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11 करोड़ आबादी, 4 Namo सिटी और 30 मिनट की कनेक्टिविटी! बदलने वाला है दिल्ली-NCR का चेहरा, क्या है मास्टर प्लान

दिल्ली-एनसीआर अगले कुछ दशकों में भारत के सबसे बड़े शहरी बदलाव का गवाह बनने जा रहा है. साल 2041 तक इस पूरे क्षेत्र की आबादी लगभग दोगुनी होने का अनुमान है, जिसे संभालने के लिए सरकार खास प्लान लेकर आई है.

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11 करोड़ आबादी, 4 Namo सिटी और 30 मिनट की कनेक्टिविटी! बदलने वाला है दिल्ली-NCR का चेहरा, क्या है मास्टर प्लान

दिल्ली-NCR के कायाकल्प का मेगा प्लान (AI Image)

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  • साल 2041 तक दिल्ली-एनसीआर की आबादी लगभग दोगुनी होने का अनुमान 
  • इस भारी बोझ को संभालने के लिए एक मल्टी-नोडल ढांचा किया जाएगा तैयार 
  • 20 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश की उम्मीद
  • दिल्ली एनसीआर के किसी भी कोने में अधिकतम 30 मिनट में सफर का है प्लान

दिल्ली और उसके आसपास का इलाका यानी दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) आने वाले समय में एक ऐसे बड़े बदलाव से गुजरने जा रहा है, जिसकी कल्पना शायद पहले कभी नहीं की गई थी. साल 2041 तक इस पूरे क्षेत्र की आबादी लगभग दोगुनी होकर 11 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है. इस भारी-भरकम आबादी को संभालने के लिए सरकार सिर्फ नई सड़कें बनाने या नए घर खड़े करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र के भूगोल और काम करने के तरीके को ही बदलने की तैयारी चल रही है.

एनसीआर प्लानिंग बोर्ड द्वारा तैयार किए गए रीजनल प्लान 2041 के ड्राफ्ट में इस महाकायाकल्प का पूरा ब्लूप्रिंट छिपा है. इस नए प्लान के केंद्र में हैं- ₹5,000 करोड़ के बजट से बनने वाले चार नए 'नमो सिटीज' और '30-मिनट एनसीआर' का एक बेहद महत्वाकांक्षी वादा. इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में हाई-स्पीड पब्लिक ट्रांसपोर्ट की मदद से लोग एनसीआर के किसी भी कोने से अपने दफ्तर, घर या बाजार तक सिर्फ आधे घंटे में पहुंच सकेंगे.

दिल्ली पर निर्भरता कम करने का नया मॉडल

इस नए बदलाव की टाइमलाइन को समझें तो साल 2011 में एनसीआर की कुल आबादी करीब 5.81 करोड़ थी, जिसके 2041 तक बढ़कर 11.3 करोड़ होने की उम्मीद है. रोजगार और बेहतर जिंदगी की तलाश में लोग तेजी से शहरों की तरफ भाग रहे हैं. अब तक इस आबादी का सारा बोझ दिल्ली, गुरुग्राम और नोएडा जैसे शहरों ने उठाया है, लेकिन अब यह मॉडल अपनी आखिरी सीमा पर पहुंच चुका है. दिल्ली अब अकेले नौकरियों और बुनियादी ढांचे का बोझ नहीं उठा सकती.

जब आबादी 11 करोड़ के आंकड़े को छूने लगेगी, तब हमें विकास को किसी एक शहर में समेटने के बजाय अलग-अलग छोटे-छोटे केंद्रों में बांटना होगा. यह नया प्लान दिल्ली-केंद्रित विकास से हटकर एक ऐसे मल्टी-नोडल ढांचे की तरफ इशारा करता है, जिसे रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम, मेट्रो नेटवर्क और नए ग्रीनफील्ड शहर मिलकर सपोर्ट करेंगे. नाइट फ्रैंक इंडिया की एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्लान से रियल एस्टेट, ट्रांसपोर्ट और शहरी बुनियादी ढांचे में ₹20 लाख करोड़ से ज्यादा के निवेश के रास्ते खुलेंगे. 

क्या है नमो सिटीज का फॉर्मूला?

