डीएनए एक्सप्लेनर
Iran-Israel Ceasefire: ईरान और इजरायल के बीच सीजफायर होने से भारत को सबसे पहला फायदा यह हुआ है कि उसे महंगा कच्चा तेल नहीं खरीदना होगा, लेकिन इससे उसका एक बहुत बड़ा निवेश भी खतरे में पड़ने से बच गया है.
Iran-Israel Ceasefire: ईरान और इजरायल के बीच 12 जून से छिड़े युद्ध में सीजफायर हो गया है. इससे पश्चिमी एशिया में जहां शांति का माहौल बना है, वहीं चिंता में पड़ी भारत सरकार के दिल में भी शांति की लहर दौड़ गई है. दरअसल बम भले ही ईरान और इजरायल के बीच बरसने बंद हुए हैं, लेकिन इससे भारत को 47,16,53,21,335 रुपये का घाटा होने से बच गया है. यह वो रकम है, जिसका निवेश भारत ने ईरान के चाबहार पोर्ट (Chabahar Port) और उससे जुड़े ट्रेड कॉरिडोर में कर रखा है. ईरान और इजरायल के बीच बरस रही मिसाइलों में यह निवेश भी धुआं बनकर उड़ता दिखाई दे रहा था, लेकिन अब इसके और ज्यादा सॉलिड होने का ग्राउंड तैयार हो गया है. इससे जहां भारत को राहत मिली है. वहीं इससे चीन और पाकिस्तान के माथे पर शिकन बढ़ गई है, जो चाबहार पोर्ट बंद होने से अपने ग्वादर पोर्ट (Gwadar Port) की अहमियत बढ़ने की उम्मीद लगा रहे थे.
चाबाहर है भारत के लिए सामरिक लाइफलाइन
भारत के लिए ईरान के चाबहार पोर्ट की अहमियत महज व्यापार के नजरिये से ही नहीं है बल्कि यह सामरिक लिहाज से भी भारत के लिए खास रोल अदा करने वाला है. चाबहार पोर्ट के जरिये भारत को मध्य एशिया से लेकर रूस तक सीधी पहुंच हासिल होती है, वहीं अफगानिस्तान के साथ व्यापार के लिए भी भारत की पाकिस्तान पर निर्भरता इस पोर्ट के कारण नहीं रहेगी. इसे चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का भी भारत की तरफ से जवाब माना जाता है.
भारत लगातार कर रहा है चाबहार में निवेश
चाबहार पोर्ट की इसी अहमियत के कारण भारत इसमें लगातार निवेश कर रहा है. भारत ने जहां 85 मिलियन डॉलर का इस पोर्ट में सीधा निवेश किया है, वहीं EXIM Bank के जरिये 150 मिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन दिलाई है. इसके अलावा इस पोर्ट को जोड़ने वाली जेहादान रेलवे के लिए भी भारत 400 मिलियन डॉलर दे रहा है. यह 550 मिलियन डॉलर का निवेश करीब 47,000 करोड़ रुपये के बराबर है. पिछले साल इस पोर्ट के शाहिद बेहेस्ती टर्मिनल को 10 साल तक संचालित करने की लैंडमार्क डील भी भारत की इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) और ईरान के आर्या बंदर के बीच हो चुकी है. IPGL दीनदयाल पोर्ट और JNPT का जॉइंट वेंचर है. इसके अलावा इस पोर्ट में अडानी ग्रुप और एस्सार जैसी बड़ी भारतीय कंपनियों ने भी दिलचस्पी दिखाई है.
ईरान-इजरायल युद्ध में चाबहार पोर्ट का निवेश डूबने का था खतरा
ईरान और इजरायल के बीच युद्ध में मिसाइलों की बारिश से चाबहार पोर्ट के भी ध्वस्त होने का खतरा पैदा हो गया था. इससे जहां भारत का कीमती निवेश डूब सकता था, वहीं सालों की मेहनत पर भी पानी फिर जाता. इसके अलावा अमेरिका की तरफ से ईरान पर प्रतिबंध लगाने से भी इस पोर्ट का संचालन ठप होने का खतरा पैदा हो गया था, लेकिन चाबहार पोर्ट इन खतरों से निकल आया है. ना इजरायली बम ने इसे ध्वस्त किया और ना ही अमेरिका ने ऐसा कोई प्रतिबंध लगाया है, जिससे इस पोर्ट का भविष्य खतरे में दिखाई दे. इससे इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) पूरी तरह सुरक्षित है और रीजनल ट्रेड प्लान्स भी पहले की तरह ट्रैक पर आ गए हैं.
पाकिस्तान को लगा है इस तरह बड़ा झटका
नक्शे पर देखें तो ईरान का चाबहार पोर्ट और पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट बेहद करीब हैं. चाबहार पोर्ट के बंद होने की स्थिति में रीजनल ट्रेड के लिए ग्वादर पोर्ट की अहमियत बढ़ने के आसार थे, जिससे पाकिस्तान को मोटी विदेशी मुद्रा की कमाई शुरू होने की आशा थी. ग्वादर पोर्ट में चीन भी साझीदार है. ऐसे में चीन के लिए भी यह फायदे का सौदा बनने वाला था. लेकिन चाबहार पोर्ट का संचालन पहले की तरह जारी रहने से इन दोनों देशों की प्लानिंग को झटका लगा है. इसके अलावा यदि चाबहार पोर्ट ठप होता तो पाकिस्तान के पास अफगानिस्तान की तालिबान सरकार पर भी दबाव बनाने का मौका था, जो कराची पोर्ट के जरिये विदेश व्यापार करती है. तालिबान सरकार पाकिस्तान के बजाय समुद्र तक पहुंच के लिए दूसरा विकल्प तलाश रही है. चाबहार पोर्ट का संचालन जारी रहने से काबुल के लिए यह सबसे सही विकल्प है, जिस तक उसकी करीबी पहुंच भी है. ईरान में शांत होने से अब अफगनिस्तान INSTC का हिस्सा बन सकता है. इससे रीजनल ट्रेड पर पाकिस्तानी पकड़ बेहद कमजोर होने जा रही है, जो भारत के लिए फायदे का सौदा है.
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