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‘वनरंग 2026’ ने मुंबई के नरीमन पॉइंट में आदिवासी कला, जैविक उत्पाद, हस्तशिल्प और पारंपरिक संस्कृति को बड़ा बाजार दिया. सुनेत्रा पवार ने उद्घाटन किया. नरहरी झिरवाल की पहल से आयोजित यह मंच कलाकारों, किसानों और महिला समूहों को सीधे ग्राहकों से जोड़ने पर केंद्रित है.
मुंबई के सबसे महंगे इलाकों में शुमार नरीमन पॉइंट में अगर जंगलों और पहाड़ों की कला बिकने लगे तो इसका मतलब सिर्फ एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं है. इसके पीछे आदिवासी कारीगरों की कमाई और बाजार तक सीधी पहुंच की बड़ी कहानी छिपी है.वाई. बी. चव्हाण सेंटर में 7 से 9 अगस्त तक चल रहे ‘वनरंग 2026’ ने इसी बदलाव को सामने रखा है. शुक्रवार को महाराष्ट्र की उप मुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने इसका उद्घाटन किया. कार्यक्रम में खाद्य एवं औषधि प्रशासन और विशेष सहायता मंत्री नरहरी झिरवाल भी मौजूद रहे. आयोजन का फोकस आदिवासी कला, हस्तशिल्प, जैविक उत्पाद और पारंपरिक ज्ञान को बड़े शहरी बाजार से जोड़ना है.यह आयोजन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां आने वाला ग्राहक सिर्फ कोई सामान नहीं खरीद रहा, बल्कि उस कलाकार या उत्पादक तक बाजार का पैसा पहुंचाने की कोशिश का हिस्सा बन रहा है.
आदिवासी इलाकों में बनने वाले हस्तशिल्प और कृषि उत्पादों की सबसे बड़ी चुनौती अक्सर उत्पादन नहीं, बल्कि बाजार तक पहुंच होती है. ‘वनरंग 2026’ इसी कड़ी को बदलने का प्रयास कर रहा है.आयोजन में आदिवासी कारीगरों, वैद्यों, महिला स्वयं सहायता समूहों और कृषकों को ग्राहकों से सीधे जोड़ने पर जोर दिया गया है. वारली और गोंड पेंटिंग, हस्तशिल्प, जैविक कृषि उत्पाद और प्राकृतिक औषधियों जैसे उत्पाद यहां प्रदर्शित किए जा रहे हैं.
आयोजकों के अनुसार, इस मॉडल का उद्देश्य बिचौलियों पर निर्भरता घटाकर बिक्री से मिलने वाला वित्तीय लाभ सीधे उत्पादकों तक पहुंचाना है. आम ग्राहक के लिए इसका सीधा मतलब यह है कि वह किसी उत्पाद की कीमत चुकाते समय उसके पीछे काम करने वाले कलाकार या किसान को भी आर्थिक रूप से मजबूत कर सकता है.
केंद्र सरकार के कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय की 2025 की समीक्षा में भी आदिवासी लाभार्थियों के बनाए उत्पादों को सीधे खरीदारों से जोड़ने वाले ऑनलाइन बाजार मॉडल का उल्लेख किया गया है. इससे साफ है कि आदिवासी उत्पादों को केवल कल्चरल आइटम नहीं, बल्कि बाजार और उद्यमिता से जोड़ने की दिशा में काम हो रहा है.
‘वनरंग 2026’ में महाराष्ट्र की चार प्रमुख जनजातियों भील, कोकणा, ठाकर और गोंड की जीवनशैली, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित किया गया है. इसके साथ महाराष्ट्र और भारत के 12 अन्य राज्यों से आए हस्तशिल्प के प्रीमियम स्टॉल भी लगाए गए हैं. यानी एक ही जगह पर देश के अलग-अलग आदिवासी इलाकों की कला और उत्पादों को शहरी ग्राहक के सामने रखने की कोशिश की गई है.
यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि पारंपरिक कला को अब केवल संग्रहालय या सांस्कृतिक कार्यक्रम तक सीमित रखने के बजाय उसे प्रोडक्ट और बाजार की भाषा में भी पेश किया जा रहा है. इससे कलाकारों की अगली पीढ़ी को यह संदेश मिल सकता है कि पारंपरिक हुनर सिर्फ विरासत नहीं, कमाई का जरिया भी बन सकता है.
कार्यक्रम में आदिवासी समाज के विकास और उनकी कला को व्यापक पहचान दिलाने में मंत्री नरहरी झिरवाल के प्रयासों की चर्चा हुई. उनके मार्गदर्शन में महाराष्ट्र के पिछड़े आदिवासी अंचलों में भारत का पहला ‘ट्राइबल इंडस्ट्रियल क्लस्टर’ और औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान यानी ITI आकार ले सका है. इसका मकसद स्थानीय युवाओं के लिए प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर पैदा करना है.
इस पहल का बड़ा एंगल यह है कि आदिवासी विकास को केवल कल्याणकारी योजनाओं तक सीमित रखने के बजाय कौशल, उद्योग, रोजगार और बाजार से जोड़ने की कोशिश की जा रही है. अगर यह मॉडल लगातार आगे बढ़ता है तो इसका असर सिर्फ कलाकारों तक नहीं, बल्कि युवाओं और स्थानीय छोटे कारोबार तक भी पहुंच सकता है.
