डीएनए एक्सप्लेनर
2017 में सभी टैक्सों को खत्म कर जीएसटी की शुरुआत की गई थी. पिछले आठ सालों में टैक्स से सरकार को मिलने वाले राजस्व में तीन गुना इजाफा हुआ. पहले साल यानी 2017-18 में जीएसटी कलेक्शन 7.41 लाख करोड़ रुपये था.
जीएसटी काउंसिल ने बुधवार को एक साथ ही सबकी हसरत पूरी कर दी- राज्य सरकारों से लेकर मिड्ल क्लास और बिजनेस क्लास तक की. जीएसटी सुधार का जो ऐलान काउंसिल की मीटिंग के दौरान किया गया, उसका संकेत पीएम नरेंद्र मोदी ने इस साल 15 अगस्त को अपने भाषण में दिया था. बुधवार को बड़े बदलावों की घोषणा की गई जो 22 सितंबर से लागू होंगे. नई व्यवस्था में टैक्स के अब दो ही स्लैब होंगे- 5 और 18 प्रतिशत. इसके अलावा सुपर लग्जरी और हानिकारक उत्पादों के लिए 40 प्रतिशत का अलग स्लैब होगा. नई दरों के लागू होने के बाद रोजमर्रा की कई चीजें सस्ती हो जाएंगी और मिड्ल क्लास का जीवन आसान होगा. बिजनेस की लागत और ऑपरेशनल कॉस्ट में कमी आएगी. साथ ही, टैक्स संबंधी उलझनें कम होंगी. राज्यों को टैक्स से होने वाली आमदनी बढ़ेगी और मदद के लिए केंद्र पर उनकी निर्भरता कम होगी. कहा जा रहा है कि नई दरों के लागू होने से रेवेन्यू कलेक्शन में करीब 40 हजार करोड़ की कमी आ सकती है. ये सही है, लेकिन इस कमी को एकबारगी राजस्व का नुकसान बताना शायद ठीक नहीं है. इसकी वजह जानने से पहले जान लीजिए कि जीएसटी की शुरुआत के बाद से रेवेन्यू कलेक्शन में क्या बदलाव आए हैं.
2017 में सभी टैक्सों को खत्म कर जीएसटी की शुरुआत की गई थी. पिछले आठ सालों में टैक्स से सरकार को मिलने वाले राजस्व में तीन गुना इजाफा हुआ. पहले साल यानी 2017-18 में जीएसटी कलेक्शन 7.41 लाख करोड़ रु था. 2018-19 में ये बढ़कर 11.77 लाख करोड़, 2019-20 में 12.22 लाख करोड़, 2020-21 में 11.37 लाख करोड़ और 2021-22 में 14.83 लाख करोड़ रु हो गया. अगले तीन साल यानी 2024-25 तक ये बढ़कर 22.08 लाख करोड़ पहुंच गया. वित्त मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक इस साल अगस्त महीने में जीएसटी कलेक्शन 1.86 लाख करोड़ है.
जीएसटी की दरों में कमी से सरकार की आमदनी में शुरुआती कमी आना तय है. अनुमान है कि यह कमी 40 हजार करोड़ के आसपास हो सकती है. लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर हो सकती है. दरअसल, आर्थिक मामले एक-दूसरे से जुड़े होते हैं. एक छोटे फैसले का असर उन चीजों पर हो जाता है जो उससे सीधे संबंधित भी नहीं होतीं. जीएसटी की दरों में कमी से खाने-पीने, कंज्यूमर और डोमेस्टिक प्रोडक्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक और एग्रीकल्चर उत्पाद, वाहन और कपड़े- ये सब सस्ते हो जाएंगे. इसका मतलब है कि आम लोगों की क्रय क्षमता बढ़ेगी. मार्केट में डिमांड बढ़ेगी तो सप्लाय बढ़ेगा. इससे प्रोडक्टिविटी बढ़ेगी और मनी फ्लो बनेगा. आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी और अंततः इससे सरकार का राजस्व भी बढ़ेगा. इस नजरिये से देखें तो जीएसटी की दरों में बदलाव देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर हो सकता है.
जीएसटी काउंसिल के फैसले का एक पक्ष कर से राज्यों को होने वाली आदनी से भी जुड़ा है. इस लिहाज से देखें तो राज्यों के लिए भी यह फायदे का सौदा है. ताजा फैसले में वाहनों पर लगने वाले कंपनसेशन सेस को खत्म कर दिया गया है. इसकी जगह या तो वाहन की कीमत कर दी गई है या फिर उस पर बढ़ा हुआ जीएसटी लगाया गया है. यह 40 फीसदी है. इसका आधा यानी 20 फीसदी अब राज्यों को मिलेगा जबकि कंपनसेशन सेस में उनकी कोई भागीदारी नहीं होती थी. जीएसटी से होने वाली कमाई में राज्यों का हिस्सा भी बढ़ सकता है. दरअसल, एसबीआई के एक रिसर्च पेपर के अनुसार किसी राज्य में जीएसटी की जितनी वसूली होगी, उसमें से आधे-आधे का बंटवारा होगा. फिर केंद्र के हिस्से में से भी 41 प्रतिशत उन्हें वापस मिलेगा. सीधे शब्दों में कहें तो किसी राज्य में 100 रु जीएसटी की वसूली में उसका हिस्सा 70.5 रु हो जाएगा.
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