डीएनए एक्सप्लेनर
ब्रिटेन के जाने के बाद हांगकांग के पहले मुख्य कार्यकारी बने तुंग ची-ह्वा का 89 साल की आयु में निधन हो गया है. उन्होंने जुलाई 1997 से मार्च 2005 में अपने इस्तीफे तक हांगकांग के नेता के रूप में कार्य किया. जानिए हांगकांग को चीन को मिलने की पूरी कहानी...
ब्रिटेन ने प्रथम अफीम युद्ध में चीन को हरा दिया था, जिसके बाद 1842 की नानकिंग संधि के तहत उसने हांगकांग द्वीप ब्रिटेन को सौंप दिया था. ब्रिटिश यहीं तक नहीं रुके, उन्होंने 1860 में कौलून द्वीप पर कब्जा कर लिया. उन्होंने एक और चाल चली, कुछ और इलाकों पर कब्जा करने के बाद साल 1898 में चीन के साथ एक संधि कर ली, जिसके मुताबिक, अगले 99 साल तक यहां ब्रिटिश राज होगा. यह तीनों क्षेत्र मिलकर ही ब्रिटिश-शासित हांगकांग थे.
हांगकांग पर 99 साल की लीज ने ब्रिटेन के लिए एक डेडलाइन तय कर दी थी. उसे अगले 100 साल में इस जगह को छोड़कर जाना था. 1980 का दशक आते-आते ब्रिटेन इस पर विचार करने लगा था. 1997 में लीज की समाप्ति होनी थी तो ब्रिटेन ने चीन के साथ हांगकांग के भविष्य को लेकर बातचीत शुरू कर दी थी. चूंकि न्यू टेरिटरजी हांगकांग की अधिकांश जमीन थी और वही पानी-बिजली की आपूर्ति भी करता था. इसलिए बिना इसके शहर के बाकी हिस्सों पर शासन कर पाना ब्रिटेन के लिए नामुमकिन जैसा था. इसलिए उसने बिना इन क्षेत्रों पर शासन करने की कोशिश के बजाय पूरे क्षेत्र को चीन को सौंपने के लिए बातचीत की.
ब्रिटेन के साथ लगातार बातचीत के बाद 19 दिसंबर, 1984 को बीजिंग में चीन-ब्रिटेन संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए गए. इस समझौते के तहत ब्रिटेन एक जुलाई, 1997 को हांगकांग को चीन को सौंपने पर सहमत हुआ. चीन इस क्षेत्र को एक विशेष प्रशासनिक क्षेत्र के रूप में शासन करने पर सहमत हुआ. चीन ने ब्रिटेन से वादा किया था कि हांगकांग अगले 50 साल तक अपनी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था, लाइफ स्टाइल और हाई लेवल की स्वायत्तता बरकरार रखेगा. इस ढांचे के तहत, हांगकांग ने अपने कानून, अर्थव्यवस्था और स्थानीय सरकार को बरकरार रखा, जबकि बीजिंग ने रक्षा और विदेश मामलों की जिम्मेदारी संभाली.
30 जून, 1997 की रात को हांगकांग में ब्रिटिश शासन खत्म हो गया. आधी रात को इस क्षेत्र पर संप्रभुता चीन को सौंप दी गई और हांगकांग विशेष प्रशासनिक क्षेत्र की औपचारिक रूप से स्थापना हुई. तुंग ची-ह्वा को हांगकांग का पहला मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाया गया था. हालांकि इसका मतलब ये नहीं था कि हांगकांग पूरी तरह चीन के अधीन हो गया, बल्कि ये चीन के भीतर एक अलग प्रणाली के तहत शासित किया जा रहा था, जिसे नाम दिया गया था- एक देश, दो सिस्टम.
हांगकांग के संवैधानिक दस्तावेज में कहा गया कि चीन की समाजवादी व्यवस्था और नीतियां हांगकांग में लागू नहीं की जाएंगी. इस क्षेत्र में जो नियम-कानून ब्रिटिश राज में थे, वही अगले 50 साल तक लागू रहेंगे, उसके बाद ही किसी तरह का बदलाव संभव होगा. जहां हांगकांग को कार्यकारी, विधायी और स्वतंत्र न्यायिक शक्तियां मिली हुई थीं, वहीं बीजिंग को रक्षा-विदेश मामलों की जिम्मेदारी मिली हुई है. हांगकांग के संवैधानिक ढांचे ने क्लीयर कर दिया था कि असली संप्रभुता चीन के ही पास रहेगी.
हांगकांग के मूल कानून में मुख्य कार्यकारी के प्रत्यक्ष जनमत चुनाव का प्रावधान नहीं था. अनुच्छेद 45 में कहा गया था कि मुख्य कार्यकारी का चयन चुनाव द्वारा या स्थानीय स्तर पर आयोजित चर्चा के जरिए किया जाएगा और केंद्रीय जन सरकार यानी चीनी सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा. पहले मुख्य कार्यकारी के पद के लिए तुंग ची-ह्वा का चयन दिसंबर 1996 में 400 सदस्यीय कमेटी द्वारा किया गया था. एपी के मुताबिक, तुंग को बीजिंग समर्थक वर्ग के एक पैनल की ओर से चुना गया था. इसी वजह से तुंग ही वो व्यक्ति बन गए, जिन्हें हांगकांग के औपचारिक रूप से चीनी संप्रभुता के अधीन आने पर संवैधानिक व्यवस्था के रोजमर्रा के शासन में लागू करना था.
