डीएनए एक्सप्लेनर
1960 के दशक में जब दोनों देशों के रिश्ते कुछ ठीक थे तब पाकिस्तान ने भारत के सामने अपनी एक योजना प्रस्तुत की. इस प्लान के तहत कश्मीर को चिनाब नदी की लाइन के आधार पर बांटा जाना था.
What was Chenab Formula: हाल ही नेटफ्लिक्स पर प्रदर्शित हुई वेब सीरीज 'ऑपरेशन सफेद सागर' के एक दृश्य में दिखाया गया है कि साल 1999 में भारत-पाकिस्तान वार्ता के दौरान पाकिस्तान ने 'चिनाब प्लान' प्लान पेश किया था. भारत ने इसे सीधे ठुकरा दिया था. चिनाब प्लान या चिनाब फार्मूला पाकिस्तान का ऐसा ख्वाब जो वो आज भी देखता है. पाकिस्तान के हिसाब से इस योजना को अगर भारत मान लेता है तो दोनों देशों की दुश्मनी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी. आइये जानते हैं इसके बारे में.
भारत को आजादी के साथ-साथ विभाजन का दंश भी मिला था. 1947 में भारत और पाकिस्तान दो देश बने. दोनों देशों के बीच आजादी के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर के लिए युद्ध हुआ. जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान किसी भी हाल में हासिल करना चाहता था. लेकिन भारतीय सेना की बहादुरी ने जम्मू-कश्मीर के बड़े हिस्से को पाकिस्तान के हाथ जाने से बचा लिया. आज भी जम्मू-कश्मीर का एक बड़ा इलाका पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है. लेकिन पाकिस्तान की बुरी नजर इसके बाद कश्मीर पर रही.
1960 के दशक में जब दोनों देशों के रिश्ते कुछ ठीक थे तब पाकिस्तान ने भारत के सामने अपनी एक योजना प्रस्तुत की. इस प्लान के तहत कश्मीर को चिनाब नदी की लाइन के आधार पर बांटा जाना था. पाकिस्तान का कहना था इससे मुस्लिम बहुल आबादी वाली पूरी घाटी और जम्मू के मुस्लिम बहुल इलाके भी पाकिस्तान की सीमा में आ जाएंगे. यही दो-कौमी नजरिये के हिसाब से सही बंटवारा होता. इस प्लान के तहत चिनाब नदी के उत्तर में स्थित लद्दाख को भी पाकिस्तान हासिल करना चाहता था.
चिनाब फार्मूले के तहत पूरे क्षेत्र के लगभग 84,000 वर्ग मील के इलाके में से लगभग 3,000 वर्ग मील का इलाका भारत को मिलता और बाकी पाकिस्तान को. हालांकि इस समाधान के लिए भारत को अपनी मर्जी से उस इलाके को छोड़ना था. भारत ने इस योजना को कभी तवज्जो नहीं दी. लेकिन पाकिस्तान आज भी इसके सपने देखता है.
भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते ठीक करने के लिए दोनों देशों के बीच 1962 में बातचीत शुरू हुई. इस वार्ता में भारत का प्रतिनिधित्व विदेश मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह कर रहे थे. पाकिस्तान की तरफ से जुल्फिकार अली भुट्टो बात कर रहे थे जो बाद पाकिस्तान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी बने. 1962 में भारत-पाकिस्तान वार्ता नई दिल्ली में हुई थी. इसके बाद बातचीत का दूसरा दौरा 1963 में कराची में हुई.
इंडियन एक्सप्रेस में साल 2010 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1963 में जब भारतीय प्रतिनिधिमंडल कराची में था तब वार्ता कामयाब हो सकती थी क्योंकि भारत बड़ा दिल दिखाने के लिए तैयार था. सरदार स्वर्ण सिंह जम्मू-कश्मीर का एक ऐसा नक्शा लेकर जुल्फिकार अली भुट्टो के सामने पहुंचे जिस पर सीज़फायर लाइन (युद्धविराम रेखा) अंकित थी. उन्होंने मोटे तौर पर अपने समकक्ष को उस अधिकतम सीमा के बारे में बताया जहां तक भारत जाने को तैयार था.
भारत ने पाकिस्तान को जो प्रस्ताव दिया था उसके तहत प्रस्तावित बदलावों से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के इलाके में 1,500 वर्ग मील का क्षेत्र और जुड़ जाता. लेकिन भुट्टो ने भारत के प्रस्ताव को तिरस्कारपूर्वक ठुकरा दिया. जब उनसे अपना पक्ष रखने को कहा गया, तो उन्होंने मेज पर नक्शा रखा. नक्शे में कठुआ नामक छोटे से शहर की ओर इशारा किया, अपनी तर्जनी उंगली से उसके चारों ओर एक छोटा सा घेरा बनाया और कहा, "कश्मीर का यह हिस्सा आप ले सकते हैं. बाकी हिस्सा हमें चाहिए."
जुल्फिकार अली भुट्टो की इस गुस्ताखी और बुरे बर्ताव के बाद भी विनम्रता और दृढ़ता के अपने चिर-परिचित कौशल के साथ, स्वर्ण सिंह ने भुट्टो से कहा कि उनका यह विचार काम नहीं करेगा. लेकिन उनके साथ गए भारत के विदेश मंत्रालय में राष्ट्रमंडल सचिव वाई डी गुंडेविया भड़क गए और भुट्टो को खूब सुनाया था.