डीएनए एक्सप्लेनर
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर आइए एक लिटमस टेस्ट करें कि आप दिन भर में महिलाओं का कितना सम्मान करते हैं. मां-बहन की गालियां देकर आप उन्हें कितना सम्मान देते हैं.
International Women’s Day 2025: आज सभी महिलाओं के सम्मान में गीत गा रहे हैं क्योंकि महिल दिवस है. संस्थाओं में महिला कर्मचारियों को बढ़िया-बढ़िया तोहफे दिये जा रहे हैं तो सरकारें योजनाओं को माइक 'बजा' रही हैं. पर ये एक दिन की चांदनी फिर वही रोजमर्रा का किस्सा बनकर रह जाता है. एक तरफ महिला दिवस मनाकर महिलाओं को सम्मान देंगे, रक्षाबंधन पर बहनों की रक्षा का वादा करेंगे, नवरात्रों में उन्हें देवी बनाकर पूजेंगे फिर गुस्से में आकर तेरी मां की...उसकी मां की...कर डालेंगे.
India's Got Latent शो हो या आपके हमारे मोहल्ले का चाक-चौराहा हर तरफ तेरी मां की..., उसकी मां की..., तेरी बहन की...उसकी बहन की... जैसी गालियां सुनने को मिलती हैं. दरअसल ये गालियां सिर्फ गुस्सा ही नहीं खुशी का इजहार करने के लिए भी लोग भाव-विभोर होकर देते हैं. सोशल मीडिया जैसे प्लेटफॉर्मस ने गालियों का 'डिजिटलाइजेशन' किया है. तो आइए हम अपने इस सभ्य समाज में महिलाओं को कितना सम्मान हर दिन देते हैं, उसका लिटमस टेस्ट करें और फिर सोचें कि हैप्पी वुमन्स डे कहें या गालियों से भरी जुबान पर रस्सी कसें.
किसी भी समाज की मानसिकता को समझने के लिए उसकी भाषा पर ध्यान देना काफी अहम होता है. अगर आपकी गालियों की बुनियाद महिलाओं के शरीर और रिश्तों पर टिकी हुई है, तो यह साफ है कि आपके भीतर सम्मान का कोई तत्व नहीं बचा है. गाली देने वाले को यह एहसास भी नहीं होता कि वह जिस मां-बहन की इज्जत की कसमें खाता है, उसी का अपमान कर रहा है. कहते हैं, जीभ में हड्डी नहीं होती लेकिन उससे निकले शब्दों में इतनी ताकत होती है कि हड्डी जितनी चोट पहुंचाएगी उतनी ही गालियां पहुंचाती हैं. जीभ किसी लाठी से कम नहीं होती अगर सधे हुए तरीके से न बोला जाए तो.
कुछ लोग सफाई देते हैं, 'अरे, इसमें कौन-सी बड़ी बात है, ये तो बस बोलने की आदत है.' तो भाईयों और उनकी बहनों, आदतें तो बदली जा सकती हैं, फिर गालियों वाली आदत को संस्कारों से धोने में इतनी दिक्कत क्यों? गालियां आप इसलिए देते हैं क्योंकि समाज ने महिलाओं के जननांगों को लेकर दी जाने वाली गालियों को स्वीकार कर लिया है. आपके दिमान ने गालियों को स्वीकार कर लिया है, पर इच्छाशक्ति से बड़े-बड़े रोग ठीक हो जाते हैं फिर ये तो सिर्फ एक आदत है.
गौर करने वाली बात यह भी है कि अधिकतर गालियां महिलाओं के चरित्र और रिश्तों पर प्रहार करती हैं, जबकि पुरुषों के लिए ऐसी कोई डेडिकेटेड गालियां नहीं मिलतीं. अगर पुरुषों को गाली दी भी जाती है, तो उसमें भी 'तेरी मां-बहन की…'जोड़ दिया जाता है. यही नहीं अगर किसी चीज को लेकर वादा भी करना होता है तो उसमें भी मां-बहन की ही कस्में खिलवाई जाती हैं. मतलब अच्छा हो या बुरा सब महिलाओं के जिम्मे. यानी समस्या पुरुष के व्यवहार की नहीं, बल्कि महिला से जुड़े उसके रिश्तों की है. ऐसे में सवाल उठता है कि गाली देने वाले को खुद अपने अस्तित्व पर शर्म क्यों नहीं आती?
वहीं कुछ लोगों का तर्क होता है कि मां-बहन की गाली देकर वे सामने वाले पुरुष को नीचा दिखाना चाहते हैं क्योंकि महिला तो उनके घर की इज्जत है. इसका जवाब दिवंगत समाजसेविका और नारी मुद्दों पर प्रखर रूप से बोलने वाली कमला भसीने आमिर खाने के शो सत्यमेव जयते में कहा था, 'किसने कहा है महिलाओं की योनी में इज्जत रखने को.' उनकी इस बात की परतें खोली जाएं तो कई मायने हो सकते हैं. पुरुष समाज को लगता है कि दूसरे के घर की महिला को गाली देकर उस पुरुष का मान-सम्मान गिराया जा सकता है, पर दोस्त सच ये नहीं है. किसी का अपमान करके आप अपना मान-सम्मान बढ़ाएंगे. अगर सम्मान बढ़ाना है तो खुद मेहनत करें, किसी को गाली देकर खुद को तुच्छ न बनाएं.
सोशल मीडिया पर महिला अधिकारों पर ज्ञान देने वाले कितने लोग खुद इस भाषा के दोषी हैं? दिनभर 'महिला सम्मान' की पोस्ट लिखने वाले वही लोग किसी बहस में हारते ही सामने वाले की मां-बहन को बीच में घसीट लेते हैं. गालियों से महिलाओं को अपमानित करना अगर शक्ति प्रदर्शन है, तो फिर महिला सुरक्षा और सम्मान की बातें महज दिखावा हैं. यही नहीं आजकल तो ऐसे अकाउंट्स बन गए हैं जिनका नाम पता कुछ नहीं मालूम होता और महिलाओं विशेषकर सेलिब्रिटीज को गालियां देकर निकल जाते हैं. उन्हें नहीं मालूम कि उनकी इन गालियों का महिलाओं के मन पर कितना गहरा असर पड़ता है.
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अगर आपको सच में लगता है कि आप महिलाओं का सम्मान करते हैं, तो यह सम्मान सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट, त्योहारों पर शुभकामनाएं देने या महिला दिवस पर गिफ्ट्स या सुंदर पोस्ट, स्टेट्स लगाने से नहीं होगा. महिलाओं को सम्मान देना है तो अपनी जुबान पर लगाम करिए. भाषा पर काम करिए. अपने गुस्से और अपमान के लिए किसी महिला को माध्यम बनाना बंद करें. जब तक गालियों से महिलाओं का अपमान किया जाता रहेगा, तब तक 'महिला सशक्तिकरण' की बातें खोखली रहेंगी. तो अगली बार जब आप महिला सम्मान की बात करें, पहले खुद का लिटमस टेस्ट जरूर कर लें. कहीं आप भी उन दोहरे चरित्र वालों की कतार में तो नहीं खड़े? जब इस लिटमस टेस्ट में पास हो जाएं फिर कहिएगा हैप्पी वुमन्स डे! शायद तब आप आपकी पत्नी या प्रेमिका को और ज्यादा अच्छे लगने लगें और वे भी कह उठेंगी 'बड़े अच्छे लगते हैं...'
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