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हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में क्यों पढ़ाया जाता है इस इंडियन डिलीवरी सर्विस का कोडिंग सिस्टम? जोमैटो-स्वीगी भी जिसके आगे हो गए फेल  

Food Delivery Service: भारत में बिना जीपीएस-ऐप के कई दशक से चली आ रही टिफिन सर्विस के डिलीवरी पैटर्न से हार्वर्ड बिजनेस स्कूल ऐसा प्रभावित हुआ कि अपने मैनेजमेंट कोर्स में इसे शामिल कर चुका है. यहां स्टूडेंट पढ़ते हैं कि कैसे दुनिया की सबसे सटीक डिलीवरी सर्विस चलाता है और इसका अनोखा नेटवर्क क्या है.

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हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में क्यों पढ़ाया जाता है इस इंडियन डिलीवरी सर्विस का कोडिंग सिस्टम? जोमैटो-स्वीगी भी जिसके आगे हो गए फेल  

कैसे बिना किसी गलती के रोज लाखों घरों तक पहुंचते हैं ऑफिसेस में टिफिन? (फोटो एआई)

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  • टेक्नोलॉजी फेल, डिब्बेवालों का सिस्टम पास
  • पांच हजार पार्टनर, एक जैसी जिम्मेदारी
  • बिना एप्स के सटिक डिलीवरी का राज
  • हार्वर्ड के सिलेबस में मुंबई की रूह
  • ओनरशिप से खड़ा किया बड़ा साम्राज्य

आज के दौर में जब हर चीज के लिए हमारे पास मोबाइल में एप्स हैं और डिलीवरी के लिए जीपीएस ट्रैकर्स, तब भी एक ऐसा सिस्टम है जो इन सबसे बहुत आगे है. मुंबई की लोकल ट्रेनों में सफर करने वाले डिब्बेवाले न तो कोई इंजीनियर हैं और न ही एमबीए डिग्री होल्डर, फिर भी उनकी काम करने की सटिकता को दुनिया ‘सिक्स सिग्मा’ लेवल का मानती है. आखिर बिना किसी डिजिटल गैजेट के ये लोग लाखों घरों का स्वाद उन तक कैसे पहुँचा देते हैं, यह सवाल आज भी बड़े-बड़े मैनेजमेंट गुरुओं को हैरान कर देता है.

आज के दौर में जब हर चीज के लिए हमारे पास मोबाइल में एप्स हैं और डिलीवरी के लिए जीपीएस ट्रैकर्स, तब भी एक ऐसा सिस्टम है जो इन सबसे बहुत आगे है. मुंबई की लोकल ट्रेनों में सफर करने वाले डिब्बेवाले न तो कोई इंजीनियर हैं और न ही एमबीए डिग्री होल्डर, फिर भी उनकी काम करने की सटिकता को दुनिया ‘सिक्स सिग्मा’ लेवल का मानती है. आखिर बिना किसी डिजिटल गैजेट के ये लोग लाखों घरों का स्वाद उन तक कैसे पहुँचा देते हैं, यह सवाल आज भी बड़े-बड़े मैनेजमेंट गुरुओं को हैरान कर देता है.

हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में दी जाती है इनके सप्लाई चेन की दाद ?

मुंबई के डब्बेवालों (Dabbawalas) की कार्यप्रणाली और उनके अनूठे मैनेजमेंट की पढ़ाई दुनिया भर के प्रतिष्ठित संस्थानों में कराई जाती है, जिसमें हार्वर्ड बिजनेस स्कूल (Harvard Business School) भी शामिल है. हार्वर्ड बिजनेस स्कूल और अन्य शीर्ष प्रबंधन संस्थानों में डब्बेवालों के सप्लाई चेन मैनेजमेंट (Supply Chain Management) और सिक्स सिग्मा (Six Sigma) पर आधारित कार्यकुशलता पर केस स्टडी पढ़ाई जाती है. डब्बेवालों की टिफ़िन डिलीवरी प्रणाली इतनी अचूक है कि इसे लगभग शून्य-त्रुटि (Zero Error) यानी 99.99% सटीकता के साथ काम करने का उदाहरण माना जाता है.

कोडिंग का वह कौन सा देसी जादू है जो डिलीवरी को फेल नहीं होता?

