डीएनए एक्सप्लेनर
तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो पर बनने वाले बांध को भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा है. यह पूरा इलाका दुनिया के सबसे समृद्ध बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट में से एक है. यदि बेहद विशाल बांध भूकंप या भूस्खलन से टूटा तो भारत और बांग्लादेश में प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी.
China Dam on Yarlung Tsangpo River: चीन तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर दुनिया का सबसे बड़ा बांध बना रहा है. यारलुंग त्सांगपो नदी ही भारत में प्रवेश करने पर ब्रह्मपुत्र के नाम से जानी जाती है. ये आगे बांग्लादेश में प्रवेश करती है. चीन के इस मेगा प्रोजेक्ट ने लाखों लोगों का जीवन खतरे में डाल दिया है. ये बांध ऐसी जगह बन रहा है जहां भूस्खलन और भूकंप जैसे खतरे मंडराते रहते हैं. चीन अगर इस प्रोजेक्ट को पूरा कर लेता है तो इससे ब्रह्मपुत्र के नदी के प्रवाह पर असर पड़ने की आशंका है. चीन के इस प्रोजेक्ट को लेकर भारत में भी चिंताएं जताई जा रही हैं. यारलुंग त्सांगपो नदी पर बनने वाला बांध भारत और पूरे क्षेत्र के लिए कितना बड़ा खतरा है, आइये जानते हैं विस्तार से.
यारलुंग त्सांगपो नदी पर बनने वाला बांध चीन के 'थ्री गॉर्जियस डैम' को पछाड़कर दुनिया का सबसे बड़ा हाइड्रोपॉवर बांध बनेगा. इसकी क्षमता 60,000 मेगावाट बिजली बनाने की होगी. चीन इस बांध पर करीब 137 अरब डॉलर या 1 लाख करोड़ युआन से अधिक खर्च करने वाला है. चीन ने इस प्रोजेक्ट पर तेजी से काम भी शुरू कर दिया है और इसे 2033 तक पूरा करने का लक्ष्य है.
तिब्बत में बहने वाली यारलुंग त्सांगपो नदी जब अरुणाचल प्रदेश में सियांग और दो अन्य बड़ी सहायक नदियों के साथ मिलने के बाद असम में प्रवेश करती है तो इसे ब्रह्मपुत्र के नाम से जाना जाता है. ब्रह्मपुत्र भारत और बांग्लादेश में रहने वाले लाखों लोगों की जीवन रेखा है. यारलुंग त्सांगपो पर बांध बनाकर चीन ब्रह्मपुत्र के बहाव को कंट्रोल कर सकता है. चीन जब चाहेगा पानी रोक लेगा और जब चाहेगा भारी मात्रा में पानी छोड़ देगा. इससे बाढ़ और सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है.
तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी चीन अगर बांध बना लेता है तो ये भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए 'वॉटर बॉम्ब' की तरह होगा. युद्ध की स्थिति में अगर चीन इस बांध से अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़ देता है, तो असम और अरुणाचल प्रदेश में विनाशकारी बाढ़ आ जाएगी. सर्दियों या सूखे के दिनों में जब भारत में बारिश नहीं होती, तब ब्रह्मपुत्र का प्रवाह तिब्बत के पानी पर निर्भर करता है. इस समय यदि चीन पानी रोककर अपने जलाशय को भरने लगा, तो पूर्वोत्तर भारत में पानी और खेती का संकट खड़ा हो जाएगा.
ऐसा नहीं है कि यारलुंग त्सांगपो नदी पर बनने वाला बांध सिर्फ भारत के लिए खतरा होगा. ये चीन के लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता है. साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन को उसके अपने ही सरकारी भू-वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह विशाल बांध एक सक्रिय फॉल्ट लाइन ((जमीन के नीचे की दरार) पर बनने जा रहा है. इससे भूस्खलन, भूकंप और ढांचे में अस्थिरता जैसी समस्याएं हो सकती हैं. चीन की सरकारी संस्था 'चाइना जियोलॉजिकल सर्वे' की देखरेख में पिछले महीने चीनी भाषा की पत्रिका 'सेडिमेंट्री जियोलॉजी एंड टेथियन जियोलॉजी' में छपे एक पेपर के अनुसार, 'पैजेन फॉल्ट' ठीक उसी इलाके से गुजरती है जहां यह पनबिजली प्रोजेक्ट बनाया जा रहा है.
यह स्टडी चेंगदू यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, चाइना जियोलॉजिकल सर्वे के सिविल-मिलिट्री इंटीग्रेशन सेंटर और मिडिल यारलुंग ज़ंगबो नदी नेचुरल रिसोर्स ऑब्ज़र्वेशन एंड रिसर्च स्टेशन के रिसर्चर्स ने की थी. इस अध्ययन में कहा गया कि पैजेन फॉल्ट, जो प्लीस्टोसीन (आइस एज) के समय से ही बहुत एक्टिव रहा है, उसका असर आस-पास के स्ट्रक्चर - जैसे डैम, सड़कें, पुल, सुरंगें और रिजर्वॉयर एरिया की बनावट की मजबूती और निर्माण पर पड़ेगा. रिसर्चर्स ने यह भी चेतावनी दी है कि रिजर्वॉयर के आस-पास की जमीन की बनावट ढीली और कमज़ोर पकड़ वाली है. इससे बड़े इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स के नुकसान की आशंका बढ़ जाती है.
चीन के इस खतरे से निपटने के लिए भारत सरकार ने भी अरुणाचल प्रदेश में ऊपरी सियांग नदी पर एक विशाल 11,000 मेगावाट का बांध बनाने की योजना को मंजूरी दी है. ये बांध चीन द्वारा अचानक छोड़े गए अतिरिक्त पानी को रोकने और संग्रहित करने का काम करेगा. सर्दियों के दौरान जब चीन यारलुंग त्सांगपो नदी के पानी को रोकने की कोशिश करेगा तो भारत द्वारा बनाए जाने वाले बांध में जमा पानी काम आएगा.