डीएनए एक्सप्लेनर
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की हालिया कुरिल द्वीप यात्रा ने जापान के साथ 150 साल पुराने विवाद को फिर से गरमा दिया है. जानिए इस विवाद का इतिहास और इसका रणनीतिक महत्व.
Kuril Islands Dispute: रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के हालिया कुरील द्वीप दौरे ने रूस और जापान के बीच दशकों पुरानी कड़वाहट को एक बार फिर हवा दे दी है. पुतिन के इस कदम पर टोक्यो द्वारा रूसी राजदूत को तलब कर कड़ी नाराजगी दर्ज कराई, जिसके जवाब में मॉस्को ने भी जापानी राजदूत को बुलाकर अपना पक्ष रखा. आइए अब जानते हैं कि आखिर इन द्वीपों में ऐसा क्या है, जिसके लिए ये दो शक्तिशाली देश पिछले 150 सालों से लड़ रहे हैं.
रूस और जापान के बीच समुद्र में द्वीपों की एक चेन है जिसे कुरिल द्वीप कहा जाता है. इसमें कुल 56 द्वीप हैं, लेकिन विवाद मुख्य रूप से उन चार द्वीपों को लेकर है जो जापान के होक्काइडो के सबसे करीब हैं. जापान इन्हें अपना 'उत्तरी क्षेत्र' मानता है, जबकि रूस इन्हें कुरिल का हिस्सा कहता है.
विवाद तब और गहरा गया जब पुतिन ने हाल ही में इन द्वीपों का दौरा किया. पुतिन साल 2000 से सत्ता में हैं, लेकिन यह उनका इन द्वीपों का पहला दौरा है. इससे पहले केवल दमित्री मेदवेदेव ही ऐसे रूसी नेता थे जिन्होंने इन द्वीपों की यात्रा की थी. जापान को लगता है कि पुतिन का यह दौरा दोनों देशों के बीच संबंधों को सुधारने की किसी भी कोशिश को और मुश्किल बना देगा.
यह झगड़ा आज का नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें बहुत पुरानी है. साल 1855 में जापान और रूस ने एक संधि की थी जिसमें जापान की संप्रभुता को इन चार द्वीपों पर मान्यता दी गई थी. इसके बाद 1875 में एक और समझौता हुआ, जहां जापान ने सखालिन द्वीप पर अपना हक छोड़कर बदले में पूरे कुरिल द्वीप समूह पर नियंत्रण हासिल कर लिया.
लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के आखिरी दिनों में सोवियत संघ ने इन चार द्वीपों पर कब्ज़ा कर लिया और तब से ही ये द्वीप रूस के नियंत्रण में हैं. बाद में हुई सैन फ्रांसिस्को शांति संधि में जापान ने कुरिल द्वीपों पर से अपना दावा तो छोड़ दिया, लेकिन उसका कहना था कि ये चार द्वीप कुरिल का हिस्सा नहीं बल्कि जापान के अपने निजी क्षेत्र हैं. इस पूरे विवाद में सबसे बड़ी बात यह है कि सोवियत संघ ने इस शांति संधि पर कभी हस्ताक्षर ही नहीं किए थे.
आप सोच रहे होंगे कि कुछ छोटे द्वीपों के लिए रूस इतना अड़ा क्यों है? असल में, इसके पीछे बड़े आर्थिक और सैन्य कारण हैं. इन द्वीपों के आसपास का समुद्री क्षेत्र मछली पकड़ने के लिहाज से दुनिया के सबसे अमीर इलाकों में से एक है. साथ ही, यहां भारी मात्रा में कीमती खनिजों के भंडार होने की भी संभावना है.
कूटनीतिक रूप से ये द्वीप 'सी ऑफ ओखोट्स्क' और प्रशांत महासागर के बीच एक सीमा की तरह काम करते हैं. रूस का नौसैनिक बेड़ा व्लादिवोस्तोक में रहता है. इन द्वीपों के बीच का समुद्री रास्ता सर्दियों में जमता नहीं है, जिससे रूसी जहाजों को साल भर प्रशांत महासागर में आने-जाने का रास्ता मिलता है. रूस ने यहां एंटी-एयर मिसाइल सिस्टम भी तैनात किए हैं.
हाल के वर्षों में दोनों देशों के रिश्ते काफी खराब हुए हैं. जब से रूस ने 2022 में यूक्रेन पर हमला किया है, जापान ने रूस पर कई कड़े प्रतिबंध लगाए हैं. इसके अलावा, हाल ही में जापान में एक बड़े रूसी जासूसी और सैन्य नेटवर्क का भंडाफोड़ हुआ है, जो जापानी सरकार के लिए चिंता का विषय बना हुआ है.