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Will you get 5 lakh or less in pocket from selling gold: सोने की कीमत बढ़ने पर पुरानी ज्वेलरी बेचकर नई ज्वेलरी खरीदना फायदे का सौदा लग सकता है. लेकिन बेचते समय कैपिटल गेन्स टैक्स और नई ज्वेलरी पर जीएसटी व मेकिंग चार्ज का हिसाब समझना जरूरी है. सही गणना से अचानक आने वाले टैक्स खर्च से बचा जा सकता है.
अगर आपके घर में कई साल पुरानी सोने की ज्वेलरी रखी है और आज के ऊंचे भाव देखकर उसे बेचने या बदलने का विचार है, तो सिर्फ ज्वेलर से मिलने वाली रकम देखकर फैसला न करें. असली सवाल यह है कि आपने सोना कितने में खरीदा था और अब कितने में बेच रहे हैं. सीए सुदेशना बसु बताती हैं कि आयकर विभाग के अनुसार ज्वेलरी को पर्सनल इस्तेमाल की चीज मानकर कैपिटल एसेट से बाहर नहीं रखा जाता. सोने की ज्वेलरी की बिक्री से होने वाला फायदा कैपिटल गेन्स के दायरे में आ सकता है.
यानी 5 लाख रुपये में सोना बेचने का मतलब यह नहीं है कि पूरे 5 लाख रुपये पर टैक्स लगेगा. टैक्स का सवाल मुख्य तौर पर इस बात से जुड़ा है कि उस सोने को खरीदने में आपकी लागत कितनी थी और बिक्री पर कितना फायदा हुआ.
फिजिकल गोल्ड और गोल्ड ज्वेलरी को लंबे समय तक रखने और बेचने के मामले में 24 महीने की अवधि अहम है. 24 महीने से ज्यादा रखने के बाद बेचने पर होने वाला फायदा लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स माना जाता है और इस पर 12.5 फीसदी की दर लागू होती है. 23 जुलाई 2024 से गोल्ड के लिए लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स की दर 12.5 फीसदी हुई और इंडेक्सेशन का फायदा हटा दिया गया.
अगर सोना 24 महीने या उससे कम अवधि में बेचा जाता है, तो फायदा शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स के रूप में आपकी लागू इनकम टैक्स स्लैब दर से टैक्सेबल हो सकता है. इसलिए महंगे भाव में सोना बेचने से पहले सिर्फ आज का रेट देखना काफी नहीं है. खरीद की तारीख और खरीद कीमत भी उतनी ही महत्वपुर्ण है.
सीए सुदेशा कहती हैं मान लीजिए किसी व्यक्ति ने पुरानी ज्वेलरी 3 लाख रुपये में खरीदी थी और बाद में उसे 5 लाख रुपये में बेच दिया. सिर्फ उदाहरण के तौर पर देखें तो अंतर 2 लाख रुपये हुआ. अगर ज्वेलरी 24 महीने से ज्यादा समय तक रखी गई थी, तो 2 लाख रुपये के कैपिटल गेन्स पर 12.5 फीसदी की दर से बेस टैक्स 25,000 रुपये बनता है. इसके ऊपर लागू सेस और अन्य प्रावधानों का असर अलग हो सकता है.
इस उदाहरण में 5 लाख रुपये पूरी तरह टैक्सेबल इनकम नहीं है. टैक्स की गणना बिक्री मूल्य और स्वीकार्य लागत के बीच बने गेन्स पर होती है. यही वह जगह है जहां कई लोग गलती करते हैं और पूरी बिक्री रकम को टैक्स के साथ जोड़कर देखने लगते हैं. पुरानी ज्वेलरी की खरीद की रसीद इसलिए संभालकर रखना बेहद जरूरी है. खरीद का दस्तावेज लागत साबित करने में मदद कर सकता है.
सबसे बड़ा भ्रम यही है कि पुराना सोना बेचकर उसी पैसे से नई ज्वेलरी खरीद ली तो कैपिटल गेन्स टैक्स नहीं लगेगा. सामान्य तौर पर ऐसा नहीं है. पुरानी ज्वेलरी की बिक्री एक अलग टैक्स इवेंट हो सकती है और नई ज्वेलरी खरीदना अलग ट्रांजैक्शन है. सिर्फ नई ज्वेलरी खरीद लेने से पुराने सोने की बिक्री पर बने कैपिटल गेन्स अपने आप खत्म नहीं हो जाते. यही वजह है कि ऊंचे भाव के समय पुराने सोने को बेचकर नई ज्वेलरी लेने वाले लोगों को कुल लागत का हिसाब पहले करना चाहिए.
