र (UN) पहुंचा, तो सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव संख्या-47 पारित किया. इस प्रस्ताव में कश्मीर में जनमत संग्रहकी बात तो कही गई थी, लेकिन इसके लिए पहली और सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह थी कि पाकिस्तान को अपने कबायलियों और सेना को उस क्षेत्र से पूरी तरह हटाना होगा. फिर भी पाकिस्तान ने कभी अपनी सेना वापस नहीं बुलाई, जिसके कारण भारत ने भी वहां जनमत संग्रह कराने से इनकार कर दिया.

जब संयुक्त राष्ट्र के कहने पर भी पाकिस्तानी सेना पीछे नहीं हटी, तो सितंबर 1952 में एक और प्रस्ताव पास हुआ. इसके तहत तय किया गया कि सुरक्षा के लिए पाकिस्तान के 3 से 6 हजार और भारत के 12 से 18 हजार सैनिक कश्मीर में रह सकते हैं.

क्या है शिमला समझौता?

साल 1971 की लड़ाई के बाद, 1972 में भारत और पाकिस्तान के बीच 'शिमला समझौता' हुआ. इसमें स्पष्ट रूप से तय हुआ कि कश्मीर विवाद को दोनों देश आपस में मिलकर सुलझाएंगे. इसमें किसी तीसरे पक्ष या संयुक्त राष्ट्र (UN) की कोई भूमिका नहीं होगी. लेकिन इसके बाद भी पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आता और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उछालता रहता है. 

भारत के लिए POK की क्या है अहमियत?

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) भारत की अखंडता, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक व्यापार के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है. यदि यह भारत के पास पीओके आ जाता है, तो हमारी सीमा सीधे अफगानिस्तान के वाखान कॉरिडोर से जुड़ जाएगी, जिससे पाकिस्तान पर निर्भरता खत्म होगी और भारत सीधे सड़क मार्ग से मध्य एशिया और यूरोप तक व्यापार कर सकेगा. 

इसके अलावा, PoK के जरिए जुड़ा चीन और पाकिस्तान का गठजोड़ टूट जाएगा, जिससे भारत पर दोहरे युद्ध का खतरा भी खत्म होगा. इसके साथ ही, पाकिस्तान द्वारा दशकों से चलाए जा रहे आतंकवादी ट्रेनिंग कैंप और लॉन्च पैड्स पूरी तरह खत्म हो जाएंगे, जिससे कश्मीर में घुसपैठ रुकेगी और सेना की आंतरिक सुरक्षा का भारी खर्च बचेगा.

 

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