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शहबाज शरीफ के पास सिर्फ 6 महीने? सेना के हाथ में जा सकती है पाकिस्तान की कमान; जानें क्या है वो 3 साल का शाप

पाकिस्तान में आर्थिक बदहाली और आंतरिक कलह के बीच शहबाज सरकार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. जानिए क्या है पाकिस्तान का 'सिस्टम रीसेट' प्लान और सेना की अगली चाल.

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शहबाज शरीफ के पास सिर्फ 6 महीने? सेना के हाथ में जा सकती है पाकिस्तान की कमान; जानें क्या है वो 3 साल का शाप

क्या शहबाज सरकार की उलटी गिनती शुरू हो गई है,  AI PHOTO

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  • पाकिस्तान में नागरिक सरकारों का औसत कार्यकाल लगभग 3 साल ही रहा.
  • पाकिस्तान में शहबाज सरकार को ढाई साल हो चुके हैं.
  • सेना अब प्रांतीय शक्तियों को कम करने और केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए नए संशोधनों पर विचार कर रही है.

Why Do Governments In Pakistan Lose Power After Three Years: पाकिस्तान में इन दिनों एक ही सवाल गूंज रहा है क्या शहबाज शरीफ की सरकार गिरने वाली है? सवाल अब यह नहीं है कि सरकार गिरेगी या नहीं, बल्कि यह है कि 'कब और कैसे'. फरवरी 2024 के चुनाव, जिसे बहुत ही जोड़-तोड़ वाला माना गया था, उसके बाद सत्ता में आई शहबाज सरकार अब अपने ढाई साल पूरे कर चुकी है. 

पाकिस्तान की राजनीति का इतिहास गवाह है कि वहां किसी भी नागरिक सरकार का औसत कार्यकाल लगभग तीन साल ही होता है. आइए अब हम आपको बताते हैं कि आखिर क्यों शहबाज शरीफ का 'काउंटडाउन' शुरू हो चुका है?

पाकिस्तान में क्यों नहीं टिकती 3 साल से अधिक सरकार?

1947 में भारत से धर्म के नाम पर अलग होने के बाद से पाकिस्तान में अब तक कोई भी सरकार नें अपने 5 साल के कार्यकाल को पूरा नहीं कर पाई. अधिकतर प्रधानमंत्रियों की सत्ता 3 साल के आसपास आते-आते किसी न किसी वजह से छीन ली जाती है. इसी सिलसिले को पाकिस्तानी राजनीति का 'शाप' कहा जाता है.

क्या जाने वाली है शहबाज शरीफ की सत्ता?

पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति को विशेषज्ञों ने 'उधार के समय' पर टिकी सरकार बताया है. देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह ठप है, निवेश का नामो-निशान नहीं है और सुरक्षा की स्थिति लगातार बिगड़ रही है. हाल ही में पाकिस्तान के आंतरिक मंत्री मोहसिन नकवी ने 30 जुलाई को एक बड़ा बयान देते हुए स्वीकार किया कि पाकिस्तान में सिस्टम पूरी तरह चरमरा गया है.

बता दें कि मोहसिन नकवीसेना प्रमुख असीम मुनीर के करीबी रिश्तेदार माने जाते हैं, उनके इस बयान का सेना के प्रवक्ता ने भी समर्थन किया है. इसे इस बात का संकेत माना जा रहा है कि अब सेना भी मान चुकी है कि मौजूदा सरकार से काम नहीं बन रहा है.

क्यों चर्चा में है सिस्टम रीसेट?

जब मोहसिन नकवी ने 'सिस्टम को रीसेट' करने की बात कही, तो पाकिस्तान के राजनीतिक गलियारों में अटकलें तेज हो गईं. इसके कई मायने निकाले जा रहे हैं जिसमें:

  • नए प्रांतों का गठन: ऐसी चर्चा हो रही है कि पाकिस्तान को और छोटे प्रांतों में बांटने की तैयारी है ताकि प्रशासन पर पकड़ मजबूत हो सके.
  • संसदीय बनाम राष्ट्रपति प्रणाली: मौजूदा संसदीय प्रणाली को हटाकर राष्ट्रपति शासन जैसा मॉडल लाने की योजना है.
  • संवैधानिक संशोधन: हाल ही में 26वें और 27वें संशोधनों के जरिए न्यायपालिका की शक्तियों को कम किया गया है और सेना प्रमुख को तीनों सेनाओं का प्रमुख बनाने वाला नया पद सृजित किया गया है.
  • संविधानिक सैन्यवाद: ये भी चर्चा है कि पाकिस्तान अब पूरी तरह से सेना द्वारा संचालित एक ऐसी ऑटोक्रेसी बनने जा रहा है, जिसमें लोकतंत्र का केवल एक नाममात्र का मुखौटा होगा?

किन मोर्चों पर फेल हुई शहबाज सरकार?

शहबाज सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक मोर्स है. देश के पास संसाधनों की भारी कमी है, जिससे वह खैबर पख्तूनख्वा व बलूचिस्तान में जारी हिंसा से निपटने में असमर्थ नजर आ रहा है.

सेना ने इस सरकार का पूरा साथ तो दिया लेकिन न्यायपालिका और नौकरशाही को सरकार के पक्ष में 'रबड़ स्टैंप' जैसा बना दिया, उसके बाद भी सरकार आर्थिक या राजनीतिक रूप से अपनी पकड़ बनाने में विफल रही है.

पाकिस्तान की आम जनता सरकार के बारे में क्या सोच रही है?

पाकिस्तान के पारंपरिक राजनीतिक दल जैसे PML-N और PPP अब अपनी साख खोते जा रहे हैं. राजनीति अब सड़कों पर होने वाले जन आंदोलनों से तय हो रही है. उदाहरण के तौर पर, सिंध में सेना समर्थित नहर परियोजनाओं के खिलाफ भारी विरोध प्रदर्शन हुए, जिसके कारण सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े.

छोटे प्रांतों जैसे सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में इस बात को लेकर गहरा डर है कि संघीय सरकार उनकी पहचान को मिटाने और संसाधनों को हड़पने की कोशिश कर रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि सेना द्वारा थोपे जा रहे ये 'समाधान' पाकिस्तान को और अधिक अशांत और शासित करने में कठिन बना सकते हैं. 
 

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