पुराना सोना बेचने के बाद नई ज्वेलरी खरीदते समय एक और खर्च सामने आता है. सीबीआईसी के अनुसार ज्वेलरी की कुल ट्रांजैक्शन वैल्यू पर 3 फीसदी जीएसटी लगाया जाता है. मेकिंग चार्ज अलग से दिखाया गया हो या नहीं, ज्वेलरी की कुल ट्रांजैक्शन वैल्यू पर 3 फीसदी जीएसटी का नियम लागू होता है.
उदाहरण के लिए अगर नई ज्वेलरी की कुल कीमत 5 लाख रुपये है, तो केवल 3 फीसदी जीएसटी के हिसाब से 15,000 रुपये का टैक्स बनता है. इसके अलावा मेकिंग चार्ज भी बिल का हिस्सा हो सकता है.
यानी पुराना सोना बेचकर नई ज्वेलरी खरीदने में दो अलग हिसाब देखने होंगे. पहला पुराने सोने की बिक्री से होने वाला कैपिटल गेन्स और दूसरा नई ज्वेलरी खरीदने पर लगने वाला जीएसटी व मेकिंग चार्ज.
यहां एक महत्वपूर्ण राहत भी है. सीबीआईसी की सेक्टोरल एफएक्यू के अनुसार अगर कोई आम व्यक्ति अपनी पुरानी ज्वेलरी ज्वेलर को बेचता है और वह बिक्री उसके बिजनेस के तौर पर नहीं हो रही है, तो उस बिक्री पर ज्वेलर को रिवर्स चार्ज के तहत जीएसटी नहीं देना होता.
इसका मतलब यह नहीं है कि बिक्री से होने वाला इनकम टैक्स वाला हिसाब भी खत्म हो गया. जीएसटी और इनकम टैक्स दो अलग टैक्स सिस्टम हैं. पुरानी ज्वेलरी बेचने वाले ग्राहक को इस फर्क को समझना चाहिए.
सोने के ऊंचे भाव देखकर बेचने का फैसला भावनात्मक रूप से आसान लगता है, लेकिन ज्वेलरी के मामले में सिर्फ बाजार भाव देखकर फायदा तय नहीं होता. ज्वेलर पुरानी ज्वेलरी खरीदते समय शुद्ध सोने की मात्रा, प्योरिटी, पत्थरों और अन्य हिस्सों का मूल्यांकन कर सकता है. वहीं नई ज्वेलरी खरीदते समय मेकिंग चार्ज और जीएसटी जुड़ते हैं.
इसलिए किसी व्यक्ति को यह देखना चाहिए कि पुरानी ज्वेलरी बेचने के बाद हाथ में वास्तविक कितनी रकम आएगी और नई ज्वेलरी खरीदने के लिए कुल कितनी रकम खर्च करनी पड़ेगी. यही पूरा हिसाब असली फायदा या अतिरिक्त खर्च बताएगा.
अगर ज्वेलरी खरीदते समय बिल मौजूद है तो उसे संभालकर रखें. खरीद की तारीख और कीमत कैपिटल गेन्स की गणना में अहम हो सकती है. विरासत में मिली या गिफ्ट में मिली ज्वेलरी के मामले में लागत और होल्डिंग पीरियड के नियम अलग परिस्थितियों के अनुसार तय हो सकते हैं, इसलिए बड़े ट्रांजैक्शन में टैक्स एक्सपर्ट से गणना करवाना बेहतर है.
खास तौर पर अगर ज्वेलरी की कीमत कई लाख रुपये है, तो सिर्फ ज्वेलर की खरीद कीमत पर भरोसा करने के बजाय अपने पुराने बिल, भुगतान का रिकॉर्ड और बिक्री से मिलने वाली रकम का हिसाब साथ रखें.
अगर पुराना सोना बेचकर नया सोना खरीदने की सोच रहे हैं, तो पहले यह पता करें कि पुरानी ज्वेलरी कितने समय से आपके पास है और उसकी मूल लागत क्या थी. इसके बाद बिक्री से होने वाले संभावित कैपिटल गेन्स की गणना करें.
फिर नई ज्वेलरी की कीमत में मेकिंग चार्ज और 3 फीसदी जीएसटी जोड़कर वास्तविक खर्च निकालें. इसके बाद ही तय करें कि पुरानी ज्वेलरी बेचना और नई खरीदना वाकई फायदे का सौदा है या सिर्फ महंगे सोने की कीमत देखकर ऐसा लग रहा है.
सबसे अहम बात यह है कि 5 लाख रुपये की बिक्री और 5 लाख रुपये के मुनाफे को एक जैसा न समझें. टैक्स बिक्री की पूरी रकम पर नहीं, नियमों के अनुसार बने कैपिटल गेन्स पर तय होता है. यही फर्क आपकी जेब पर पड़ने वाले वास्तविक टैक्स को बदल सकता है.
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