‘वनरंग 2026’ को केवल स्टॉल आधारित प्रदर्शनी नहीं रखा गया है. एनसीपीए के सामने मरीन ड्राइव पर कलाकार चेतन राउत द्वारा जनजातीय मोजेक आर्ट इंस्टालेशन तैयार किया गया है.प्रसिद्ध फोटोग्राफर कोलस्टन जूलियन के पिछले 30 महीनों के दौरान खींचे गए चित्रों पर आधारित ‘वनरंग फोटो बुक’ भी इस आयोजन का हिस्सा है.
इसका एक अलग असर भी है. मुंबई आने वाला व्यक्ति आदिवासी संस्कृति को सिर्फ खरीदारी के नजरिये से नहीं, बल्कि कला, फोटोग्राफी और सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शित रचनात्मकता के जरिए भी देख सकता है. यही वजह है कि आयोजन सांस्कृतिक पहचान और आर्थिक अवसर दोनों को एक साथ जोड़ता दिखाई देता है.
तीन दिनों के कार्यक्रम में मास्टरक्लास और कार्यशालाओं का भी आयोजन किया गया है. पद्मश्री राहीबाई पोपेरे, जिन्हें बीजमाता के नाम से जाना जाता है, पद्मश्री से सम्मानित तारपा वादक भिकल्या धिंडा और मई 2026 में माउंट एवरेस्ट फतह करने वाले महाराष्ट्र के पहले जनजातीय पर्वतारोही अनिल वसावे अपनी यात्रा साझा कर रहे हैं.
अनिल वसावे की कहानी पहले भी महाराष्ट्र में चर्चा में रही है. उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, उन्हें माउंट एवरेस्ट अभियान के लिए आदिवासी विकास विभाग से मदद मिली थी और अभियान के लिए लगभग 35 लाख रुपये की जरूरत बताई गई थी. खेल के मोर्चे पर अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित एथलीट कविता राउत और अन्य दिग्गजों के साथ जनजातीय खिलाड़ियों की चुनौतियों पर चर्चा भी रखी गई है. वारली और गोंड पेंटिंग की लाइव वर्कशॉप दर्शकों को कला को करीब से समझने का मौका दे रही है.
आयोजन का एक दिलचस्प हिस्सा 9 अगस्त को होने वाला ‘ट्राइबल लंच’ है. ताज के शेफ रघु देवरा के मार्गदर्शन में जनजातीय महिलाओं द्वारा तैयार पारंपरिक व्यंजन परोसे जाएंगे.खाने के जरिए किसी समुदाय की संस्कृति को समझना शायद सबसे आसान तरीका है. लेकिन इसके पीछे आर्थिक पहलू भी है. पारंपरिक व्यंजन, स्थानीय सामग्री और उन्हें बनाने वाली महिलाओं को बड़े शहरी ग्राहक से जोड़ना भविष्य में फूड बिजनेस, स्थानीय उत्पाद और छोटे उद्यमों के लिए नया रास्ता खोल सकता है.
यही ‘वनरंग’ का छिपा हुआ कारोबारी एंगल भी है. यदि किसी गांव का पारंपरिक उत्पाद मुंबई जैसे बाजार में अपनी जगह बना लेता है, तो उसकी मांग सिर्फ मेले के तीन दिनों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. असली सफलता तब होगी जब यही ग्राहक बाद में उस उत्पाद को दोबारा खरीदने या सीधे उत्पादक तक पहुंचने लगे.
समारोह के दौरान अलग-अलग क्षेत्रों में योगदान के लिए ‘वनरंग पुरस्कार 2026’ दिए जा रहे हैं. स्वदेश फाउंडेशन को 1000 गांवों के विकास हेतु, पद्मश्री भिकलिया धिंडा को लाइफटाइम अचीवमेंट, पर्वतारोही अनिल वसावे को खेल और आईएएस अधिकारी पी. अनबलगन को औद्योगिक क्रांति के लिए सम्मानित किया जा रहा है. कार्यक्रम में राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा, विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर और विधान परिषद सभापति राम शिंदे सहित कई जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी भी प्रस्तावित है.
‘वनरंग 2026’ की असली परीक्षा इस बात से होगी कि तीन दिनों के बाद क्या बदलता है. यदि ग्राहक सीधे कारीगरों से जुड़ते हैं, स्थानीय उत्पादों की दोबारा मांग बनती है और कलाकारों को अपने हुनर से बेहतर आय मिलने लगती है, तो ऐसे आयोजन महज प्रदर्शनी नहीं रहेंगे.आदिवासी कला की सबसे बड़ी चुनौती उसकी पहचान नहीं, बल्कि उसकी कमर्शियल पहुंच है. मुंबई जैसा बाजार इस अंतर को कम कर सकता है.
यानी नरीमन पॉइंट पर गूंजती थाप सिर्फ संस्कृति की आवाज नहीं है. यह उस बाजार की दस्तक भी है, जिसमें जंगल, पहाड़ और गांव में तैयार उत्पाद सीधे शहर के ग्राहक तक पहुंच सकते हैं. अगर यह कड़ी टिकाऊ बनती है तो इसका फायदा एक कलाकार से आगे बढ़कर उसके परिवार, महिला समूह, किसान और स्थानीय युवा तक पहुंच सकता है.