डीएनए एक्सप्लेनर
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में रोजाना सेक्टॉर्शन या रिवेंज पोर्नोग्राफी के 500 मामले सामने आते हैं, पर महज 0.5% में FIR दर्ज होती है.
डीएनए हिंदी: चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी (Chandigarh University MMS Scandal) के हॉस्टल में चोरी से छात्राओं के वीडियो बनाए जाने के खुलासे ने हंगामा मचा रखा है. इससे एक बार फिर रिवेंज पोर्नोग्राफी (Revenge Pornography) और सेक्सटॉर्शन (Sextortion) की चर्चा गर्म हो गई है. यह इस तरह का पहला मामला नहीं है. दरअसल भारत में पिछले दशक के दौरान साइबर अपराध (Cyber Criem) और यौन शोषण (सेक्सटॉर्शन) की घटनाओं में अच्छी खासी बढ़त हुई है.
दूसरे शब्दों में कहें तो टेक्नोलॉजी की तरक्की के साथ ही सेक्सटॉर्शन (ऐसे मामले जिनमें आमतौर पर एक ब्लैकमेलर शामिल होता है, जिसकी पहुंच पीड़ित की निजी फिल्मों या तस्वीरों तक होती है) के मामलों में बेहद बढ़ोतरी हुई है. वहीं, साथ ही रिवेंज पोर्नोग्राफी भी आम बात हो गई है. रिवेंज पोर्नोग्राफी को हम आम शब्दों में कहें तो ब्लैकमेलर की तरफ से पीड़ित को पर्सनल फोटोस और MMS के ज़रिए धमकाना और अपने पर्सनल फायदे के लिए उनका इस्तेमाल करना शामिल है.
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वीडियो-कॉलिंग ऐप्स पर बातचीत के जरिए लुभाकर न्यूड वीडियो रिकॉर्ड कर लेने के भी बहुत सारे मामले सामने आए हैं. कई मामलों में पीड़ितों ने सुसाइड भी कर ली है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ऐसे मामलों में आपको न्याय दिलने के लिए भारतीय कानून में कई मजबूत धाराएं मौजूद हैं.
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पहले जानते हैं कि क्या है साइबर क्राइम
टेक्नोलॉजी के इस काल में कम्प्यूटर और इंटरनेट की दुनिया जितनी फ़ास्ट है, उतनी ही खतरनाक भी है. टेक्नोलॉजी की स्पीड के साथ तकनीकी सहारे से बढ़ने वाला क्राइम भी बढ़ रहे हैं. आज के समय में कई क्रिमिनल्स जुर्म करने के लिए कम्प्यूटर, इंटरनेट, डिजिटल डिवाइसेज और वर्ल्ड वाइड वेब आदि का इस्तेमाल कर रहे हैं. ऑनलाइन ठगी या चोरी भी इसी श्रेणी का अहम गुनाह होता है. किसी की वेबसाइट को हैक करना या सिस्टम डेटा को चुराना ये सभी तरीके साइबर क्राइम की केटेगरी में आते हैं. वहीं, किसी की परमिशन के बिना उसकी फोटो खींचना वीडियो बनाना और शेयर करना भी साइबर अपराध की केटेगरी में आता है.
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साइबर क्राइम करने पर लगती हैं कानून की ये धाराएं
साइबर क्राइम को लेकर देश का कानून बहुत सख्त है. भारत में साइबर क्राइम के मामलों में सूचना तकनीक कानून 2000 और सूचना तकनीक (संशोधित) कानून 2008 लागू होते हैं. मगर इसी केटेगरी के कई मामलों में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 292, 293, कॉपी राइट कानून 1957, कंपनी कानून, सरकारी गोपनीयता कानून और यहां तक कि आतंकवाद निरोधक कानून (UAPA) के तहत भी करवाई की जा सकती है.
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आज के समय में इंटरनेट के माध्यम से अश्लीलता का व्यापार भी खूब फलफूल रहा है. ऐसे में पोर्नोग्राफी एक बड़ा कारोबार बन गई है. जिसके दायरे में ऐसे फोटो, वीडियो, टेक्स्ट, ऑडियो और सामग्री आती है, जो यौन, यौन कृत्यों और नग्नता पर आधारित होती है. ऐसी सामग्री को इलेक्ट्रॉनिक ढंग से पब्लिश करने, किसी को भेजने या किसी दूसरे के जरिए पब्लिश करवाने या भिजवाने पर पोर्नोग्राफी निरोधक कानून (Pornography Prohibition Law) लागू होता है.
