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नेपाल बाढ़ में शवों की पहचान के लिए DNA टेस्ट क्यों बना आखिरी उम्मीद? जानिए कैसे होती है शिनाख्त

नेपाल में आई भीषण बाढ़ के बाद शवों की पहचान करना बड़ी चुनौती बन गया है। जानिए कैसे DNA तकनीक और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से शवों की पहचान की जा रही है।

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नेपाल बाढ़ में शवों की पहचान के लिए DNA टेस्ट क्यों बना आखिरी उम्मीद? जानिए कैसे होती है शिनाख्त

नेपाल बाढ़ में शवों की पहचान के लिए DNA टेस्ट, Photo AI and X

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  • नेपाल बाढ़ में 1,270 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और 4,700 से अधिक लोग अब भी लापता हैं.
  • भारत की 19 सदस्यीय फोरेंसिक टीम और चीन के डीएनए विशेषज्ञ नेपाल में काम कर रहे हैं.
  • अत्यधिक सड़ चुके शवों में भी हड्डियों और दांतों से डीएनए निकाला जा रहा है.
  • माता-पिता और बच्चों से ब्लड सैंपल देने को कहा गया है.


Nepal Flood DNA Identification:  लांगटांग लिरुंग पर्वत चोटी के पास एक ग्लेशियर टूटने से नेपाल और तिब्बत के निचले इलाकों में अचानक भीषण बाढ़ आ गई. इस आपदा ने मलबे, कीचड़ और पानी का ऐसा सैलाब छोड़ा जिसने सब कुछ तबाह कर दिया. इस हादसे में अब तक 1,270 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 4,700 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं.

हादसे के बाद सबसे बड़ी चुनौती मलबे से निकाले जा रहे शवों की पहचान करने की है. बाढ़ के पानी और मलबे में कई दिनों तक दबे रहने के कारण अधिकांश शव इस हद तक सड़-गल चुके हैं कि उनकी पहचान नहीं हो पा रही है. ऐसे समय में एक्सपर्ट्स के लिए 'DNA पहचान' ही आखिरी उम्मीद है. 

नेपाल में शवों की पहचान करने में क्यों हो रही दिक्कत?

राजधानी काठमांडू में शवदाह गृहों और मुर्दाघरों में शवों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि वे ओवरफ्लो हो रहे हैं. फोरेंसिक टीमों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बहकर आए शव बिल्कुल ही पहचान में नहीं आ रहे हैं क्योंकि लंबे समय तक पानी में डूबे रहने के कारण शरीर तेजी से गल रहा है.

आमतौर पर शवों की पहचान के लिए शरीर पर बने टैटू, जन्ममार्क या उनके पहने हुए गहनों की मदद ली जाती है. लेकिन इस आपदा की भयावहता ऐसी है कि इन तरीकों से पहचान कर पाना बेहद कठिन साबित हो रहा है. ऐसे में गलत शव किसी दूसरे परिवार को न सौंप दिया जाए, इस गंभीर भ्रम से बचने के लिए वैज्ञानिक तरीकों का सहारा लिया जा रहा है.

DNA टेस्ट से कैसे होती है शवों की पहचान?

आपदा पीड़ितों की पहचान के लिए दुनिया भर में एक मानक ढांचा काम करता है, जिसे इंटरपोल का डिजास्टर विक्टिम आइडेंटिफिकेशन (DVI) कहा जाता है. इस प्रक्रिया में फोरेंसिक एक्सपर्ट्स शव से ज्यादा से ज्यादा बायोमेट्रिक डेटा जुटाने की कोशिश करते हैं.

वैज्ञानिकों के अनुसार, शव की पहचान करने के लिए तीन सबसे सटीक और सॉलिड तरीके हैं जिनमें DNA मैचिंग, फिंगरप्रिंट्स और डेंटल रिकॉर्ड्स का मिलान शामिल है. कई मामलों में उंगलियों के निशान पूरी तरह मिट जाते हैं या फिर डेंटिस्ट के पास दांतों का कोई पुराना रिकॉर्ड ही नहीं मिल पाता, इसीलिए DNA मैचिंग को सबसे फुलप्रूफ और अचूक माना जाता है. समान जुड़वां बच्चों को छोड़कर दुनिया में हर एक इंसान का DNA बिल्कुल यूनिक और अनोखा होता है.

कैसे लिए जाते हैं DNA सैंपल ?

DNA प्रोफाइल तैयार करने के लिए शरीर के अलग-अलग हिस्सों से सैंपल लिए जा सकते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर शरीर का मांस पूरी तरह गल भी चुका हो, तो भी हड्डियों और दांतों से डीएनए निकाला जा सकता है. इसके अलावा खून और सॉफ्ट टिश्यूज से भी प्रोफाइल बनाई जाती है.

DNA मिलान का क्या है तरीका?

जानकारी के अनुसार, DNA मिलान के दो तरीके हैं, जिसमें पहला तरीका यह है कि अगर लापता व्यक्ति की कोई इस्तेमाल की हुई चीज जैसे टूथब्रश या हेयरब्रश मिल जाए, तो उससे सीधे डीएनए निकालकर शव के DNA से मैच किया जाता है. दूसरा तरीका यह है कि यदि सीधी चीजें उपलब्ध न हों, तो लापता व्यक्ति के सगे रिश्तेदारों जैसे माता-पिता, बेटा या बेटी से खून के सैंपल लिए जाते हैं. नेपाल पुलिस ने परिजनों से ब्लड सैंपल जुटाने की विशेष अपील की है.

जब सैंपल ले लिए जाते हैं तो दोनों तरफ के डेटा कंप्यूटर सिस्टम में डाला जाता है, उसके बाद फोरेंसिक सॉफ्टवेयर संभावित मैचों का सुझाव देते हैं. जब दोनों डेटा में 100 प्रतिशत मैच पाया जाता है, तभी आधिकारिक तौर पर पहचान बता दी जाती है. 

विदेशी नागरिकों की कैसे की जाती है DNA पहचान ?

इस बाढ़ में कई विदेशी नागरिक भी लापता हैं. उनके लिए नेपाल पुलिस ने एक विशेष और सरल व्यवस्था की है. लापता विदेशी नागरिक के सगे रिश्तेदार (माता-पिता या बच्चे) अपने देश में ही अपना DNA प्रोफाइलिंग टेस्ट करा सकते हैं. इसके बाद वे उस टेस्ट की रिपोर्ट को ईमेल के जरिए नेपाल पुलिस को भेज सकते हैं, जिसे यहां मिले अज्ञात शवों के डीएनए डेटा से मैच किया जाएगा.

भारत कैसे कर रहा है नेपाल की मदद?

नेपाल इस समय इस विशाल फोरेंसिक चुनौती से अकेले नहीं लड़ रहा है. भारत ने भी अपनी विशेषज्ञ टीमें नेपाल भेजी हैं. भारत ने 19 सदस्यों की एक विशेष फोरेंसिक टीम नेपाल भेजी है. यह टीम नेपाल पुलिस की केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला और राष्ट्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला में नेपाली वैज्ञानिकों के साथ मिलकर काम कर रही है ताकि डीएनए सैंपल्स की प्रोसेसिंग को तेज किया जा सके.

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