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Who is Raja Kolandar: करीब 25 साल पहले एक के बाद एक लगातार हत्याओं से उत्तर प्रदेश को दहलाने वाले सीरियल किलर राजा कोलंदर को कोल जाति के लोग नरभक्षी राजा कहने लगे थे. कैसे एक साधारण कर्मचारी खोपड़ी जमा करने वाला सीरियल किलर बन गया, चलिए हम आपको बताते हैं.
Who is Raja Kolandar: लखनऊ की एडीजे कोर्ट ने करीब 25 साल पहले एक के बाद एक हत्याओं से उत्तर प्रदेश को दहला देने वाले सीरियल किलर राजा कोलंदर को सजा सुना दी है. राजा कोलंदर (Serial Killer Raja Kolandar) को शुक्रवार को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है. इंसानों की हत्या करने के बाद उनके भेजा का सूप पीने और फिर खोपड़ियों को खजाने की तरह जमा करने वाले राजा कोलंदर अब ताउम्र जेल में रहेगा. राजा कोलंदर के साथ ही उसके साले बच्छराज कोल को भी उम्र कैद की सजा सुनाई गई है. दोनों को यह सजा साल 2000 में पत्रकार मनोज कुमार सिंह और उनके ड्राइवर रवि श्रीवास्तव का अपहरण करने के बाद हत्या करने के मामले में सुनाई गई है. इससे पहले राजा कोलंदर को पत्रकार धीरेंद्र सिंह की हत्या के मामले में भी उम्रकैद सुनाई जा चुकी है. चलिए आपको बताते हैं कि असल में राजा कोलंदर कौन था, उसका असली नाम क्या है और कैसे वह एक साधारण से कर्मचारी से खूंखार सीरियल किलर बन गया.
प्रयागराज निवासी राजा कोलंदर था सरकारी कर्मचारी
1980-90 के दौर में प्रयागराज की नैनी के केंद्रीय आयुध भंडार (COD) छिवकी में एक कर्मचारी था, जिसका नाम राम निरंजन कोल था. शंकरगढ़ का रहने वाला राम निरंजन ही अपने कारनामों के कारण राजा कोलंदर बन गया. दरअसल सरकारी कर्मचारी होने के बावजूद राम निरंजन को ज्यादा पैसा कमाने की चाह थी, जिसके लिए वह ब्याज पर रुपये देने का काम करने लगा था. इसी दौरान वह जुर्म की दुनिया से भी जुड़ गया था.
पत्नी का नाम रखा फूलन देवी, बेटों का नाम जमानत और अदालत
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, राजा कोलंदर उर्फ राम निरंजन की पत्नी का नाम फूलन देवी था. राजा कोलंदर खुद सरकारी कर्मचारी होने के कारण चुनाव नहीं लड़ सकता था, जिसके चलते उसने फूलन देवी को इलाहाबाद जिला पंचायत का मेंबर बनवाया था. फूलन देवी उसकी पत्नी का असली नाम नहीं था बल्कि यह नाम राजा कोलंदर ने ही रखा था. इसी तरह उसने अपने दोनों बेटों के भी नाम बदल दिए थे. एक बेटे का नाम अदालत और दूसरे बेटे का नाम जमानत रखा था.
कई मर्डर से जुड़ा नाम, दहशत में राजा कहने लगे लोग
साल 1998 में पहली बार राम निरंजन का नाम मर्डर के साथ जुड़ा था. धूमनगंज थाना इलाके के मुंडेरा मोहल्ले में टीवी-वीसीआर किराये पर देने वाले युवक के मर्डर में उसका नाम आया तो वह फरार हो गया था. राम निरंजन का नाम इसके बाद एक के बाद एक कई मर्डर में सामने आया, जिससे पूरे इलाके में उसकी दहशत हो गई. साथ ही लोग उसके नाम का रौब मानने लगे. इसके चलते राम निरंजन की कोल जाति के लोगों ने उसे अपना राजा मान लिया और सब उसे राजा कोलंदर कहने लगे. पुलिस फाइल में भी उसके खिलाफ दर्ज मुकदमों में यही नाम लिखा जाने लगा.
नरभक्षी राजा कोलंदर हत्या के बाद खोपड़ी उबालकर सूप पीता था
पुलिस रिकॉर्ड में राजा कोलंदर को सनकी सीरियल किलर बताया गया है. पुलिस ने जब उसे एक केस में पुलिसने रिमांड पर लिया तो उसने खुद बताया कि वह जिसकी भी हत्या करता था, उसका सिर काटकर अपने पास रख लेता था. यह सिर लेकर वह पिपरी स्थित अपने फॉर्महाउस पर आता था, जहां सिर को खौलते पानी में उबालता था और उसके भेजे का सूप बनाकर पीता था.
