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US CPI July 2026 impact on stocks: अमेरिकी जुलाई CPI 3.4% और कोर CPI 2.5% रही. इससे सितंबर में Fed की दरें स्थिर रखने की उम्मीद बढ़ी है. लेकिन तेल, ईरान तनाव और कमजोर रोजगार बाजार के कारण दर बढ़ोतरी का जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.
अमेरिका की जुलाई CPI रिपोर्ट ने महंगाई के मोर्चे पर बाजार को थोड़ी राहत जरूर दी है, लेकिन निवेशकों की चिंता पूरी तरह खत्म नहीं हुई. महंगाई 3.4% पर आने और कोर CPI 2.5% रहने से सितंबर में ब्याज दरें स्थिर रहने की उम्मीद मजबूत हुई है. फिर भी तेल की ऊंची कीमत और ईरान से जुड़ा तनाव ऐसा जोखिम है, जो अगले कुछ हफ्तों में पूरा समीकरण बदल सकता है.
जुलाई में अमेरिका की सालाना CPI महंगाई दर 3.4% रही, जो जून के 3.5% से थोड़ी कम है. वहीं कोर CPI, जिसमें खाद्य और ऊर्जा कीमतें शामिल नहीं होतीं, 2.5% पर आ गई, जबकि जून में यह 2.6% थी. फरवरी के बाद यह कोर महंगाई का सबसे निचला स्तर है.
मासिक आधार पर जुलाई में CPI 0.1% बढ़ी और कोर CPI में 0.2% की बढ़ोतरी हुई. कुल मिलाकर आंकड़े अर्थशास्त्रियों के अनुमान के करीब रहे. Reuters के मुताबिक, इस नरमी ने सितंबर में ब्याज दर बढ़ाने की बाजार की आशंका को कम किया है. ([Reuters][2])
Financial Express की रिपोर्ट में CME Group के FedWatch Tool का हवाला देते हुए बताया गया है कि सितंबर की FOMC बैठक में दरें अपरिवर्तित रहने की संभावना 66% तक पहुंच गई, जो पहले 50% थी. हालांकि, अलग-अलग समय पर बाजार की संभावनाएं बदल सकती हैं और Reuters ने CPI के बाद सितंबर में बढ़ोतरी की संभावना करीब 38% बताई थी.
आम निवेशक के लिए इसका मतलब साफ है. अगर Fed दरें नहीं बढ़ाता है, तो बाजार में ब्याज दरों से जुड़ा दबाव कम रह सकता है. इससे शेयरों और सोने जैसे एसेट्स को सहारा मिल सकता है.
रॉयटर्स के अनुसार CPI के बाद अमेरिकी शेयर बाजार में शुरुआती प्रतिक्रिया सकारात्मक रही. Reuters के अनुसार Nasdaq और S&P 500 में तेजी आई, बॉन्ड यील्ड नीचे आई और डॉलर में भी हल्की कमजोरी दिखी.
लेकिन सभी टेक शेयरों ने एक जैसी चाल नहीं दिखाई. अमेरिका की सात प्रमुख टेक्नोलॉजी कंपनियों का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा. Nvidia इसका अपवाद रही, जिसमें 3% की तेजी दर्ज की गई, जबकि अल्फ़ाबेट में मामूली गिरावट आई.
यही इस खबर का एक अहम संकेत है. महंगाई में नरमी बाजार के लिए अच्छी खबर है, लेकिन निवेशक अब सिर्फ CPI नहीं देख रहे. ब्याज दरों के साथ कंपनियों की कमाई, AI से जुड़ा निवेश, बॉन्ड यील्ड और तेल की कीमतें भी शेयरों की दिशा तय कर रही हैं. यानी CPI ने बाजार से एक डर जरूर कम किया है, लेकिन पूरी तस्वीर अभी साफ नहीं हुई है.
CPI के आंकड़े आने के बाद सोने और चांदी को शुरुआती तौर पर सहारा मिला. वजह सीधी है. अगर फेड ब्याज दरें नहीं बढ़ाता है, तो अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और डॉलर पर दबाव आने की संभावना बनती है. ऐसी स्थिति में ब्याज नहीं देने वाली धातुओं की निवेश अपील बढ़ सकती है. लेकिन यह तेजी ज्यादा देर नहीं चली. Financial Express के मुताबिक गुरुवार को सोना 4,400 डॉलर प्रति औंस के नीचे आ गया. इससे पहले यह 10 हफ्तों के उच्चतम स्तर पर पहुंचा था. चांदी भी 65 डॉलर प्रति औंस से नीचे चली गई, जबकि सत्र के दौरान यह सात हफ्तों के उच्चतम स्तर तक पहुंची थी.
