डीएनए एक्सप्लेनर
यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब में हमले तेज कर दिए हैं. हाल ही में सऊदी अरब के पूर्वी तट पर स्थित एक प्रमुख ऊर्जा और पेट्रोकेमिकल हब जुबैल इंडस्ट्रियल सिटी पर हमला किया गया.
पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर नए सिरे से भड़कता हुआ दिखाई दे रहा है. सऊदी अरब के जुबैल इलाके में एक गैस फैसिलिटी पर हुए हालिया हमले के पीछे हूती विद्रोहियों का हाथ सामने आ रहा है. इजरायल के 'चैनल 14' की रिपोर्ट के अनुसार, यमन के हूती विद्रोहियों ने ल जुबैल में सऊदी अरामको के गैस प्लांट पर हमला किया था. जुबैल सऊदी अरब के पूर्वी तट पर स्थित है और इसे देश के प्रमुख इंडस्ट्रियल और एनर्जी हब में से एक माना जाता है. टकराव सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है. इराक में सक्रिय ईरान-समर्थित मिलिशिया 'हरकत हिजबुल्लाह अल-नुजाबा' ने भी अमेरिका और सऊदी अरब के खिलाफ भीषण जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है.
जुबैल में सऊदी अरब का पेट्रोकेमिकल, रिफाइनिंग और गैस से जुड़ा बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है. यहां हूती के ड्रोन हमले से सऊदी अरब के नेतृत्व में चिंता बढ़ गई है. सऊदी और हूती विद्रोहियों के बीच तनाव जुलाई महीने में ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के बाद से ही भड़का हुआ है. तब ईरान से वापस आ रहे एक एयरप्लेन को यमन में लैंड नहीं करने दिया गया था. यमन की सेना ने इसे लैंड होने से रोकने के लिए रनवे पर बमबारी कर दी थी. यमन में इस समय सऊदी समर्थक सरकार है. सऊदी गठबंधन का मानना था कि सना एयरपोर्ट पर उतरने वाला विमान संदिग्ध था और उसका उपयोग हूती विद्रोहियों को सैन्य मदद देने के लिए किया जा रहा था.
इस घटना के बाद ईरान समर्थित हूती ने घोषणा की थी कि वे रेड सी में बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य के पास नौसैनिक नाकेबंदी कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि यह कदम यमन की सऊदी नाकेबंदी के जवाब में उठाया गया है. 6 अगस्त 2026 को भी ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब और यमन में एक साथ बड़े हमले किए थे. यमन सरकार के मिलिट्री ठिकानों पर हुए हमले में 58 सैनिकों की मौत हुई थी. सऊदी के नजरान में भी ड्रोन हमला हुआ था जिसमें 11 नागरिक घायल हुए थे. इसमें 7 सऊदी, एक यमनी, दो मिस्री, एक पाकिस्तानी नागरिक शामिल थे.
हाल ही में सऊदी अरब की सेना ने अमेरिकी सेना के साथ मिलकर इराक में शिया मिलिशिया ठिकानों पर हमले किए थे. इसके जवाब में 'हरकत हिजबुल्लाह अल-नुजाबा' के सेक्रेटरी-जनरल शेख अकरम अल-काबी ने कहा है कि मिसाइल का जवाब सिर्फ मिसाइल से और आग का जवाब सिर्फ आग से ही दिया जा सकता है. उन्होंने सऊदी अरब के साथ कूटनीति की बात को भी खारिज कर दिया है.
सऊदी अरब और अमेरिका ने संयुक्त हमले 28 जुलाई को किए थे. इसके बाद CENTCOM ने बताया था कि उसने ईरान-समर्थित आतंकवादी गुटों को निशाना बनाया. आरोप है कि इराक के शिया मिलिशिया समूहों को ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने अमेरिकी सेना और सऊदी अरब के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने का निर्देश दिया था. CENTCOM ने अपने बयान में कहा था कि ईरान-समर्थित मिलिटेंट समूहों ने फरवरी और अप्रैल 2026 के बीच अमेरिकी नागरिकों और ठिकानों पर 600 से ज़्यादा बार हमले की कोशिश की थी.
पाकिस्तन ने सऊदी अरब के साथ 2025 में एक रक्षा समझौता किया था जिसके अनुसार, किसी एक पर हमला दोनों देशों पर हमला माना जाएगा. 8 अगस्त 2026 को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' पर हस्ताक्षर किए थे. इसमें भी किसी एक देश पर हमले को बाकी देशों पर भी हमला मानने की शर्त शामिल है. पाकिस्तान ने सऊदी अरब में अपने लगभग 15000 सैनिक और वायुसेना के लड़ाकू विमान भी तैनात किए हुए हैं. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि अगर सऊदी अरब युद्ध में कूदा तो पाकिस्तान क्या करेगा.
इस सवाल का जवाब भारतीय सेना के पूर्व मेजर और रक्षा विशेषज्ञ समर पाल सिंह तूर देते हैं. मेजर समर पाल (रि) कहते हैं कि सऊदी की सेना के जो ट्रेनर हैं वो पाकिस्तान आर्मी से ही जाते हैं. अगर सऊदी अरब को तकलीफ होगी पाकिस्तान सेना को कुछ करना ही पड़ेगा. अगर हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब युद्ध या ऑपरेशन करता है तो पाकिस्तानी जवानों को भी शामिल होना ही होगा. इसके जवाब में हूती पाकिस्तान तक मिसाइलें दागने की क्षमता रखते हैं.
मेजर समर पाल (रि) कहते हैं कि ईरान हूती को हर तरह से मदद देता है. ये मदद आर्थिक और सैन्य दोनों है. आज की तारीख में सऊदी अरब का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी ईरान ही है. हूती विद्रोही ईरान के इशारे पर ही कार्रवाई करते हैं. इसलिए ये टकराव बड़े युद्ध में भी बदल सकता है. अगर ये तनाव ज्यादा बढ़ा तो पाकिस्तान को ईरान और सऊदी में से किसी एक को चुनना ही पड़ेगा क्योंकि वह इससे बच नहीं सकता. ऐसी स्थिति आई तो ये तय है कि पाकिस्तान सऊदी अरब के साइड जाएगा. मेजर समर पाल (रि) कहते हैं कि पाकिस्तान भले ही खुद को खाड़ी देशों से रक्षा समझौते करके कूटनीति का बड़ा खिलाड़ी दिखा रहा हो, सच ये है कि वह एक ऐसे युद्ध में फंसने जा रहा है जो कभी उसका था ही नहीं.