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क्या सोने के दाम और गिरेंगे या यही है खरीदारी का आखिरी मौका? एक्सपर्ट की चेतावनी-अगले 3 महीने में गोल्ड देगा और 'शॉक'

Gold price prediction next 3 months: सोने की कीमतों में हाल की तेज उठापटक के बीच अगले तीन महीने अहम रहने वाले हैं. अमेरिका की ब्याज दर, ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड, डॉलर और पश्चिम एशिया तनाव सोने की दिशा तय करेंगे. एक्सपर्ट के मुताबिक गिरावट में खरीदारी का मौका मिल सकता है, लेकिन जल्दबाजी ठीक नहीं.

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क्या सोने के दाम और गिरेंगे या यही है खरीदारी का आखिरी मौका? एक्सपर्ट की चेतावनी-अगले 3 महीने में गोल्ड देगा और 'शॉक'

क्या अभी सोना खरीदना गलती होगी? एक्सपर्ट ने बताया कब आ सकता है गिरावट का बड़ा मौका (फोटो एआई)

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गोल्ड खरीदने से पहले 10 सेकंड पढ़ लें. सोना अभी सस्ता होने की राह पर है या फिर महंगा होने वाला है, इसका फैसला अगले कुछ हफ्तों में अमेरिका की ब्याज दर, बॉन्ड यील्ड और भू-राजनैतिक तनाव करेंगे. ऐसे में सराफा बाजार में अभी खरीदारी करना समझदारी है या थोड़ा इंतजार, यही सबसे बड़ा सवाल है. मन की उलझन और सराफा बाजार में सोने के भाव में आई गिरावट पर एक्सपर्ट की राय क्या है चलिए समझते हैं. 

कमोडिटी एंड शेयर मार्केट एक्सपर्ट देवकृष्ण पांडेय कहते हैं कि अगर आप त्योहारी सीजन में सोना खरीदने की तैयारी कर रहे हैं तो सिर्फ आज का सराफा भाव देखकर फैसला करना भारी पड़ सकता है. सितंबर की शुरुआत में सोने ने पहले तेज गिरावट दिखाई और उसके बाद दोबारा उछाल भी आया. यही उतार-चढ़ाव बता रहा है कि बाजार में अभी दिशा पूरी तरह साफ नहीं है.

5 सितंबर को 24 कैरेट सोने का भाव 1,56,820 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट सोने का भाव 1,43,760 रुपये प्रति 10 ग्राम था. 4 सितंबर को 24 कैरेट का भाव 1,55,510 रुपये था. यानी एक ही दिन में 1,310 रुपये प्रति 10 ग्राम का बदलाव देखने को मिला. यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सोना महंगा है या सस्ता. असली सवाल यह है कि अगले तीन महीने में कौन से फैक्टर इसे ऊपर या नीचे ले जा सकते हैं.

अमेरिका की ब्याज दर सोने के लिए बनेगी सबसे बड़ी कुंजी

सोने पर सबसे ज्यादा नजर अमेरिका के फेडरल रिजर्व की अगली पॉलिसी पर है. फेडरल रिजर्व की अगली एफओएमसी बैठक 15 और 16 सितंबर 2026 को होनी है. जुलाई की बैठक में फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर को 3.65 प्रतिशत के स्तर पर बनाए रखा था. हालांकि उस बैठक में कुछ सदस्यों ने 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की पैरवी की थी. यही वजह है कि सितंबर की बैठक गोल्ड के लिए बेहद अहम हो गई है. अगर फेड का रुख सख्त रहता है और बाजार को ब्याज दर ज्यादा समय तक ऊंची रहने का संकेत मिलता है तो अमेरिकी डॉलर और बॉन्ड यील्ड को सहारा मिल सकता है. इसका दबाव सोने पर पड़ सकता है. इसके उलट अगर महंगाई और रोजगार के आंकड़े फेड को नरम रुख अपनाने का मौका देते हैं तो सोने को राहत मिल सकती है.

बॉन्ड यील्ड बढ़ी तो सोने पर क्यों आता है दबाव?

सोना खुद कोई ब्याज नहीं देता. इसलिए जब अमेरिकी सरकारी बॉन्ड से मिलने वाला रिटर्न बढ़ता है तो निवेशकों के लिए बॉन्ड ज्यादा आकर्षक हो सकते हैं. 1 सितंबर को अमेरिकी 10 साल की ट्रेजरी यील्ड 4.79 प्रतिशत और 30 साल की यील्ड 5.28 प्रतिशत तक पहुंच गई थी. उसी समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना करीब 4,377 डॉलर प्रति औंस तक फिसला था. रॉयटर्स के मुताबिक 1 सितंबर को सोना 2 प्रतिशत से ज्यादा गिरकर 4,342.20 डॉलर प्रति औंस के करीब पहुंच गया था. बढ़ती अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड और मजबूत डॉलर को इस गिरावट की प्रमुख वजहों में गिना गया. आम भारतीय खरीदार के लिए इसका सीधा मतलब है कि अगर अमेरिकी यील्ड लगातार ऊंची रहती है तो अंतरराष्ट्रीय सोने में दबाव आ सकता है. लेकिन भारत में इसका असर रुपये की चाल पर भी निर्भर करेगा.

रुपया कमजोर हुआ तो अंतरराष्ट्रीय गिरावट का फायदा कम मिल सकता है

भारतीय खरीदार के लिए एक पेच यह है कि केवल अंतरराष्ट्रीय गोल्ड प्राइस देखना काफी नहीं है. डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत भी घरेलू सोने का भाव तय करने में अहम भूमिका निभाती है. अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना थोड़ा गिरता है लेकिन रुपया कमजोर होता है, तो भारत में सोने की कीमत में उतनी बड़ी गिरावट नहीं दिख सकती. यही वजह है कि भारतीय सराफा बाजार में कई बार ग्लोबल मार्केट की गिरावट का पूरा फायदा ग्राहकों को नहीं मिलता.