यहां निवेशकों के लिए छिपा हुआ एंगल तेल है. अगर तेल महंगा रहता है, तो इससे भविष्य की महंगाई पर फिर दबाव बन सकता है. उस स्थिति में Fed के लिए दरों में कटौती या दरें लंबे समय तक स्थिर रखने का फैसला आसान नहीं होगा. Financial Express की रिपोर्ट में भी तेल, डॉलर, बॉन्ड यील्ड और ब्याज दरों के बीच इस कड़ी को बाजार के लिए अहम बताया गया है.
ब्रेंट क्रूड करीब 87 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है. छह सत्रों की तेजी के बाद इसमें नरमी आई, लेकिन तेल बाजार पर होर्मुज जलडमरूमध्य और ईरान से जुड़ी घटनाओं का असर बना हुआ है.
अगर आने वाले हफ्तों में कच्चे तेल की कीमत फिर तेजी पकड़ती है, तो अमेरिकी महंगाई के दोबारा ऊपर जाने का खतरा बढ़ सकता है. Reuters ने भी जुलाई CPI के बाद ऊर्जा कीमतों और वैश्विक ईंधन कीमतों की अस्थिरता को Fed के लिए जोखिम बताया है. ([Reuters][1])
यही वजह है कि मौजूदा स्थिति को केवल महंगाई कम होने की खबर मानना ठीक नहीं होगा. CPI भले नरम है, लेकिन तेल महंगा हुआ तो आने वाले आंकड़े फिर गर्म हो सकते हैं.
मध्यावधि चुनाव नजदीक होने के बीच महंगाई और तेल की कीमतें अमेरिकी राजनीति के लिए भी संवेदनशील मुद्दा बन रही हैं. ब्रेंट में लगातार तेजी अमेरिकी उपभोक्ताओं की लागत बढ़ा सकती है और इससे मुद्रास्फीति पर राजनीतिक दबाव भी बढ़ सकता है.
मोनाक्सा के जोखिम प्रमुख आर्टेम बाकुश ने इसी संदर्भ में कहा है कि ट्रंप के लिए मौजूदा स्थिति परेशानी बढ़ाने वाली है, खासकर तब जब उनकी रेटिंग पहले से दबाव में है और ईरान संघर्ष भी जारी है.
गोल्डमैन सैक्स के पूर्व विश्लेषक निक पकरिन ने भी Fed की दुविधा की ओर इशारा किया है. उनके मुताबिक, अगर ईरान की स्थिति अस्थिर रहती है और तेल की कीमतें नियंत्रण योग्य स्तर तक नहीं आतीं, तो बिना दरें बढ़ाए महंगाई को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है. यानी अमेरिकी आम आदमी के लिए इसका सीधा मतलब पेट्रोल, परिवहन और दूसरी वस्तुओं की लागत से जुड़ा है. तेल का झटका CPI की अगली रिपोर्ट में फिर दिखाई दे सकता है.
Fed के सामने सिर्फ महंगाई का सवाल नहीं है. हालिया रोजगार आंकड़ों ने भी चिंता बढ़ाई है. जुलाई के रोजगार आंकड़ों के बाद बाजार को संकेत मिला कि लेबर मार्केट पहले जितना मजबूत नहीं रहा.
यही Fed के लिए सबसे मुश्किल स्थिति है. अगर वह महंगाई रोकने के लिए ब्याज दर बढ़ाता है तो कमजोर रोजगार बाजार पर और दबाव पड़ सकता है. लेकिन अगर महंगाई फिर बढ़ने लगती है और Fed दरें नहीं बढ़ाता, तो कीमतों को काबू में करना मुश्किल हो सकता है.
Reuters के मुताबिक, जुलाई CPI, कमजोर रोजगार संकेतों और बाद में आए PPI आंकड़ों ने सितंबर में दरें स्थिर रहने की उम्मीद को मजबूत किया है. 13 अगस्त को जारी आंकड़ों में जुलाई का अमेरिकी PPI स्थिर रहा और सालाना आधार पर 4.7% बढ़ा, जबकि जून का आंकड़ा संशोधित होकर 5.5% से नीचे आया. बाजार में सितंबर में दरें स्थिर रहने की संभावना करीब 67.6% तक आंकी गई थी.
