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Ballistic Missile Defence System: मल्टी-लेयर्ड मिसाइल डिफेंस सिस्टम अलग-अलग ऊंचाई और रेंज पर कई इंटरसेप्शन जोन का इस्तेमाल करता है ताकि आने वाली मिसाइल को उसके टारगेट तक पहुंचने से पहले ही नष्ट किया जा सके.
Ballistic Missile Defence: मल्टी-लेयर्ड बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम का सफल परीक्षण करके भारत चुनिंदा देशों की श्रेणी में आ गया है. इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों (आईसीबीएम) को रोकने की क्षमता अब तक केवल अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों के पास ही है. भारत का BMD सिस्टम एक खास सुरक्षा कवच है जिसे 5000 किमी दूर से आ रही दुश्मन की लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों का पता लगाने, उन्हें ट्रैक करने और नष्ट करने के लिए बनाया गया है. इस प्रोग्राम की शुरुआत 1999 में पाकिस्तान और चीन द्वारा मिसाइल और परमाणु क्षेत्र में की गई तरक्की के बाद हुई थी. ऑपरेशनल होने के बाद रक्षा कवच कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत के अहम सामरिक, आर्थिक और रणनीतिक ठिकानों की रक्षा करेगा. आइये जानते हैं कि ये सिस्टम आखिर काम कैसे करेगा.
यह सिस्टम दो मुख्य स्तरों पर काम करता है. पहला- एंडो-एटमॉस्फेरिक (वायुमंडल के अंदर) और दूसरा- एक्सो-एटमॉस्फेरिक यानी अंतरिक्ष में. यह सिस्टम कई तरह की टेक्नोलॉजी के एक इंटीग्रेटेड नेटवर्क के ज़रिए काम करता है. सबसे पहला काम होता है दुश्मन की मिसाइल का पता लगाना और ट्रैक करना. इस प्रक्रिया की शुरुआत लंबी दूरी के ट्रैकिंग रडार से होती है, जो दुश्मन की मिसाइल लॉन्च का पता लगाते हैं. इसके लिए भारत ने शुरुआत में इजरायल के ग्रीन पाइन रडार का एक वर्जन "स्वॉर्डफिश" रडार का इस्तेमाल किया था. बाद में DRDO ने ज़्यादा क्षमता वाले और ज्यादा रेंज वाले स्वदेशी रडार सिस्टम विकसित किए.
इस सिस्टम का दूसरा चरण होता है कमांड और कंट्रोल. इसमें अलग-अलग जगहों पर मौजूद मिशन कंट्रोल सेंटर (MCC) और लॉन्च कंट्रोल सेंटर (LCC) का इस्तेमाल किया जाता है. रडार से मिले डेटा का विश्लेषण करने और जवाबी कार्रवाई में तालमेल बिठाने के लिए ये सेंटर एक सुरक्षित कम्युनिकेशन नेटवर्क से जुड़े होते हैं.
अगला चरण होता है एंगेजमेंट यानी कि मुकाबला करना. खतरे की पुष्टि होने के बाद, सिस्टम इंटरसेप्टर मिसाइलों को एक्टिवेट करता है. ये ऐसी मिसाइलें होती हैं जो दुश्मन की आने वाली मिसाइल से जाकर टकरा जाती हैं. यह सिस्टम दो मुख्य स्तरों पर टारगेट को रोकता है. अंतरिक्ष में, यानी पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर और पृथ्वी के वायुमंडल के अंदर.
भारत का मल्टी-लेयर्ड बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस, जमीन और समुद्र, दोनों जगह तैनात वेपन सिस्टम रडार के एक एडवांस्ड नेटवर्क का इस्तेमाल करता है. इस डिफेंस सिस्टम को अलग-अलग उड़ान क्षेत्रों में खतरों से निपटने के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए एक लेयर्ड आर्किटेक्चर के साथ डिज़ाइन किया गया है. इस सिस्टम को भविष्य के खतरों, जिनमें रणनीतिक बैलिस्टिक मिसाइलों से पैदा होने वाले खतरे भी शामिल हैं, से निपटने के लिए खास तौर पर डिजाइन की गई लेटेस्ट स्वदेशी तकनीकों का इस्तेमाल करके विकसित किया गया है.
