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सास दामाद लव स्टोरी : औरत जब प्यार करे तो बदचलन, हिंसा सहे तो 'संस्कार', आखिर सास की मुहब्बत 'बेशर्मी' कैसे?

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में सास और दामाद के बीच अनोखे प्रेम की कहानी सामने आई. इस प्रेम कहानी पर चारों तरफ चर्चाएं आज भी नहीं रुक रही हैं. सवाल ये है कि आखिर हर बार कोई महिला ही टारगेट क्यों होती है?

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सास दामाद लव स्टोरी : औरत जब प्यार करे तो बदचलन, हिंसा सहे तो 'संस्कार', आखिर सास की मुहब्बत 'बेशर्मी' कैसे?
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Aligarh mother-in-law son-in-law love story: उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ की सास-दामाद की लव स्टोरी इन दिनों चर्चा का विषय है. सोशल मीडिया हो या मेनस्ट्रीम मीडिया या फिर आपका हमारा-गली मोहल्ला, चाक-चौराहा हर तरफ इसी प्रेम प्रसंग की हवा हवाओं में है. कुछ लोगों ने इस मुद्दे पर ऐसे चटकारे लेकर लिखा कि उनकी महिलाओं के प्रति सोच की कलई खुल गई. 

सास दामाद के साथ भाग गई... सास को अपनी उम्र का लिहाज नहीं हुआ... सास ने हमारे बेटे पर वशीकरण किया... सास अपने घर से जेवरात और पैसे लेकर भाग गई...,अलीगढ़ की सपना पर ये सब आरोप ऐसे लगे जैसे उसने प्यार नहीं कितना बड़ा गुनाह, अपराध और बेशर्मी का काम किया है. 
 
लिखने वालों ने ऐसे लिखा जैसे उसके चरित्र का हनन कर रहे हों और वो नए जमाने की द्रौपदी बन गई हो. सभी ने ये तो लिखा और कहा कि सास दामाद के साथ भागी पर किसी ने ये नहीं कहा कि दामाद सास लेकर भागा? या फिर सास को दामाद के साथ भागने की जरूरत क्यों पड़ी? सास ने यह भी कहा कि उसका पति उसे शराब पीकर पीटता था. समाज के सामने उसकी बेइजज्ती करता था. इन सवालों पर किसी ने प्रकाश डालने की जहमत नहीं उठाई क्योंकि समाज ने पिटती औरतें स्वीकार कर ली हैं. 

भारत में बेमेल विवाह और उसकी वजह से पत्नियों की शारीरिक और मानसिक जरूरतों का खालीपन का न भर पाना, समाज को दिखाई नहीं देता. भारत में तो अगर 40 पार की औरत डार्क लिपिस्टिक भी लगा ले तो भी चरित्र के कई पैमानों में आंकी जाती है और सेक्शुअल डिजायर या लव डिजायर खुलकर पेश कर देना तो यहां 'पाप', 'बेशर्मी' ही माना जाएगा. इसका ताजा उदाहरण 'मिसेज' मूवी है. बढ़ती उम्र की महिलाओं की इच्छाओं को और समझना हो तो लिप्स्टिक अंडर माय बुर्का (lipstick under my burkha) भी देखी जा सकती है.  

दुख की बात ये  है कि जब कोई महिला विशेषकर उम्रदराज महिला या फिर सास की कैटेगरी वाली महिला किसी पुरुष को पसंद करे और पसंद के पुरुष के साथ चली जाए तो 'बदचलन' का ठप्पा लगा दिया जाता है. उसके प्यार को अपमान और शर्मिंदगी सहनी पड़ती है. वहीं, कोई उम्रदराज पुरुष किसी स्त्री के साथ संबंध बनाए तो 'लक्की मैन' का तमगा मिलता है. यही नहीं  सरकारें भी 'लड़कों से गलती हो जाती है', जैसी बातें बोलकर उन गलतियों को ढक देती हैं.

अब समाज को समझना होगा कि औरतों को पसंद, प्यार, अपने मनमुताबिक काम करने को उनके चरित्र से आंकना बंद करना होगा. अगर कोई स्त्री आपके साथ नहीं रहना चाहती तो पहले खुद को आंकिए. बाद में दूसरों पर उंगली उठाइए. खुद को आंकने का यह मतलब भी नहीं कि फांसी का रास्ता चुना जाए. खुद की मर्दानगी को पॉजिटिव मर्दानगी, तनाव को मैनेज करने की कला और दूसरों को आजादी देकर कैसे खुश रहा जाए, ये सीखना होगा. 


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समाज की यह दोहरी मानसिकता, जहां एक औरत की इच्छाएं, गलतियां और स्वतंत्रता को नैतिकता के तराजू पर तौला जाता है, जबकि पुरुषों की हिंसा, गलत फैसलों और गैरजिम्मेदाराना हरकतों को नजरअंदाज किया जाता है. बात सिर्फ सास या ससुर की नहीं है, बात इस सोच की है, जो औरत के हर कदम पर सवाल उठाती है, लेकिन मर्द की हिंसा को आदत मान लेती है. बदलाव तभी आएगा, जब समाज का तराजू बराबरी से तौलेगा. औरत भी एक इंसान है, 'इज्जत की रखवाली' नहीं, ये बात समाज को समझनी होगी. 

   

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