डीएनए एक्सप्लेनर
देश में 2000 से अधिक ऐसी राजनीतिक पार्टियां है, जिनका रजिस्ट्रेशन तो चुनाव आयोग में है लेकिन उनका कोई वोट बैंक नहीं है. यहां तक की चुनाव में उनका कोई असर भी नहीं होता है, लेकिन इन पार्टियों को मिलने वाला चंदा राष्ट्रीय और राज्य स्तर की पार्टियों को कहीं अधिक होता है.
यूपी, उत्तराखंड और पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. इन तीनों राज्यों सहित देश भर में हजारों ऐसी राजनीतिक पार्टियां हैं, जो चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड तो हैं, लेकिन उन्हें न राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल है और न ही राज्य स्तर पर किसी क्षेत्रिय पार्टी की मान्यता है. आसान शब्दों में इन्हें गुमनाम राजनीतिक पार्टी भी कह सकते हैं. इनका कोई वोट बैंक नहीं होता है और चुनाव में इनका कोई असर भी नहीं होता है, लेकिन फिर भी इन पार्टियों को चंदा भारी-भरकम मिलता है. आइए जानते हैं कि छोटी पार्टियों के बड़े चंदे की कहानी क्या है?
ऐसी राजनीतिक पार्टियां, जिनका रजिस्ट्रेशन तो चुनाव आयोग में है, लेकिन उनकी राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कोई मान्यता नहीं होती है. इन पार्टियों का कोई वोट बैंक भी नहीं होता है. इन पार्टियों को रजिस्टर्ड अनरिकॉग्नाइज्ड पॉलिटिकल पार्टीज (RUPP) कहा जाता है. अक्टूबर 2025 के चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार ऐसी 2000 से ज्यादा पार्टियां रजिस्टर्ड थीं.
द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार इन छोटी कम चर्चित राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे और उनकी आय में पिछले कुछ वर्षों में तेज बढ़ोतरी हुई है. 2015-16 में जहां इन पार्टियों को करीब 4.37 करोड़ रुपये का चुनावी चंदा मिला था.
वहीं 2022 से 2024 के बीच यह रकम 10,000 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है. गुजरात की सिर्फ पांच गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों ने 2019 से 2024 के बीच कुल 2,316 करोड़ रुपये की आय घोषित की.
रिपोर्ट के अनुसार 2019-20 से 2023-24 के बीच गुजरात की भारतीय नेशनल जनता दल इस सूची में सबसे ऊपर है। पार्टी ने पांच वित्त वर्षों में कुल 957.45 करोड़ रुपये की आय घोषित की. वहीं दूसरे नंबर पर गुजरात की न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी है, जिसने वित्त वर्ष 2022-23 में 407.45 करोड़ रुपये और 2023-24 में 200.69 करोड़ रुपये की आय घोषित की. पार्टी की पांच साल की कुल घोषित आय 608.14 करोड़ रुपये रही.
गुजरात की सत्यवादी रक्षक पार्टी 416.23 करोड़ रुपये की कुल घोषित आय के साथ तीसरे स्थान पर है. पार्टी ने 2022-23 में 85.68 करोड़ रुपये और 2023-24 में 330.56 करोड़ रुपये की आय घोषित की. बिहार की आम जनमत पार्टी ने पांच साल में 220.37 करोड़ रुपये की आय घोषित की, जबकि हरियाणा की राष्ट्रीय विकास पार्टी ने कुल 207.63 करोड़ रुपये की आय घोषित की.
RUPP की वित्तीय स्थिति को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि इनमें से कई पार्टियों का जमीनी राजनीतिक प्रभाव बेहद सीमित है, लेकिन उनके खातों में बड़ी रकम दिखाई देती है. ADR की 18 जुलाई 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच सबसे ज्यादा आय घोषित करने वाली शीर्ष 10 RUPP की कुल घोषित आय 1,581.75 करोड़ रुपये थी.
इसमें गुजरात में पंजीकृत पार्टियों की हिस्सेदारी करीब 73.22 फीसदी यानी 1,158.12 करोड़ रुपये थी. इसी लिस्ट में बिहार में पंजीकृत भारतीय नेशनल जनता दल ने 957.45 करोड़ रुपये की कुल आय घोषित की. शीर्ष 10 में पांच पार्टियां गुजरात, दो बिहार, दो हरियाणा और एक दिल्ली में रजिस्टर्ड थी.
