डीएनए एक्सप्लेनर
भारतीय सेना ने TATA और NIBE के साथ 840 लॉन्ग-रेंज अटैक ड्रोन के लिए ₹1,577 करोड़ है. जानें कैसे ये स्वदेशी ड्रोन दुश्मन के ठिकानों को घर में घुसकर तबाह करेंगे.
Indian Army Drone Deal: भारत ने अपने डिफेंस सेक्टर में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है. 15 अगस्त 2026 को जब पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था, उसी समय भारतीय सेना भविष्य की लड़ाइयों के लिए एक बड़ी तैयारी पुख्ता कर रही थी.
सेना ने ₹1,577 करोड़ की लागत से 840 लॉन्ग-रेंज अटैक ड्रोन खरीदने के लिए दो प्रमुख भारतीय कंपनियों TATA Advanced Systems Limited और NIBE Defence के साथ कॉन्ट्रैक्ट साइन किए हैं.
यह सौदा केवल हथियारों की खरीद नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि अब भारतीय सेना 'ट्रेडिशनल वॉरफेयर' से आगे बढ़कर 'प्रिसिजन' और 'ड्रोन-लेड वॉरफेयर' की ओर रुख कर चुकी है. आज के इस Explainer में हम समझेंगे कि ये ड्रोन क्या हैं, ये कैसे काम करते हैं और इनसे चीन-पाकिस्तान सीमा पर भारत की ताकत कितनी बढ़ जाएगी.
भारतीय सेना ने अपनी मारक क्षमता को आधुनिक बनाने के लिए एक लंबी प्रक्रिया के बाद यह फैसला लिया है. कड़े ट्रायल्स और तकनीकी मूल्यांकन के बाद TATA को इस ऑर्डर का 64% हिस्सा मिला है क्योंकि वे सबसे कम बोली लगाने वाले रहे, जबकि बाकी 36% हिस्सा NIBE Defence को दिया गया है.
ये ड्रोन साधारण सर्विलांस ड्रोन नहीं हैं, बल्कि ये 'वन-वे अटैक ड्रोन' हैं, जिन्हें सैन्य भाषा में 'लोइटरिंग म्युनिशन्स' भी कहा जाता है. ये हवा में काफी देर तक मंडरा सकते हैं और जैसे ही दुश्मन का टारगेट मिलता है, ये उस पर आत्मघाती हमला कर उसे तबाह कर देते हैं.
आजकल की जंगों में ड्रोन सबसे बड़े गेम-चेंजर साबित हो रहे हैं. चाहे रूस-यूक्रेन का युद्ध हो या पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, ड्रोन ने कम लागत में महंगे टैंकों और एयर डिफेंस सिस्टम को मटियामेट कर दिया है. भारतीय सेना ने इन्हीं अनुभवों से सबक लेते हुए यह बड़ा निवेश किया है.
इस डील की सबसे खास बात यह है कि सेना ने 'ऑपरेशन सिंदूर' से मिली सीख को इसमें शामिल किया है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह महसूस किया गया था कि दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक हमलों के बीच भी कॉम्बैट क्षमता बनाए रखना कितना जरूरी है. इसीलिए इन नए ड्रोन्स को खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर से लड़ने के लिए डिजाइन किया गया है.
इन ड्रोन्स की तकनीक आपको हैरान कर देगी:
इन ड्रोन्स को मुख्य रूप से भारतीय सेना की रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी को सौंपा जाएगा. सेना ने ड्रोन युद्ध के लिए पहले ही खास यूनिट्स बनाई हैं, जिन्हें 'शक्तिबाण' रेजिमेंट और 'दिव्यास्त्र' बैटरियां कहा जाता है. इन ड्रोन्स के आने से इन रेजिमेंट्स की मारक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी.
असल में, यह सौदा देश की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए बहुत जरूरी है. यह पूरा प्रोजेक्ट भारतीय कंपनियों को मिला है. इससे देश में ही हथियार बनाने की क्षमता बढ़ेगी और विदेशों पर निर्भरता घटेगी.
इसके अलावा, लड़ाकू विमान या मिसाइल के मुकाबले ये ड्रोन काफी सस्ते होते हैं, लेकिन इनका वार उतना ही खतरनाक होता है. इसकी मदद से भारतीय सेना सीमा पार की घुसपैठ और तोपखाने के हमलों का करारा जवाब दे पाएगी, और इसमें हमारे सैनिकों की जान का कोई खतरा भी नहीं होगा.