तुंग ने ऐसे समय में सत्ता संभाली जब हांगकांग तेजी से बदलते आर्थिक माहौल का सामना कर रहा था. जैसे ही वो मुख्य कार्यकारी बने, एशिया वित्तीय संकटों का सामना कर रहा था, जिससे हांगकांग की इकोनॉमी और शेयर मार्केट मुश्किल में पड़ गए. उनकी सरकार को सार्वजनिक स्वास्थ्य संकटों का भी सामना करना पड़ा. शुरुआती सालों में ही हांगकांग में बर्ड फ्लू का प्रकोप फैला, जिसके बाद 2003 में सार्स महामारी आई, जिसमें लगभग 300 लोगों की मौत हुई. तुंग के खिलाफ बढ़ते आक्रोश के बावजूद बीजिंग ने 2002 में फिर हांगकांग का मुख्य कार्यकारी अधिकारी बना दिया. उनका दूसरा कार्यकाल जल्द ही एक राजनीतिक संकट से घिर गया, जिसका हांगकांग और बीजिंग के संबंधों पर कहीं अधिक व्यापक प्रभाव पड़ा.
तुंग के शासनकाल का सबसे बड़ा संकट था अनुच्छेद 23. यह एक संवैधानिक नियम है जिसके तहत हांगकांग को राजद्रोह और विध्वंस के खिलाफ अपने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून बनाने होंगे. जब उनकी सरकार ने 2003 में इस विधेयक को पारित करने का प्रयास किया तो नागरिकों को डर था कि इससे उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार समाप्त हो जाएंगे. इसके खिलाफ 1 जुलाई, 2003 को करीब 5 लाख लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया, जिससे सरकार को विधेयक रद्द करने के लिए मजबूर होना पड़ा. अगले साल हांगकांग के मुख्य कार्यकारी और विधायिका के प्रत्यक्ष चुनाव की मांग को लेकर फिर से बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए. इन विवादों ने इस बात पर सवाल खड़े कर दिए कि हांगकांग को कितनी राजनीतिक स्वायत्तता प्राप्त होगी और लोकतांत्रिक सुधार कितनी तेजी से होंगे.
तुंग को समझ आ गया कि हांगकांग की जनता उनके खिलाफ हो चुकी है. इसीलिए उन्होंने 10 मार्च, 2005 को अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी, जिसमें उन्होंने बिगड़े हुए स्वास्थ्य का हवाला दिया. हालांकि मुख्य कार्यकारी अधिकारी का पद छोड़ने के बाद तुंग सार्वजनिक जीवन से गायब नहीं हुए. वे चीनी जन राजनीतिक सलाहकार सम्मेलन के उपाध्यक्ष बने और बीजिंग के प्रमुख समर्थक बने रहे. हांगकांग सरकार ने कहा कि उन्होंने 2005 से 2023 तक CPCCC की राष्ट्रीय समिति के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य किया और उन्हें 2006 में ग्रैंड बौहिनिया पदक से सम्मानित किया गया. 2019 में, हांगकांग में हुए बड़े लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों के दौरान, तुंग बीजिंग के साथ बने रहे. एपी के अनुसार, उस वर्ष चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा देश के प्रति उनके योगदान के लिए उन्हें राष्ट्रीय पदक और सम्मान से नवाजा गया था.
साल 2020 में बीजिंग ने 2019 के व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद हांगकांग पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू किया. चीनी अधिकारियों ने कहा कि यह कानून राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए जरूरी था, जबकि आलोचकों ने कहा कि इसने हांगकांग के राजनीतिक माहौल को मौलिक रूप से बदल दिया. जब हांगकांग ने 2024 में अपना अनुच्छेद 23 राष्ट्रीय सुरक्षा कानून पारित किया तो इसने उस संघर्ष का अंत कर दिया. 1997 के बाद से हांगकांग का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका था. कड़े राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों और बीजिंग के मजबूत नियंत्रण के साथ, बड़े पैमाने पर होने वाले सड़क विरोध प्रदर्शन, जिन्होंने कभी तुंग को पीछे हटने के लिए मजबूर किया था, अब संभव नहीं हैं.
ब्रिटेन के जाने के बाद हांगकांग के पहले मुख्य कार्यकारी बने तुंग ची-ह्वा का 89 साल की आयु में निधन हो गया है. उन्होंने जुलाई 1997 से मार्च 2005 में अपने इस्तीफे तक हांगकांग के नेता के रूप में कार्य किया. तुंग का महत्व सिर्फ इसलिए ही नहीं कि उन्होंने हस्तांतरण के बाद हांगकांग का सर्वोच्च पद संभाला, बल्कि उनका कार्यकाल इसकी भी बड़ी परीक्षा थी कि इस क्षेत्र का नया संवैधानिक वादा- चीनी संप्रभुता और अलग सिस्टम के तहत कैसे काम करेगा.
ये भी पढ़ें- Su-57, S-400 और BrahMos मिसाइल.... PM मोदी-पुतिन की मीटिंग का क्या होगा एजेंडा?