आपने सोचा है कि आखिर इनका सिस्टम काम कैसे करता है? न तो इनके पास बारकोड है और न ही कोई स्कैनिंग मशीन. हर डिब्बे पर रंगों और निशानों का एक ऐसा कोड बना होता है जो यह बता देता है कि इसे किस स्टेशन पर उतरना है, किस बिल्डिंग में जाना है और किस फ्लोर पर डिलीवरी देनी है. यह तरीका इतना सरल है कि कोई भी गलती की गुंजाइश ही नहीं बचती. यह हमें सिखाता है कि हर बार जटिल टेक्नोलॉजी ही बेहतर नहीं होती, कभी-कभी सादगी ही सबसे बड़ा समाधान बन जाती है.

इस बिजनेस में कोई एम्प्लॉई नहीं है- ऐसे कैसे?

इस पूरे बिजनेस मॉडल में सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां कोई 'एम्प्लॉई' नहीं है. हर डिब्बेवाला अपने आप में एक 'पार्टनर' है. जब आप कंपनी के मालिक की तरह काम करते हैं, तो आपकी मेहनत और जिम्मेदारी का स्तर ही बदल जाता है. यहाँ अगर एक भी डिब्बा देर से पहुँचता है, तो वह किसी कंपनी की नहीं बल्कि उस व्यक्ति की खुद की साख पर सवाल होता है. इसी ओनरशिप की भावना ने उन्हें अमेजन या फेडेक्स जैसी कंपनियों से अलग खड़ा कर दिया है.

मुंबई के डब्बेवालों का बिजनेस मॉडल कैसे करता है काम?

मुंबई के डब्बेवालों का बिजनेस मॉडल बिना किसी आधुनिक तकनीक या भारी निवेश के केवल मजबूत अनुशासन, आपसी समन्वय और अचूक टीम वर्क पर टिका है. इसमें टिफिन डिब्बों पर किए जाने वाले विशेष रंगों और संकेतों के कोडिंग सिस्टम का उपयोग होता है, जिससे बिना किसी गलती के सही समय पर भोजन ग्राहक तक पहुंचता है. लोकल ट्रेन और साइकिल जैसे पारंपरिक परिवहन माध्यमों के जरिए ट्रैफिक को मात देते हुए यह नेटवर्क 'सिक्स सिग्मा' जैसी लगभग शून्य त्रुटि के साथ काम करता है. यह मॉडल साबित करता है कि मजबूत कार्य संस्कृति और आपसी भरोसे से बिना ऐप के भी दुनिया का सबसे बेहतरीन डिलीवरी नेटवर्क चलाया जा सकता है.

क्या एआई और स्वैगी के सामने टिक पाएगा यह सिस्टम?

आज के डिजिटल युग में जब हमारे पास मिनटों में खाना पहुँचाने वाले एप्स मौजूद हैं, तो क्या डिब्बेवालों का भविष्य सुरक्षित है? सच तो यह है कि उनका धंधा तकनीक पर नहीं, बल्कि अटूट विश्वास और इंसानी जुड़ाव पर टिका है. डिब्बेवाले सिर्फ खाना नहीं पहुँचाते, वे एक घर का स्वाद दूसरे घर तक ले जाते हैं. यह सिस्टम इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि यह भरोसे की नींव पर बना है, जिसे कोई भी एल्गोरिथम रिप्लेस नहीं कर सकता.

वो कौन सी सीख जो हर स्टार्टअप के काम आएगी?

डिब्बेवालों की यह मास्टर क्लास हमें बताती है कि टेक्नोलॉजी केवल प्रोसेस को तेज कर सकती है, लेकिन उसे 'लेजेंडरी' बनाने के लिए मानवीय जिम्मेदारी और ओनरशिप की जरूरत होती है. जब हम किसी काम को अपना समझते हैं, तो उसमें गलती की संभावना लगभग खत्म हो जाती है. यह बिजनेस मॉडल साबित करता है कि अगर आपके पास एक मजबूत टीम और सही नीयत है, तो आप बिना किसी आलीशान ऑफिस या सॉफ्टवेयर के भी दुनिया का सबसे बेहतरीन सप्लाई चेन मैनेजमेंट खड़ा कर सकते हैं.

बिना किसी आधुनिक तकनीक, कागजी कार्रवाई या डिजिटल उपकरणों के लाखों लोगों तक प्रतिदिन सही समय पर डिब्बा पहुंचाने की उनकी व्यवस्था दुनियाभर के मैनेजमेंट गुरुओं के लिए शोध का विषय रही है.

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