Federal Reserve के आधिकारिक कैलेंडर के अनुसार FOMC की अगली बैठक 15 और 16 सितंबर 2026 को होगी. यह दो दिन की बैठक होगी और इसके साथ आर्थिक अनुमानों का सारांश भी जारी किया जाएगा. इससे पहले 19 अगस्त को जुलाई की FOMC बैठक का मिनट्स जारी होना है. इसके बाद अगस्त CPI, PPI और रोजगार से जुड़े आंकड़े भी सामने आएंगे. इसलिए जुलाई CPI को सितंबर के फैसले का अंतिम संकेत मानना जल्दबाजी होगी.
Financial Express से बातचीत में Fifth Third Commercial Bank के मुख्य अमेरिकी अर्थशास्त्री बिल एडम्स ने भी इसी बात पर जोर दिया कि जुलाई CPI से सितंबर में दरें स्थिर रखने के लिए जरूरी संकेत मिलते हैं, लेकिन अगस्त CPI और अन्य आर्थिक आंकड़े भी Fed के फैसले में अहम होंगे.
LPL Financial के मुख्य अर्थशास्त्री जेफरी रोच का अनुमान है कि Fed दरों को स्थिर रख सकता है, लेकिन दर बढ़ाने के पक्ष में सदस्यों की संख्या बढ़ रही है और यह बहुमत को प्रभावित कर सकती है.
Capital.com के वरिष्ठ वित्तीय बाजार विश्लेषक काइल रोड्डा के मुताबिक CPI और कमजोर रोजगार आंकड़े सितंबर में दरें स्थिर रखने की तरफ इशारा करते हैं, लेकिन दर बढ़ोतरी का जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.
इस समय सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि CPI 3.4% पर आई है या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या महंगाई लगातार नीचे जाएगी. अगर अगस्त के आंकड़ों में भी नरमी रहती है और तेल की कीमतें नियंत्रण में आती हैं, तो सितंबर में Fed के दरें स्थिर रखने की संभावना और मजबूत हो सकती है. इसके उलट तेल में तेज उछाल, कोर महंगाई में दोबारा मजबूती या रोजगार बाजार के आंकड़ों में ऐसा बदलाव जो महंगाई का दबाव बढ़ाए, तो सितंबर की दर बढ़ोतरी की चर्चा फिर तेज हो सकती है.
यही कारण है कि अभी सोने-चांदी में एकतरफा तेजी या शेयर बाजार में बिना जोखिम वाली तेजी मानना सही नहीं होगा. अगले कुछ हफ्तों में डॉलर, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, कच्चा तेल, अगस्त CPI और रोजगार आंकड़े सबसे अहम संकेतक बनेंगे.
अमेरिका में दरें स्थिर रहने की संभावना बढ़ने का असर भारत जैसे उभरते बाजारों पर भी पड़ सकता है. अमेरिकी यील्ड और डॉलर में नरमी आती है तो विदेशी निवेशकों के लिए उभरते बाजारों की संपत्तियां कुछ हद तक ज्यादा आकर्षक हो सकती हैं.
दूसरी तरफ अगर ईरान तनाव के कारण तेल फिर महंगा होता है, तो भारत के लिए आयात बिल, रुपये और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है. इसका असर भारतीय शेयर बाजार के साथ-साथ सोने की घरेलू कीमतों पर भी पड़ सकता है.
यानी अमेरिकी CPI की यह खबर सिर्फ अमेरिका की कहानी नहीं है. भारतीय निवेशक के पोर्टफोलियो से लेकर पेट्रोल-डीजल की कीमत और सोने की खरीद तक, इसका असर कई रास्तों से पहुंच सकता है.
रॉयटर्स के अनुसार अभी तस्वीर फेड की सितंबर बैठक में दरें बढ़ाने के मुकाबले उन्हें स्थिर रखने की तरफ झुकी हुई दिख रही है. जुलाई CPI का 3.4% और कोर CPI का 2.5% होना बाजार के लिए राहत है. लेकिन 2% के Fed लक्ष्य से महंगाई अभी भी ऊपर है और तेल तथा ईरान का जोखिम बना हुआ है. इसलिए सितंबर में ब्याज दर बढ़ोतरी की संभावना खत्म नहीं हुई है. फिलहाल बाजार का संदेश यही है कि Fed के पास इंतजार करने की गुंजाइश बढ़ी है, लेकिन फैसला अगस्त के महंगाई, रोजगार और ऊर्जा कीमतों के आंकड़ों पर काफी निर्भर करेगा.
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