पुलिस को मिली थी फॉर्महाउस पर 14 खोपड़ी
पिपरी के फॉर्महाउस को राजा कोलंदर ने सुअर पालन के लिए बनाया था, लेकिन जब पुलिस ने उसे साथ ले जाकर वहां छापा मारा तो जमीन में दबाई गई 14 खोपड़ी (नरमुंड) बरामद हुए थे. इन सभी नरमुंड पर मार्कर से उन लोगों के नाम भी लिखे हुए थे, जिनकी वे खोपड़ियां थीं. इसके अलावा दो लाश भी जमीन में दफन की हुई बरामद की गई थी.
ऐसा था सनकी, मामूली बात पर करता था हत्या
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, राजा कोलंदर इतना सनकी था कि यदि कोई आदमी उसे पसंद ना आए तो उसकी हत्या कर देता था. ऑर्डिनेंस फैक्ट्री के एक कर्मचारी की हत्या उसने महज कायस्थ होने के कारण कर दी थी. उसने पुलिस को बताया कि कायस्थ लोगों का दिमाग बेहद तेज होता है. इस कारण उसे उस आदमी से डर लगता था
कैसे खुला था राजा कोलंदर की हैवानियत का राज
राज कोलंदर की हैवानियत का राज 14 दिसंबर, 2000 को पत्रकार धीरेंद्र सिंह के गायब होने से खुला था. धीरेंद्र का शव 18 दिसंबर को यूपी-एमपी बॉर्डर पर रीवा में बिना सिर के मिला था. जांच के दौरान 14 दिसंबर को धीरेंद्र की बाइक पर राजा कोलंदर के दिखने की जानकारी सामने आई. पुलिस ने थाने बुलाकर पूछताछ की तो सख्ती के बाद राजा कोलंदर ने हत्या स्वीकार कर ली. हालांकि राजा कोलंदर के राजनीतिक आकाओं ने उसे जेल भिजवाकर मामला रफा-दफा करा दिया. धीरेंद्र की खोपड़ी नहीं मिलने से यह मामला दब गया.
मनोज और उनके ड्राइवर की हत्या की जांच में खुले सारे राज
धीरेंद्र की खोपड़ी का राज भी उस समय खुला, जब पुलिस ने साल 2000 में पत्रकार मनोज सिंह और उनके ड्राइवर रवि श्रीवास्तव की हत्या की जांच शुरू की. मनोज और रवि ने 24 जनवरी, 2000 को लखनऊ से रीवा जाते समय चारबाग रेलवे स्टेशन से 6 लोगों को लिफ्ट दी थी, जिनमें एक महिला थी. उनकी आखिरी लोकेशन रायबरेली के हरचंदपुर में चाय की दुकान पर मिली. इसके बाद वे लापता हो गए. तीन दिन बाद नाका थाने में गुमशुदगी दर्ज कराने पर जांच शुरू हुई तो दोनों के क्षत-विक्षत शव प्रयागराज के शंकरगढ़ के जंगलों में मिले, लेकिन उनके सिर गायब थे. पुलिस जांच में इस मामले में राजा कोलंदर और उसके साले का नाम सामने आया. इसके बाद पुलिस ने दोनों को पकड़कर सख्ती से पूछताछ की तो वे पुलिस को पिपरी स्थित फॉर्म हाउस ले गए, जहां 14 इंसानी खोपड़ियां मिलीं, जिनमें से हर एक पर मरने वाले का नाम लिखा हुआ था. उनमें मनोज और रवि के अलावा धीरेंद्र के नाम वाली खोपड़ी भी थी. यहीं से दोनों मामले पूरी तरह खुल गए.
13 साल बाद शुरू हुई सुनवाई, 12 साल लगे फैसला आने में
पुलिस ने मनोज और रवि की हत्या के केस में 21 मार्च, 2000 को चार्जशीट दाखिल कर दी थी, लेकिन कानूनी पेचीदगियों में यह केस करीब 13 साल तक फंसा रहा और ट्रायल शुरू नहीं हो सका. मई, 2013 में इस केस का ट्रायल शुरू हुआ, जिसके बाद फैसला आने में करीब 12 साल लग गए. आखिरकार शुक्रवार (23 मई) को लखनऊ कोर्ट के एडीजे रोहित सिंह ने राजा कोलंदर और बच्छराज कोल को उम्रकैद की सजा सुनाई है.
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