डीएनए एक्सप्लेनर
दुनिया भर में डिफेंस सेक्टर और मिसाइल तकनीक तेजी से बदल रही है. आज के समय में जंग जीतने के लिए सिर्फ बारूद की जरूरत नहीं है, बल्कि रफ्तार ही सबसे बड़ा हथियार बन गई है.
जब भी हम और आप मिसाइल या बम का नाम सुनते हैं, तो दिमाग में सबसे पहली तस्वीर क्या आती है? एक जोरदार धमाका, आग की लपटें, चारों तरफ उड़ता हुआ धुआं और बारूद. लेकिन क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक ऐसी मिसाइल भी हो सकती है जिसमें एक ग्राम भी बारूद या विस्फोटक न हो, फिर भी वह दुश्मन के बड़े से बड़े बंकर, युद्धपोत या सैटेलाइट के परखच्चे उड़ा दे?
जी हां, सुनने में यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी लग सकती है, लेकिन यह हकीकत है. मिलिट्री की दुनिया में इस एडवांस तकनीक को किनेटिक किल व्हीकल (Kinetic Kill Vehicle) या किनेटिक मिसाइल कहा जाता है.
इसे समझने के लिए विज्ञान की किसी भारी-भरकम किताब को खोलने की जरूरत नहीं है. आप बचपन में खेले जाने वाले कंचे या क्रिकेट की गेंद को याद कीजिए. अगर कोई आपके ऊपर टेनिस की गेंद धीरे से फेंके, तो आपको चोट नहीं लगेगी. लेकिन वही गेंद अगर 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आकर सिर पर लगे, तो गंभीर चोट आ सकती है. बस, यही सिद्धांत किनेटिक मिसाइलों पर भी लागू होता है.
फिजिक्स में एक नियम है कि जब कोई चीज बहुत तेज रफ्तार से चलती है, तो उसके अंदर एक ताकत पैदा होती है, जिसे गतिज ऊर्जा कहते हैं. पारंपरिक मिसाइलें जैसे स्कड या क्रूज मिसाइल, अपने साथ भारी मात्रा में बारूद लेकर जाती हैं. वे दुश्मन के ठिकाने से टकराती हैं और बारूद में विस्फोट होने से तबाही मचती है. इसके उलट, किनेटिक मिसाइल में बारूद की जगह धातु जैसे टंगस्टन या स्टील, का एक बेहद मजबूत और भारी टुकड़ा होता है.
इस मिसाइल का असली हथियार इसकी रफ्तार होती है. जब यह मिसाइल आवाज की गति से कई गुना तेज होकर सीधे अपने टारगेट से टकराती है, तो उस टक्कर से इतनी भयानक ऊर्जा निकलती है जो बड़े से बड़े लोहे के जहाज या कंक्रीट के बंकर को पिघलाकर मलबे में बदल देती है.

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के मुताबिक, जब कोई चीज अंतरिक्ष या हवा में मैक 5 (ध्वनि की गति से पांच गुना तेज, यानी करीब 6,100 किलोमीटर प्रति घंटा) या उससे अधिक की रफ्तार से चलती है, तो उसकी किनेटिक एनर्जी किसी भी आम विस्फोटक से कई गुना ज्यादा खतरनाक हो जाती है.
इसे एक उदाहरण से समझिए. मान लीजिए एक भारी-भरकम बुलेट ट्रेन 3,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से किसी दीवार से टकरा जाए. क्या वहां किसी बारूद की जरूरत पड़ेगी? नहीं, वह रफ्तार खुद में ही एक महाविनाशक विस्फोट बन जाएगी. किनेटिक मिसाइलें भी यही करती हैं. वे टारगेट को ब्लास्ट नहीं करतीं, बल्कि अपनी भयंकर रफ्तार और वजन के दम पर उसे पूरी तरह कुचल देती हैं.
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय और वैश्विक थिंक-टैंक सिपरी की विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार, किनेटिक तकनीक के मुख्य रूप से दो बड़े फायदे हैं-
अमेरिका की पैट्रियट (PAC-3) मिसाइल डिफेंस सिस्टम और थाड सिस्टम इसी हिट-टू-किल यानी किनेटिक तकनीक पर काम करते हैं. वे दुश्मन की मिसाइल को हवा में ही सीधे टक्कर मारकर नष्ट कर देते हैं. भारत भी अपने बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस प्रोग्राम और एंटी-सैटेलाइट टेस्ट में इस तकनीक का सफल प्रदर्शन कर चुका है.
आने वाले दिनों में युद्ध का तरीका पूरी तरह बदलने वाला है. अब लड़ाई सिर्फ इस बात की नहीं है कि किसके पास कितना बारूद है, बल्कि इस बात की है कि किसके पास कितनी रफ्तार है. किनेटिक मिसाइलें इस बात का जीता-जागता सबूत हैं कि कभी-कभी बिना एक भी चिंगारी सुलगाए, सिर्फ स्पीड से ही जंग जीती जा सकती है.