मल्टी-लेयर्ड मिसाइल डिफेंस सिस्टम अलग-अलग ऊंचाई और रेंज पर कई इंटरसेप्शन ज़ोन का इस्तेमाल करता है ताकि आने वाली मिसाइल को उसके टारगेट तक पहुंचने से पहले ही नष्ट किया जा सके. सिर्फ एक इंटरसेप्टर पर निर्भर रहने के बजाय, यह सिस्टम खतरे को खत्म करने के लिए एक से ज्यादा मौके देता है. मिलिट्री प्लानर्स मानते हैं कि कोई भी इंटरसेप्टर 100% सफल नहीं होता. इसलिए अगर एक मौका चूक जाता है तो दुश्मन की मिसाइल को रोकने के लिए दूसरे और तीसरे प्रयास का विकल्प भी होना चाहिए.
बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) सिस्टम और S-400 या आकाश जैसे पारंपरिक एयर डिफेंस (AD) सिस्टम के बीच मुख्य अंतर उनके टारगेट स्पेशलाइज़ेशन, इंटरसेप्शन की ऊंचाई और रणनीतिक उद्देश्यों में होता है. BMD सिस्टम खास तौर पर उन बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिए डिजाइन है जो बहुत तेज गति (जैसे, मैक 5) से और फिक्स ट्रैजेक्टरी पर पर चलती हैं. इसके उलट, आकाश और S-400 जैसे पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम कई तरह के खतरों जैसे एयरक्राफ्ट, UAV, क्रूज मिसाइल और हेलीकॉप्टर से निपटने के लिए डिजाइन किए गए हैं. BMD सिस्टम बहुत ज़्यादा ऊंचाई पर काम करते हैं. भारत का BMD एक दो-स्तरीय सिस्टम है जिसमें एक्सो-एटमॉस्फेरिक इंटरसेप्शन 100 किमी तक और एंडो-एटमॉस्फेरिक इंटरसेप्शन 80 किमी तक होता है. वहीं, पारंपरिक सिस्टम कम ऊंचाई पर काम करते हैं. S-400 सिस्टम 30 किमी तक की ऊंचाई पर टारगेट को रोकता है. जबकि, आकाश 18 किमी तक की ऊंचाई पर काम करता है. BMD एक रणनीतिक सुरक्षा कवच है जिसका मकसद बड़े शहरों और परमाणु ठिकानों को लंबी दूरी की परमाणु-सक्षम मिसाइलों से बचाना है. इसके रडार बेहद ताकतवर होते हैं जो 1500 से 2500 किमी दूर से ही खतरों की पहचान लेते हैं और ट्रैकिंग कर सकते हैं.
इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) एक लंबी दूरी की रणनीतिक हथियार प्रणाली है. इसे विशेष रूप से ऐसी बैलिस्टिक मिसाइल के रूप में वर्गीकृत किया जाता है जिसकी मारक क्षमता 5,500 किलोमीटर से अधिक होती है. ये मिसाइलें अंतरराष्ट्रीय संकटों के दौरान भारी रणनीतिक अस्थिरता पैदा करती हैं. अधिकांश ICBM जमीन के नीचे निश्चित और ज्ञात साइलो (silos) में रखी होती हैं, इसलिए वे दुश्मन के पहले हमले लिए एक आसान निशाना बन जाती हैं. सबसे अहम बात ये कि इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल आम तौर पर परमाणु हमले के लिए ही होता है. ऐसी किसी मिसाइल के दागे जाने से दुनिया परमाणु युद्ध की चपेट में आ सकती है भले ही उसपर कोई न्यूक्लियर वॉरहेड न लगा हो.
ICBM 10000 से 20000 किमी दूर स्थित लक्ष्यों को भी निशाना बना सकती हैं. ये मिसाइलें पृथ्वी पर किसी भी लक्ष्य को निशाना बना सकती हैं. इनकी रफ्तार लगभग 15,000 मील प्रति घंटे (करीब मैक 23) की हो सकती है. इतनी तेज गति के कारण एक मिसाइल को रूस से अमेरिका पहुंचने में केवल 30 मिनट का समय लगता है. ऐसे में किसी भी देश के प्रमुख के पास जवाबी कार्रवाई करने या मिसाइल लॉन्च करने का फैसला लेने के लिए केवल कुछ ही मिनटों का समय होता है.
आधुनिक इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें पने साथ 10 अलग-अलग परमाणु हथियार (Warheads) ले जा सकती हैं. इसका मतलब है कि केवल एक मिसाइल एक साथ 10 अलग-अलग शहरों या ठिकानों को तबाह कर सकती है.