डीएनए एक्सप्लेनर
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच हाल ही में तेजी से संबंध बिगड़े हैं, जब पाकिस्तानी सेना ने अफगानिस्तान के अंदर बार-बार एयरस्ट्राइक की, जिसमें महिलाओं, बच्चों समेत कई निर्दोष लोग मारे गए. पाकिस्तान तालिबान पर तहरीक-ए-तालिबान से जुड़े लोगों को पनाह देने का आरोप लगाता है.
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए ने मक्का सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जो कि नाटो गठबंधन की तरह काम करता है. मक्का समझौता के तहत इसमें शामिल किसी भी एक सदस्य देश पर हमला सभी देशों पर हमला माना जाएगा. पाकिस्तान को ऐसी उम्मीद थी कि सऊदी अरब क्षेत्रीय हितों के साथ करीब से जुड़ेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सऊदी अरब ने अफगानिस्तान के साथ बड़ी डील की है, जिसे इस्लामाबाद तालिबान शासन आने के बाद अपना दुश्मन मानता है और ग्लोबल मंचों पर इसे आतंकवाद के रूप में पेश करने के लिए हर संभव हथकंडा अपनाता है.
पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अफगानिस्तान को अलग-थलग करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसकी इस रणनीति पर उसके ही सुरक्षा सहयोगी सऊदी अरब ने पलीता लगा दिया है, जिससे मक्का सुरक्षा समझौते में दरार खुलकर सामने आ गई है. पाकिस्तान के प्रयासों के बावजूद सऊदी ने बीते 7 सितंबर को तालिबान प्रशासन के साथ काबुल में रियाद की ऊर्जा कंपनी डेल्टा इंटरनेशनल ने एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं.
सऊदी कंपनी और तालिबान ने पश्चिमी कुश्क-तिरुपल बेसिन में तेल और गैस की खोज से जुड़े 25 साल के 200 मिलियन डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट पर साइन किए, जिसमें हेरात और बदघिस प्रांतों के कुछ हिस्से शामिल हैं. 200 मिलियन डॉलर का ये शुरुआती निवेश है, ये परियोजना 50 से 60 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है. इस समझौते पर तालिबान के कार्यवाहक खान एवं पेट्रोलियम मंत्री हेदयातुल्लाह बद्री और डेल्टा इंटरनेशनल एनर्जी के सीईओ शहर अल-ताकी ने हस्ताक्षर किए. खास बात ये है कि इस दौरान अफगानिस्तान में अमेरिका के पूर्व दूत जल्मे खलीलजाद भी मौजूद थे.
पाकिस्तान को इस डील का बुरा लगना लाजिमी है क्योंकि सऊदी अरब ने काबुल से पहले इस्लामाबाद के साथ 20 अरब डॉलर के निवेश करने की योजना की घोषणा की थी, लेकिन वो निवेश काफी हद तक पूरा नहीं हो सका, जबकि रियाद ने अफगानिस्तान में निवेश समझौते पर एक कदम आगे बढ़ाया है. यह दिखाता है कि तालिबान के नेतृत्व वाली सरकार के प्रति पाकिस्तान की शत्रुता के बावजूद सऊदी काबुल में अपने आर्थिक हितों को साधने के लिए तैयार है.
पाकिस्तान की दुश्मनी केवल तालिबान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसने अफगानियों को भी प्रभावित किया है, जिनमें पाकिस्तान में रहने वाले अफगान छात्र और परिवार शामिल हैं. इस्लामाबाद ने हाल ही में पाकिस्तानी संस्थानों में पहले से रजिस्टर्ड अफगान मेडिकल और डेंटल छात्रों को काबुल लौटने का आदेश दिया है. इतना ही नहीं उसने अफगान छात्रों के नए प्रवेश पर भी रोक लगा दी है. पाकिस्तान के इस फैसले की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसे भेदभावपूर्ण और मनमाना बताया और चेतावनी दी कि इसके परिणाम विशेष रूप से महिला अफगान छात्रों के लिए गंभीर होंगे.
पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के सात सीमा पार करने वाले रास्तों को भी बंद कर दिया है, जिससे आम अफगानियों की हालत और खराब हो गई है, खासकर पाकिस्तान द्वारा लगातार लाखों अफगानियों के बीच निर्वासन के बीच. निर्वासित किए गए अफगान शरणार्थियों के साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया, वो भी बेहद खराब था. अफगानों को दौड़ा-दौड़ाकर हिरासत में लिया गया और जबरन देश से बाहर धकेल दिया गया. बड़ी संख्या में लोगों को ट्रकों में भरकर सीमा की ओर ले जाया गया, जबकि महिलाओं और बच्चों को कई बार सीमा चौकियों पर वाहनों में कई दिनों तक इंतजार करना पड़ा. कई अफगानों को अपने घर, कारोबार और अन्य संपत्तियां छोड़ने के लिए मजबूर किया गया. 2023 से अबतक पाकिस्तान ने करीब 20 लाख अफगानियों को बाहर निकाला है.
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच हाल ही में तेजी से संबंध बिगड़े हैं, जब पाकिस्तानी सेना ने अफगानिस्तान के अंदर बार-बार एयरस्ट्राइक की, जिसमें महिलाओं, बच्चों समेत कई निर्दोष लोग मारे गए. पाकिस्तान तालिबान पर तहरीक-ए-तालिबान से जुड़े लोगों को पनाह देने का आरोप लगाता है. हालांकि काबुल इस दावे को खारिज कर चुका है.
अफगानिस्तान के साथ सऊदी अरब के समझौते से ये भी संकेत मिलता है कि मक्का पैक्ट के बावजूद पाकिस्तान को भविष्य में भारत के साथ किसी भी संघर्ष में रियाद का साथ नहीं मिलेगा. अगर सऊदी अफगानिस्तान के साथ अपने संबंधों को लेकर अपना स्वतंत्र नजरिया अपना सकता है, जो रियाद के लिए भारत जितना इंपोर्टेंट देश नहीं है तो इससे ये भी क्लीयर हो जाता है कि भारत, जो सऊदी के लिए आर्थिक और रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है, उसे पाकिस्तान के लिए कुर्बान किया जा सके.
यूरेशियन टाइम्स के मुताबिक, सऊदी अरब के साथ हुई इस डील में खलीलजाद की भूमिका से ये संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका भी काबुल के साथ रिश्ते सुधारना चाहता है. खलीलजाद ने हाल ही में अफगानिस्तान के जुड़ने के लिए अमेरिका से अपील की है. उन्होंने कहा कि इससे अमेरिकी हितों की पूर्ति होगी. पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर वाशिंगटन को ये समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि पाकिस्तान इस क्षेत्र में अमेरिकी हितों की सेवा कर सकता है, जिससे अमेरिका को अफगानिस्तान में बगराम एयरबेस तक दोबारा पहुंच हासिल करने में मदद मिल सकती है. हालांकि अब अमेरिका को समझ आ रहा है कि पाकिस्तान ऐसा करने में सक्षम नहीं है. इसलिए अमेरिका अब अफगानिस्तान के साथ स्वतंत्र रूप से जुड़ने की कोशिश कर सकता है. तालिबान ने भी ऐसे संकेत दिए हैं कि वो अमेरिका से रिश्ते सुधारना चाहता है. तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुक्ताकी ने कहा कि अफगानिस्तान अमेरिकी निवेश का स्वागत करेगा. उन्होंने ये भी कहा कि अफगानिस्तान और अमेरिका के बीच संबंधों का आकलन पिछले 20 साल के युद्ध के नजरिए से नहीं, बल्कि भविष्य के सहयोग के आधार पर किया जाना चाहिए.
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