डीएनए एक्सप्लेनर
हूती विद्रोहियों से जंग के समय समय सऊदी अरब के पारंपरिक सहयोगी पाकिस्तान और अमेरिका पीछे हटते नजर आ रहे हैं. मक्का समझौता भी प्रभावहीन लग रहा है जिससे रियाद के लिए सुरक्षा संबंधी चुनौतियां और बढ़ गई हैं.
Houthis vs Saudi Arabia: ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने यमन में कई ऐसे ठिकानों पर कब्जा कर लिया जो लाल सागर के बेहद करीब हैं. हूती समूह ने सऊदी अरब के खमीस मुशेत, आभा और जाजान शहरों को निशाना बनाकर बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमले भी किए हैं. हूती लगातार सऊदी अरब की राष्ट्रीय संपत्तियों और बुनियादी ढांचे को निशाना बना रहे हैं. इस स्थिति ने सऊदी अरब को असहज कर दिया है. इस मुश्किल समय में पाकिस्तान हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई से पीछे हट गया है और अमेरिका ने भी किसी भी तरह की सीधी सैन्य कार्रवाई से इनकार कर दिया है. सवाल मक्का समझौते पर भी उठने लगे हैं जो सऊदी-तुर्किये और पाकिस्तान के बीच हुआ था.
हूती विद्रोही लगतार सऊदी अरब की तेल पाइपलाइनों को निशाना बना रहे हैं. जब पाकिस्तान ने इस संघर्ष में सीधे उतरने से इंकार कर दिया और मक्का रक्षा समझौते पर अपने वादे से मुकरता हुआ दिखा, तो सऊदी अरब ने मदद के लिए अमेरिका का रुख किया. लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने किसी भी तरह की सीधी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से इनकार करके प्रिंस सलमान की सारी उम्मीदें खत्म कर दीं.
एक्सियोस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने गुरुवार, 10 सितंबर को ट्रंप को दो बार फोन किया और हूतियों के खिलाफ हमले करने के लिए कहा. लेकिन दूसरी तरफ से डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया. अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि ट्रंप का फिलहाल सीधे तौर पर दखल देने का कोई इरादा नहीं है.
ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की सैन्य और तेल सुविधाओं पर ड्रोन व मिसाइल हमलों तेज कर दिए हैं. लाल सागर के पास सामरिक रूप से महत्वपूर्ण मोखा बंदरगाह पर हूतियों के कब्जे के बाद सऊदी अरब की चिंताएं भी बढ़ गई हैं. सऊदी अरब को स्थिति में देखने के बाद मक्का रक्षा समझौते की भी चर्चा होने लगी. सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए ने पिछले महीने जब इस डिफेंस पैक्ट पर साइन किए थे, तब बताया गया था कि इसमें शामिल किसी एक सदस्य पर हमला, सभी पर हमला माना जाएगा.
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने हाल ही में चेतावनी दी थी कि अगर यमन का संघर्ष सऊदी अरब तक फैलता है, तो मक्का समझौता लागू हो जाएगा और पाकिस्तान इस समझौते की शर्तों के तहत कार्रवाई के लिए बाध्य है. लेकिन, जब मौका आया तब पाकिस्तान पलट गया. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने साफ कहा है कि 'मक्का समझौता' केवल एक रक्षात्मक गठबंधन है और हूती विद्रोहियों के खिलाफ पाकिस्तान द्वारा किसी भी सैन्य स्ट्राइक की कोई योजना नहीं है. पाकिस्तान के इस रुख बदलने की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हो रही है.
इस पूरी घटना ने सऊदी अरब और प्रिंस सलमान को एक बड़ी कूटनीतिक उलझन में डाल दिया है. जिस पाकिस्तान पर उसे भरोसा था, उसने वक्त पर कदम पीछे खींच लिए. जिस अमेरिका से मदद की उम्मीद थी, उसने सैन्य सहायता देने से मना कर दिया. तीसरी तरफ, गठबंधन में शामिल तुर्किये ने इस मामले से ही दूरी बनाकर रखी है. हूती विद्रोहियों के बढ़ते खतरे के बीच सऊदी अरब इस समय क्षेत्रीय राजनीति में खुद को अकेला महसूस कर रहा है.
रक्षा विशेषज्ञ और भारतीय सेना के पूर्व अधिकारी मेजर जनरल राजीव नारायण (रि.) का कहना है कि सऊदी अरब इस स्थित के लिए खुद जिम्मेदार है. उनके अनुसार, 2025 के आखिर तक, UAE ने STC (सदर्न ट्रांज़िशनल काउंसिल) के साथ मिलकर दक्षिणी यमन के ज्यादातर हिस्से पर कब्जा कर लिया था. मोखा पोर्ट पर भी उनका दबदबा था. फिर प्रिंस सलमान ने जियो-पॉलिटिक्स का खेल खेला. सदर्न ट्रांज़िशनल काउंसिल के खिलाफ उत्तरी यमन का साथ दिया और उन पर बमबारी भी की. जनवरी 2026 की शुरुआत तक UAE और सदर्न ट्रांज़िशनल काउंसिल पूरी तरह पीछे हट गए.
मेजर जनरल राजीव नारायण (रि.) कहते हैं कि इस स्थिति का फायदा हूती विद्रोहियों को हुआ और उन्होंने बाब-अल-मंदेब के ठीक उत्तर में स्थित मोखा पोर्ट पर कब्ज़ा कर लिया है. वे बाब-अल-मंदेब के के सबसे संकरे हिस्से, हिसन मुराद तक भी पहुंच गए हैं. यान्बो जाने वाली सऊदी अरब की तेल पाइपलाइन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई है और मक्का समझौते की कमजोरी दुनिया के सामने है. MBS इसके लिए किसी और को नहीं, बल्कि खुद को ही दोषी ठहरा सकते हैं.