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Explained: गिलगित-बाल्टिस्तान को पांचवां प्रांत घोषित करने की योजना बना रहा पाकिस्तान, जानिए कैसे किया था इस इलाके पर अवैध कब्जा?

पाकिस्तान में अभी चार प्रांत हैं - पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा. गिलगित-बाल्टिस्तान अभी भी सीमित स्व-शासन व्यवस्था के तहत शासित है और उसे पाकिस्तान के प्रांतों जैसा संवैधानिक दर्जा हासिल नहीं है.

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Explained: गिलगित-बाल्टिस्तान को पांचवां प्रांत घोषित करने की योजना बना रहा पाकिस्तान, जानिए कैसे किया था इस इलाके पर अवैध कब्जा?

गिलगित-बाल्टिस्तान को लेकर पाकिस्तान ने रची साजिश. (AI इमेज)

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  • गिलगित-बाल्टिस्तान को पांचवां प्रांत घोषित कर सकता है पाकिस्तान.
  • वर्तमान में पाकिस्तान में आधिकारिक तौर पर चार प्रांत हैं.
  • गिलगित-बाल्टिस्तान अब तक पाकिस्तान का एक स्वायत्त प्रांत है.

पाकिस्तान गिलगित-बाल्टिस्तान को अपना पांचवां प्रांत घोषित करने की योजना बना रहा है. भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य का हिस्सा  गिलगित-बाल्टिस्तान पर पाकिस्तान का 1947 से ही अवैध कब्जा है. हाल ही में  वहां की लेजिस्लेटिव असेंबली ने संवैधानिक मान्यता की मांग करते हुए सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास किया है. इस प्रस्ताव में केंद्र सरकार से संविधान में संशोधन करने, गिलगित-बाल्टिस्तान को पूर्ण प्रांतीय दर्जा देने और पाकिस्तान की नेशनल असेंबली और सीनेट में उसका प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की मांग की गई है. प्रस्ताव में कहा गया है है कि गिलगित-बाल्टिस्तान के लोगों को वही संवैधानिक, राजनीतिक और लोकतांत्रिक अधिकार दिए जाएंगे जो पाकिस्तान के अन्य प्रांतों के नागरिकों को मिलते हैं. 

पाकिस्तान में कितने प्रांत हैं?

वर्तमान में पाकिस्तान में आधिकारिक तौर पर चार प्रांत हैं. ये हैं- पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा. पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के उत्तरी हिस्से यानी गिलगित-बाल्टिस्तान को अब तक पाकिस्तान एक स्वायत्त और सीमित स्वशासन वाले क्षेत्र के रूप में प्रशासित करता रहा है. गिलगित-बाल्टिस्तान वह एकमात्र भूभाग है जो पाकिस्तान को सीधे चीन से जोड़ता है. चीन ने इस इलाके से होकर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा भी बनाया है. चीन भी लंबे समय से पाकिस्तान पर दबाव बना रहा था कि वह इस क्षेत्र को कानूनी और संवैधानिक मान्यता दे ताकि चीनी निवेश सुरक्षित रहे.

1947 के बाद पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान वाले इलाके को 'नॉर्दर्न एरियाज' या उत्तरी क्षेत्र नाम दिया. पाकिस्तान के 1956, 1962, 1972 और 1973 के किसी भी संविधान में  'नॉर्दर्न एरियाज' को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं माना गया. लेकिन अब जबकि बलोचिस्तान और खैबर पख्तूनवा पाकिस्तान के हाथ से निकलते जा रहे हैं और इसके कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में भी लोग विद्रोह पर उतर आए हैं तब, पाकिस्तानी सरकार गिलगित-बाल्टिस्तान के लोगों को पूर्ण प्रांत का लालच दे रही है.

पाकिस्तान के कब्जे में कैसे गया गिलगित-बाल्टिस्तान?

गिलगित-बाल्टिस्तान हिमालय और काराकोरम पर्वतमालाओं के बीच बसा है. इस इलाके के एक तरफ पाकिस्तान है, दूसरी तरफ अफगानिस्तान और तीसरी तरफ चीन. यह जम्मू कश्मीर राज्य का सबसे  उत्तरी क्षेत्र है. 1947 में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों पर गैर-कानूनी कब्जा कर लिया था. इसमें गिलगित-बाल्टिस्तान भी है जो 'पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर' का कुल 86 प्रतिशत हिस्सा है. आज जमीनी हालात चाहे जो भी हों, यह इलाका ऐतिहासिक और कानूनी रूप से भारतीय संघ का हिस्सा है. 

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के शोध पत्र के अनुसार, सिख शासक महाराजा रणजीत सिंह और उनके डोगरा जागीरदार जनरल गुलाब सिंह ने लद्दाख को 1836 में, बाल्टिस्तान को 1840 में और गिलगित को 1842 में अपने अधिकार में ले लिया था. उस समय भारतीय उपमहाद्वीप पर अंग्रेजों का शासन था. ब्रिटिश राज ने डोगरा शासकों को चुनौती नहीं दी और 1846 में अमृतसर की संधि पर हस्ताक्षर करके गुलाब सिंह को जम्मू-कश्मीर का स्वतंत्र शासक मान लिया. 

1857 के विद्रोह और मध्य एशिया में रूस की मजबूती से अंग्रेजों को डर सताने लगा कि रूस भारत में उनके साम्राज्य के लिए खतरा बन सकता है. इसे ध्यान में रखते हुए अंग्रेजों ने 1877 में, गिलगित एजेंसी की स्थापना की. 1917 में रूसी क्रांति के साथ अंग्रेजों की चिंता बढ़ गई और मार्च 1935 में महाराजा गुलाब सिंह को गिलगित एजेंसी 60 साल की अवधि के लिए अंग्रेजों को पट्टे पर देने के लिए मजबूर होना पड़ा. जब तक भारत का बंटवारा नहीं हुआ था, तब तक गिलगित और उसके आस-पास के इलाकों का प्रशासन अंग्रेज ही चलाते रहे. हालांकि इसमें बाल्टिस्तान शामिल नहीं था. बाल्टिस्तान महाराजा के शासन के अधीन ही रहा. 

जब अंग्रेज भारत छोड़ने की तैयारी कर रहे थे, तब जुलाई 1947 में हरि सिंह ने ब्रिगेडियर घनसारा सिंह को गिलगित एजेंसी का गवर्नर नियुक्त किया. ब्रिटिश सरकार ने 1 अगस्त 1947 से गिलगित एजेंसी के सभी क्षेत्रों का प्रशासनिक नियंत्रण कश्मीर राज्य सरकार को सौंपने का निर्णय लिया था. लेकिन ये जमीन पर लागू नहीं हो सका. 31 अक्टूबर 1947 की रात को गिलगित स्काउट्स के सौ से जवानों ने  गवर्नर हाउस को घेर लिया और उन्हें सरेंडर करने की धमकी दी. ब्रिगेडियर घनसारा सिंह ने सरेंडर कर दिया. इसके बावजूद उनके कमांड में मौजूद सैनिकों, खासकर कश्मीर लाइट इन्फैंट्री डिवीजन के सिखों का बड़े पैमाने पर कत्लेआम किया गया. इसके चार दिन बाद अंग्रेज अधिकारी मेजर विलियम ब्राउन ने गिलगित स्काउट लाइन्स पर पाकिस्तानी झंडा फहराया. इसके कुछ ही समय बाद, हुंजा और नागर के शासकों ने भी पाकिस्तान में शामिल होने का ऐलान कर दिया. इस तरह भारत का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया. 

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