डीएनए एक्सप्लेनर
डोनाल्ड ट्रंप की चाहत के बावजूद अमेरिकी सेना ने ईरान पर हमला क्यों नहीं किया? क्या अमेरिकी राष्ट्रपति की धमकियां हवाहवाई थीं? आइये जानते हैं इसके पीछे के कारण.
ईरान में हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शन ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा. दो हफ्ते से ज्यादा चले इस विरोध प्रदर्शन में 5,000 से ज्यादा लोग मारे गए. जिनमें 500 सैनिक भी शामिल थे. एक समय ऐसा लग रहा था कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर सैन्य हमला कर देंगे. इसके लिए बाक़ायदा कतर, कुवैत, इराक और बहरीन समेत मिडिल ईस्ट के सभी अमेरिकी एयरबेस को खुफिया संदेश भी भेज दिया गया था. लेकिन फिर अचानक ऐसा क्या हुआ की ट्रंप को यूटर्न लेना पड़ा?
दरअसल, इसके पीछे की वजह अमेरिका की सेना को बताया जा रहा है. अंग्रेजी अखबार 'द टेलीग्राफ' के मुताबिक, ट्रंप अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम से निर्णायक प्रहार की गारंटी मांग रहे थे. लेकिन अधिकारियों ने ऐसी कोई गारंटी देने से साफ इनकार कर दिया. अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि अगर ईरान से युद्ध छिड़ा तो वह लंबे समय तक चल सकता है. ऐसे में उसे मिडिल ईस्ट में मौजूद उसके सहयोगियों के समर्थन की जरूरत होगी. लेकिन सऊदी अरब और कतर जैसे देश पहले ही कह चुके हैं कि वह युद्ध के पक्ष में नहीं हैं.
मादुरो को पकड़ने के बाद डोनाल्ड ट्रंप को खामेनेई को हराना आसान लग रहा था, लेकिन हकीकत में ईरान को हराना अमेरिका के अकेले के बसकी बात नहीं है. उसको ऐसा करने के लिए मिडिल ईस्ट के देशों के हवाई अड्डों का इस्तेमाल करना पड़ेगा. लेकिन खामनेई इन देशों को पहले ही धमकी दे चुके हैं कि अगर उनकी जमीन ईरान के खिलाफ हमले के लिए इस्तेमाल हुई तो इसका बुरा परिणाम भुगतना पड़ेगा.
अमेरिका इसका नजारा जून 2025 में भी देख चुका है, जब उसने 'बी-2 बॉम्बर' से ईरान के परमाणु ठिकानों पर बम बरसाए तो ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए सबसे पहले कतर के 'अल उदीद एयरबेस' को निशाना बनाया, जो अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा माना जाता है.
अमेरिकी सेना जानती है कि छोटे-मोटे हमले से ईरान पर कोई असर नहीं पड़ेगा. अयातुल्लाह अली खामेनेई को हराना है तो ईरान पर चारों ओर से हमला करना होगा. लेकिन ऐसा करना उसके लिए आसान नहीं है, क्योंकि सैन्य के साथ ईरान की भौगोलिक स्थिति भी काफी मजबूत है.
एटलस ऑफ वॉर के अनुसार, ईरान चारों ओर से प्राकृतिक सीमाओं से घिरा हुआ है. जिनको पार करना दुश्मन हर सैनिक के बसकी बात नहीं है. ईरान के पूर्व में रेगिस्तान, पश्चिम में ज़ाग्रोस पहाड़, उत्तर में कैस्पियन सागर, एल्बुर्ज पर्वत और दक्षिण में फारस-ओमान की खाड़ी मौजूद हैं.
ईरान में हमला करने के लिए यह सबसे बड़ी मुश्किल खड़ी करते हैं. इनको पार करके हमला करना किसी भी फौज के लिए आसान नहीं होता. इतिहास में इन पहाडों की वजह से आक्रमणकारियों को मुंह की खानी पड़ी है.
1980 के दशक में जब सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला किया तो इराकी सेना ज़ाग्रोस पहाड़ों से आगे नहीं बढ़ पाई थी. सद्दाम हुसैन का मकसद ईरान के अहवाज इलाके पर कब्जा करना था, जो तेल का महत्वपूर्ण इलाका माना जाता है. लेकिन पहाड़ों पर चढ़ते-चढ़ते ही इराकी सेना का दम निकल गया. आखिर में सद्दाम को अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी.
इसी तरह अगर कोई देश की सेना ईस्ट से ईरान पर हमला करना चाहे, तो उसको पहले 'दश्त-ए-लूत' और 'दश्त-ए-कवीर' जैसे बड़े रेगिस्तान से गुजरना पड़ेगा. फिर ईरानी सेना भी इन इलाकों पर पैनी नजर रखती है. यही प्राकृतिक चीजें ईरान को सेना से ज्यादा सुरक्षा रखती हैं.
दुनिया के 145 देशों की सैन्य ताकत में ईरान 16वें स्थान पर हैं. उसके पास 6.10 लाख एक्टिव सेना और 3.50 लाख रिजर्व फोर्स सैनिक हैं. यानी सैनिकों की कुल संख्या 9.60 लाख है. ईरान के पास रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कोर (IRGS) अलग यूनिट है, जिन्हें हर युद्ध को लड़ने में माहिर माना जाता है. इसके अलावा 551 फाइटर जेट, 147 एसेट, 25 सबमरीन हैं. अनमैन्ड एरियल व्हीकल के मामले में भी ईरान दुनिया के टॉप देशों में शामिल है.
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