आंकड़ों के मुताबिक, RUPP की घोषित आय में 2021-22 के बाद बड़ा उछाल आया. रिपोर्ट्स के अनुसार फाइनेंशियल ईयर 2021-22 में इनकी घोषित आय करीब 490.22 करोड़ रुपये थी, जो 2022-23 में बढ़कर 1,581.75 करोड़ रुपये हो गई और 2023-24 में भी यह आंकड़ा 915.42 करोड़ रुपये रहा.
राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर आयकर में 100 फीसदी छूट का प्रावधान है. इसके लिए पार्टियों को चंदे की रिपोर्ट और सालाना ऑडिट रिपोर्ट समेत कई जरूरी दस्तावेज चुनाव आयोग में जमा करने होते हैं.
ADR की एक रिपोर्ट में बताया गया कि 2019-20 में 219 RUPP ने करीब 608 करोड़ रुपये की आयकर छूट का दावा किया था. इनमें से 66 पार्टियों ने जरूरी योगदान रिपोर्ट जमा किए बिना ही टैक्स छूट का दावा किया था।
चुनाव आयोग ने 2022 में जब RUPP के अनुपालन की समीक्षा की तो स्थिति और चिंताजनक दिखाई दी. आयोग के मुताबिक, कुल 2,796 RUPP में से 92 फीसदी से ज्यादा ने 2019 की योगदान रिपोर्ट जमा नहीं की थी. इसके अलावा 2019 में 2,354 RUPP में से केवल 623 ने चुनाव लड़ा था. आयोग की जांच में 87 ऐसी पार्टियां भी मिलीं, जिनका उनके रजिस्टर्ड पते पर कोई अस्तित्व नहीं मिला.
चुनाव आयोग ने पिछले कुछ वर्षों में ऐसी पार्टियों के खिलाफ कार्रवाई भी की है, जो पार्टियां लगातार 6 साल तक चुनाव नहीं लड़तीं, उन्हें रजिस्टर्ड पार्टियों की सूची से हटाने की प्रक्रिया शुरू की थी.
जून 2025 में आयोग ने 345 RUPP को डीलिस्ट करने की प्रक्रिया शुरू की थी. इससे पहले अगस्त 2025 में 334 और सितंबर 2025 में 474 RUPP को डीलिस्ट किया गया था. अक्टूबर 2025 में आयोग की सूची में 2,049 ऐसी पार्टियों का विवरण था.
वहीं पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी का कहना है कि डीलिस्टिंग का मतलब रजिस्ट्रेशन रद्द करना नहीं है. उनका कहना है कि चुनाव आयोग के पास राजनीतिक पार्टियों को डी-रजिस्टर करने की शक्ति नहीं है.
RUPP की फंडिंग को लेकर मनी लॉन्ड्रिंग की आशंका भी जताई गई है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार राजनीतिक पार्टी के तौर पर रजिस्ट्रेशन का इस्तेमाल भ्रष्टाचार या मनी लॉन्ड्रिंग के लिए किया जा सकता है और इसमें शेल कंपनियों के इस्तेमाल की भी आशंका हो सकती है.
नवंबर 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, CBDT ने RUPP, चार्टर्ड अकाउंटेंट्स और बिचौलियों के एक कथित नेटवर्क का पता लगाया था. इसमें राजनीतिक चंदे पर टैक्स छूट का इस्तेमाल कर 9,169 करोड़ रुपये की कथित मनी लॉन्ड्रिंग का मामला सामने आने की बात कही गई थी. दिसंबर 2025 में PIB की ओर से भी राजनीतिक दलों को दिए गए फर्जी चंदे के दावों की जांच किए जाने की जानकारी दी गई थी.
RUPP की बढ़ती आय, टैक्स छूट के दावे, चंदे की रिपोर्ट दाखिल न करने और चुनावी गतिविधियों के सीमित होने के बीच सबसे बड़ा सवाल राजनीतिक फंडिंग की पारदर्शिता का है. जब किसी राजनीतिक दल का चुनावी असर बेहद कम हो, लेकिन उसके खाते में करोड़ों रुपये की आय दिखाई दे, तो उस पैसे का स्रोत, इस्तेमाल और उस पर निगरानी तीनों सवाल अहम हो जाते हैं.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार राजनीतिक पार्टियों को अपनी आय का रिटर्न जमा करना होता है, लेकिन अगर वह ऐसा नहीं भी करते हैं, तो चुनाव आयोग कुछ नहीं कर सकता. आयोग के पास पार्टियों को डी-रजिस्टर करने की शक्ति नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट का 2002 का एक पुराना फैसला है, जिसमें कहा गया था कि ECI पार्टियों को डी-रजिस्टर नहीं कर सकता.
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