डीएनए एक्सप्लेनर
क्या आजीवन कारावास या उम्र कैद की सजा में पूरी जिंदगी जेल की सलाखों के पीछे काटनी होती है या फिर एक निश्चित समय के बाद रिहाई हो जाती है? डीएनए एक्सप्लेनर में समझिए हर एक बात...
आज सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की विभिन्न जेलों में बंद ऐसे सभी कैदियों की तत्काल रिहाई का आदेश दिया है जो कोर्ट की ओर से तय की गई निश्चित समयावधि की उम्रकैद की सज़ा पूरी कर चुके हैं. इसके अलावा कोर्ट ने नीतीश कटारा मर्डर केस में आरोपी सुखदेव पहलवान को भी रिहा करने का आदेश दिया और कहा कि 10 मार्च को उसकी रिहाई हो जानी चाहिए थी. उसके बाद उसे जेल में रखना गैरकानूनी है.
सुखदेव पहलवान का कहना था कि उसकी हाई कोर्ट की ओर से तय की गई 20 साल की सजा मार्च 2025 में पूरी हो गई है लेकिन सेंटेंस रिव्यू बोर्ड की मंजूरी न मिलने के चलते उसकी रिहाई नहीं हो पाई है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में कहा है कि अगर किसी व्यक्ति को कोर्ट से निश्चित समयावधि (मसलन 20 साल) की उम्रकैद की सजा हुई है तो वो उस अवधि की सज़ा जेल में काटने के बाद रिहाई का हकदार है. उसे सज़ा में छूट की उस प्रकिया (remission) को अपनाने की ज़रूरत नहीं है जो उम्र कैद की सजा पाने वाले दूसरे कैदियों के केस में होती है.
अक्सर हम अखबारों या न्यूज चैनलों में यह पढ़ते और सुनते रहते हैं कि किसी अपराधी को उम्र कैद की सजा दी गई है. उम्र कैद को वैसे तो लोग मरते दम तक जेल में रहना समझते हैं लेकिन कई बार यह आम धारणा भी देखी गई है कि कोर्ट जब उम्र कैद की सजा देती है तो इसका मतलब है कि कैदी 14 साल जेल की सजा काटने के बाद बाहर आ जाता है. अब इस धारणा में कितनी सच्चाई है इसके बारे में हम आपको आगे बताने वाले हैं.
भारतीय न्याय संहिता के मुताबिक उम्र क़ैद या आजीवन कारावास का मतलब है दोषी को पूरे जीवन भर के लिए जेल में रखना. ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि उम्र कैद सिर्फ 14 साल तक ही सीमित है. इसके अलावा साल 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में साफ कर दिया था कि उम्रकैद की सजा का मतलब आजीवन कारावास से है और अपराधी को उम्र भर जेल में बंद रहकर सजा काटनी होगी. हालांकि कई बार कोर्ट एक निश्चित समयसीमा की उम्र कैद की सजा सुनाता है जिसे पूरा करने के बाद कैदी की रिहाई हो जाती है.
लेकिन कोर्ट का काम सिर्फ सजा सुनाना है और उस सजा का पालन करवाना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है. उम्रकैद की सजा पाए कैदी के 14 साल की सजा काटने के बाद उसका केस सेंटेंस रिव्यू कमेटी के पास भेजा जाता है. कैदी के अच्छे आचरण को देखते हुए यह कमेटी उसकी सजा को कम कर सकती है. इस वजह से कैदी 14 या 20 साल के बाद जेल से छूट जाता है. हालांकि कई बार कोर्ट जघन्य अपराध करने पर अपराधी को जिंदा रहने तक उम्रकैद की सजा देती है जिसमें उसकी सजा को माफ नहीं किया जा सकता.
इस तरह कैदी की सजा को माफी उस कैदी का अधिकार नहीं बल्कि सरकार का विवेकाधीन फैसला होता है. किसी भी कैदी को रिहा करना या न करना राज्य सरकार, राज्यपाल या राष्ट्रपति की अनुमति और नीतियों पर निर्भर करता है.
अमनून उम्रकैद के मामलों में 14 साल की सज़ा काटने के बाद राज्य सरकार सज़ा में छूट का फैसला लेती है. सरकार रिव्यू बोर्ड और सज़ा सुनाने वाले ट्रायल कोर्ट के जज की सहमति के बाद ऐसा फैसला लेती है.
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