4 सितंबर को रुपया करीब 94.59 प्रति डॉलर पर रहा था. इसी दिन अमेरिकी यील्ड में नरमी की उम्मीदों के बीच भारतीय बाजार में सोने और चांदी में भी हलचल देखने को मिली. यानी अगले तीन महीने में गोल्ड खरीदने वालों को एक साथ तीन चीजें देखनी होंगी. अंतरराष्ट्रीय सोना, डॉलर-रुपया और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड.

भू-राजनैतिक तनाव बढ़ा तो फिर भाग सकता है सोना

सोने के लिए सबसे बड़ा सपोर्ट फैक्टर अभी भी भू-राजनैतिक अनिश्चितता है. पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव तेल की कीमतों और महंगाई की चिंता को बढ़ा रहा है. ऐसी स्थिति में निवेशक सुरक्षित माने जाने वाले एसेट की तरफ रुख कर सकते हैं. 5 सितंबर की रिपोर्टों में भी पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेल सप्लाई को लेकर चिंता का असर सोने के बाजार पर दिखाई दिया. अंतरराष्ट्रीय स्पॉट गोल्ड करीब 4,465 डॉलर प्रति औंस के आसपास था. यहां दिलचस्प बात यह है कि भू-राजनैतिक तनाव सोने को ऊपर ले जा सकता है, लेकिन अगर उसी तनाव के कारण तेल बहुत महंगा होता है और महंगाई बढ़ती है तो फेड की ब्याज दर को लेकर सख्त रुख की संभावना भी बढ़ सकती है. यानी एक ही घटना सोने के लिए एक तरफ सहारा और दूसरी तरफ दबाव, दोनों पैदा कर सकती है.

एक्सपर्ट ने बताया 1.60 लाख रुपये वाला लेवल क्यों अहम?

मनीकंट्रोल की 3 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक बोनांजा के सीनियर रिसर्च एनालिस्ट नीरपेंद्र यादव ने एमसीएक्स गोल्ड के लिए 1.60 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर को अहम बताया है. उनके अनुसार हाल की तेज तेजी और उसके बाद आई करेक्शन को देखते हुए 1.60 लाख रुपये को तुरंत ऊपर जाने वाली मंजिल मानने के बजाय ब्रेकआउट लेवल के तौर पर देखना चाहिए.

उनके मुताबिक अगर सोना लगातार 1.60 लाख रुपये के ऊपर टिकता है और वॉल्यूम तथा मोमेंटम भी बेहतर रहता है तो 1.65 से 1.70 लाख रुपये तक जाने का रास्ता खुल सकता है. वहीं अमेरिकी ब्याज दर, डॉलर और यील्ड का माहौल निकट अवधि में सबसे बड़ा जोखिम बना हुआ है. इसका मतलब साफ है. अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि मौजूदा भाव सोने का आखिरी मौका है या इससे बड़ी गिरावट आने वाली है.

अगले तीन महीने में आम खरीदार को क्या करना चाहिए?

अगर शादी या किसी जरूरी पारिवारिक काम के लिए सोना खरीदना है तो पूरी खरीदारी एक ही दिन करने के बजाय चरणबद्ध खरीदारी ज्यादा व्यावहारिक हो सकती है. इससे अचानक आई गिरावट का फायदा उठाने की गुंजाइश रहती है. वहीं अगर मकसद केवल निवेश है तो सिर्फ इस डर से खरीदारी करना कि सोना अब कभी सस्ता नहीं होगा, सही रणनीति नहीं मानी जा सकती. हाल की कीमतों में ही काफी उतार-चढ़ाव दिख चुका है.सबसे अहम तारीख 15 से 16 सितंबर की एफओएमसी बैठक रहेगी. इसके अलावा अमेरिकी महंगाई, रोजगार के आंकड़े, डॉलर और ट्रेजरी यील्ड पर भी नजर रखनी होगी.  

सोने में आगे क्या हो सकता है?

मौजूदा संकेतों को देखें तो सोने के लिए तस्वीर न पूरी तरह तेजी की है और न पूरी तरह मंदी की. ऊंची बॉन्ड यील्ड और सख्त फेड रुख सोने को झटका दे सकते हैं, जबकि केंद्रीय बैंकों की खरीद, भू-राजनैतिक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता कीमत को सपोर्ट कर सकते हैं. मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक गोल्डमैन सैक्स को 2026 में केंद्रीय बैंकों की औसत मासिक खरीद करीब 50 टन रहने की उम्मीद है और उसने साल के अंत के लिए 4,900 डॉलर प्रति औंस का अनुमान दिया है.

देव कहते हैं कि इसलिए खरीदार के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि अभी घबराकर पूरी खरीदारी करने की जरूरत नहीं है. अगर कीमतों में कमजोरी आती है तो वह खरीदारी का मौका बन सकती है, जबकि 1.60 लाख रुपये के ऊपर टिकाऊ तेजी बाजार की अगली दिशा का अहम संकेत दे सकती है. खरीदारी से पहले एक बात जरूर याद रखें. ज्वैलरी का अंतिम बिल सिर्फ सोने के भाव से तय नहीं होता. जीएसटी, मेकिंग चार्ज और दूसरे शुल्क के कारण अलग-अलग ज्वैलर्स पर अंतिम कीमत काफी बदल सकती है. 

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