डीएनए एक्सप्लेनर
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों की आवाजाही ठप होने या उन पर हमले होने से वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं. इससे दुनिया भर में ईंधन महंगा हो रहा है और मुद्रास्फीति बढ़ रही है. भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी बड़ी एशियाई अर्थव्यवस्थाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हैं.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अब सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं रहा. यह ईरान के लिए किसी भी विदेशी हमले के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बन गया है. ईरान अब इस बारे में सोच भी नहीं रहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए सामान्य रूप से कैसे खोला जाए. वह अब इस जलमार्ग पर अपना पूर्ण स्वामित्व और संप्रभुता स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. ईरान इस जलमार्ग से गुजरने वाले हर जहाज पर अपनी शर्तें थोप रहा है. बिना अनुमति के जा रहे जहाजों पर ईरान ने हमले भी किए हैं. आखिर ईरान ऐसा क्यों कर रहा है और वह होर्मुज पर नियंत्रण को इजरायल और अमेरिका के खिलाफ उसकी सबसे बड़ी सुरक्षा गारंटी क्यों मान रहा है? आइये जानते हैं विस्तार से.
ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों से पहले तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एक आम समुद्री रास्ता था. यहां से पूरी दुनिया में कच्चे तेल और गैस की सप्लाई होती थी. लेकिन ईरान ने जैसे ही इस संकरे समुद्री रास्ते को नियंत्रण में लिया, पूरी दुनिया में हाहाकार मच गया. दरअसल, ईरान हमेशा से होर्मुज स्ट्रेट को फारस साम्राज्य का प्रवेश द्वार मानता आया है. 550 ईसा पूर्व में साइरस द ग्रेट के समय से लेकर आज तक ईरान यही मानता आया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर उसका हक है.
अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ युद्ध इसलिए शुरू किया था ताकि वह परमाणु बम न बना सके. लेकिन ईरान ने होर्मुज को ही हथियार बना दिया. शुरू में दुनिया को भले ही ये लगा हो कि ये सब कुछ दिनों की बात है. लेकिन अब ये साफ हो गया है कि ईरान के हाथ परमाणु बम से भी ताकतवर हथियार लग गया है. ईरान जब चाहे तब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था हिला सकता है.
दरअसल होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण 'ऑयल चोकपॉइंट' है. यहां से दुनिया के कुल कच्चे तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस का लगभग पांचवां हिस्सा (20%) गुजरता है. ईरान ने इस जलमार्ग को अब पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था के सिर पर निरंतर बना रहने वाला खतरा बना दिया है. ईरान यहां से गुजरने वाले टैंकरों पर हमले कर रहा है. आज हालत ये है कि बड़े मालवाहक जहाजों का इस रास्ते से ईरान की अनुमति के बिना गुजरना मुश्किल हो गया है.
संयुक्त राष्ट्र के कानून के अनुसार अंतरराष्ट्रीय नेविगेशन के लिए इस्तेमाल होने वाली जलसंधियों से गुजरने का अधिकार हर जहाज को है. समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के अनुच्छेद 37 से 44 में ये स्पष्ट किया गया है कि तटीय देश जहाजों और विमानों की आवाजाही में बाधा नहीं डाल सकता और न ही इसे रोक सकता है, भले ही वह जलसंधि उसके क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र में आती हो.
समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का अनुच्छेद 26 तटीय देशों को जहाजों से केवल गुजरने के लिए शुल्क लेने से रोकता है. किसी भी कीमत केवल तभी ली जा सकती है जब विशिष्ट सेवाओं दी जा रही हों. ये शुल्क बिना किसी भेदभाव के लगाए जाते हैं. लेकिन ईरान ने अब इन नियमों की अनदेखी भी शुरू कर दी है.
अमेरिका लगातार मांग कर रहा है कि ईरान होर्मुज से जहाजों को बिना किसी शर्त के सुरक्षित जाने दे. इसके जवाब में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का साफ कहना है कि जब तक इस क्षेत्र में अमेरिकी हस्तक्षेप पूरी तरह खत्म नहीं हो जाता, तब तक यह जलमार्ग ईरान के कड़े नियमों के तहत ही संचालित होगा. ईरान का कहना है कि अमेरिकी हमले से उसे जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई भी करनी होगी.
ईरान होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से फीस वसूलना चाहता है. लेकिन इससे एक सदी से भी ज्यादा समय से चली आ रही व्यवस्था समाप्त हो जाएगी. दुनिया का लगभग 25 प्रतिशत समुद्री तेल व्यापार और लगभग 20 प्रतिशत वैश्विक लिक्विफाइड नेचुरल गैस शिपमेंट रोजाना होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरते हैं. युद्ध शुरू होने के बाद से ही ये आवाजाही बंद है. इस रास्ते से युद्ध शुरू होने से पहले हर दिन 20 मिलियन बैरल से ज़्यादा पेट्रोलियम और कच्चा तेल और लगभग 11.4 बिलियन क्यूबिक फीट LNG का परिवहन होता था. ईरान की मांग मानी गई तो दुनिया भर में तेल-गैस के दाम भी बढ़ जाएंगे क्योंकि अंत में तेल कंपनियां सभी लागत ग्राहक के सिर पर ही डालेंगीं.