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चाइल्ड पोर्नोग्राफी देखने या बनाना गंभीर जुर्म
भारतीय कानून के तहत चाइल्ड पोर्नोग्राफी (child pornography) देखना अवैध है. इसके तहत आने वाले मामलों में पोक्सो एक्ट, 2012 (POCSO Act 2012) की धारा-15, आईटी (संशोधन) कानून 2008 की धारा 67 (ए), आईपी सी की धारा 292, 293, 294, 500, 506 और 509 के तहत सजा का प्रावधान है. जुर्म की गंभीरता के लिहाज से पहली गलती पर पांच साल तक की जेल या दस लाख रुपये तक जुर्मा ना हो सकता है .लेकिन दूसरी बार गलती करने पर जेल की सजा सात साल तक बढ़ सकती है.
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भारतीय कानून के तहत ब्लैकमेलिंग से संबंधित प्रावधान
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जाने-माने लोग भी बन रहे रिवेंज पोर्नोग्राफी के शिकार
बहुत सारे जाने-माने लोगों को भी रिवेंज पोर्नोग्राफी का शिकार होना पड़ा है. इनमें से ज्यादातर मामले सार्वजनिक जीवन में मशहूर लोगों को बदनाम करने के लिए सामने आए हैं.
फरवरी, 2022 में राजस्थान के एक मंत्री और आतंकी मामले में आरोपी रहीं भाजपा की एक सांसद के मामले सामने आए थे, जिनके वीडियोज को सॉफ्टवेयर से अश्लील बनाकर वायरल करने की साजिश भरतपुर (Bharatpur) के दो साइबर हैकर्स रवीन खान व वारिस खान ने रची थी. नवंबर 2021 में शिवसेना (ShivSena) के एक विधायक के अश्लील फोटो बनाकर ब्लैकमेल करने की बात सामने आई थी. राजस्थान से ही पकड़े गए इस ब्लैकमेलर मोहम्मद खान के कब्जे से करीब 300 पीड़ितों के फर्जी पोर्न वीडियो-फोटो मिले थे और करीब 20 लाख रुपये वसूलने के सबूत भी पाए गए थे.
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जानिए क्या कहते हैं सुप्रीम कोर्ट के वकील और साइबर कानून के विशेषज्ञ विराग गुप्ता

सुप्रीम कोर्ट के वकील और साइबर कानून के विशेषज्ञ विराग गुप्ता के अनुसार, सोशल मीडिया के साथ साइबर अपराध भी दिन दोगुने रात चौगुने बढ़ रहे हैं. इससे निपटने के तीन पहलुओं पर बातचीत और समझ जरूरी है. पहला-कानून और अदालतें, दूसरा-पुलिस और डिजिटल रेगुलेटर, तीसरा-सोशल मीडिया कंपनियों का शिकायत तंत्र है .
आईटी एक्ट और आईटी इंटरमीडियरी रुल्स 2021 के तहत सोशल मीडिया कंपनियों की अनेक कानूनी जवाबदेही हैं. सोशल मीडिया में पीड़ित लोग हर छोटी या बड़ी बात के लिए पुलिस या अदालतों का दरवाजा नहीं खटखटा सकते हैं. पुराने 2011 के नियमों के तहत केएन गोविन्दाचार्य मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने फेसबुक, गूगल, ट्विटर और दूसरी सोशल मीडिया कंपनियों में शिकायत निवारण के लिए प्रभावी सिस्टम सुनिश्चित करने का आदेश केंद्र सरकार को दिया था. पिछले 9 साल में इसे लेकर सिर्फ कागजी खानापूर्ति हुई है.
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विराग गुप्ता के अनुसार, इस तरह के मामलो में आईपीसी की धारा 354-C और आई टी एक्ट की धारा 66 E के तहत एफआईआर दर्ज की जाती है. ये धाराएं लड़की या महिला को गलत तरीके से और छिपकर फिल्माने पर लगाई जाती हैं. धारा 66E का दोषी पाए जाने पर आरोपी को दो लाख तक का जुर्माना या तीन साल तक की सजा हो सकती है. वहीं, 354-C का दोषी पाए जाने पर आरोपी को जुर्माना और एक से पांच साल तक की सजा हो सकती है.
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