  • इस पूरे प्लान का सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला हिस्सा है '30-मिनट एनसीआर'. 
  • इसका मकसद बेहद सीधा है- हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, मेट्रो लाइनों और एक्सप्रेसवे का एक ऐसा जाल बिछाना.
  • जिससे दो बड़े कमर्शियल या रेजिडेंशियल इलाकों के बीच का सफर 30 मिनट से ज्यादा का न हो.
  • जब कनेक्टिविटी इतनी शानदार होगी, तो लोगों के रहने और काम करने की जगहें भी बदल जाएंगी.
  • लोग दिल्ली की भीड़भाड़ से दूर एनसीआर के बाहरी इलाकों में भी सुकून से रह सकेंगे और आधे घंटे में अपने काम पर पहुंच सकेंगे.  

आम स्मार्ट सिटी से होंगी बिल्कुल अलग

वही दूसरी तरफ, चार ग्रीनफील्ड नमो सिटीज का प्रस्ताव इस योजना का सबसे बड़ा गेम-चेंजर माना जा रहा है. ये आम स्मार्ट सिटी से बिल्कुल अलग होंगे. जहां आम स्मार्ट सिटी पुरानी बसावट को ही तकनीक के सहारे अपग्रेड करती हैं, वहीं नमो सिटीज को बिल्कुल शुरुआत से एक आत्मनिर्भर शहर के रूप में विकसित किया जाएगा. ये शहर नमो भारत आरआरटीएस स्टेशनों के आसपास ट्रांजिट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट मॉडल पर बनेंगे.

फिलहाल ये शहर उत्तर प्रदेश (नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ, हापुड़, बुलंदशहर), हरियाणा (गुरुग्राम, सोनीपत, पानीपत, रेवाड़ी) या राजस्थान (अलवर, भरतपुर) के एनसीआर जिलों में आकार ले सकते हैं. सबसे खास बात यह होगी कि इन शहरों में सिर्फ घर नहीं होंगे, बल्कि इनके पास अपने खुद के लॉजिस्टिक्स हब, इंडस्ट्रियल क्लस्टर और रोजगार के साधन होंगे, ताकि लोगों को नौकरी के लिए दिल्ली की तरफ न भागना पड़े. 

Namo city

जमीन की कमी और आसमान की तरफ बढ़ते कदम

एक तरफ जहां नए शहरों को बसाने की तैयारी है, वहीं दिल्ली जैसे मौजूदा शहरों को भी नया रूप दिया जा रहा है. दिल्ली में अब जमीन लगभग खत्म हो चुकी है, जबकि इसकी आबादी का घनत्व साल 2011 के 11,320 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 2041 तक 20,770 होने की उम्मीद है. ऐसे में दिल्ली के पास अब क्षैतिज यानी जमीन पर फैलने का रास्ता नहीं है, उसे आसमान की तरफ यानी वर्टिकल बढ़ना ही होगा. 

यही वजह है कि इस प्लान में मेट्रो और आरआरटीएस कॉरिडोर के आसपास फ्लोर एरिया रेशियो और फ्लोर स्पेस इंडेक्स के नियमों को आसान बनाने की बात कही गई है. इसका फायदा यह होगा कि रेलवे स्टेशनों के पास ही ऐसी बहुमंजिला इमारतें बन सकेंगी जहां लोग रह भी सकेंगे, काम भी कर सकेंगे और मनोरंजन भी कर सकेंगे. इससे सफर की जरूरत ही काफी हद तक कम हो जाएगी. 

जमीन पर काम उतारना होगी असली परीक्षा

योजना जितनी शानदार दिख रही है, उसकी सफलता पूरी तरह से इस बात पर टिकी है कि इसे जमीन पर कितनी सटीकता से लागू किया जाता है. एनसीआर का दायरा 55,000 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा में फैला है. इतने बड़े पैमाने पर विकास करने के लिए बहुत भारी निवेश और आधुनिक कंस्ट्रक्शन तकनीकों की जरूरत होगी. 

रियल एस्टेट डेवलपर्स को उम्मीद है कि आने वाले समय में गुरुग्राम और नोएडा में जमीन की बढ़ती कीमतों और दबाव के चलते फरीदाबाद, द्वारका एक्सप्रेसवे और ग्रेटर नोएडा जैसे इलाके नए बड़े ग्रोथ सेंटर बनकर उभरेंगे. कुल मिलाकर, रीजनल प्लान 2041 दिल्ली को एक बड़े बोझ से मुक्त करने और पूरे एनसीआर को एक आधुनिक, आपस में जुड़े हुए शहरों के नेटवर्क में बदलने का भारत का अब तक का सबसे बड़ा और महत्वाकांक्षी प्रयोग बनने जा रहा है.

 

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