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Why europe is moving gold from America: यूरोप के कई देश अपने सोने के भंडार की लोकेशन बदल रहे हैं. नीदरलैंड्स ने उत्तरी अमेरिका से करीब 86 टन सोना लंदन भेजा है. फ्रांस भी 129 टन सोना न्यूयॉर्क से हटा चुका है. वजह सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि संकट में सोने की तुरंत उपलब्धता भी है.
सोना सिर्फ गहना या निवेश नहीं है. देशों के केंद्रीय बैंकों के लिए यह ऐसा रिजर्व है, जिसे आर्थिक या भू-राजनीतिक संकट के समय इस्तेमाल किया जा सकता है. अब यूरोप में इसी सोने की लोकेशन को लेकर बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है. नीदरलैंड्स के केंद्रीय बैंक डीएनबी ने मार्च से अगस्त 2026 के बीच अमेरिका और कनाडा में रखे करीब 313 टन सोने में से लगभग 86 टन सोना लंदन शिफ्ट किया. बैंक ने कहा कि बढ़ती जियोपॉलिटिकल अशांति के बीच इस कदम से संकट की स्थिति में उसके गोल्ड रिजर्व को ज्यादा आसानी से इस्तेमाल किया जा सकेगा. यानी मामला सिर्फ यह नहीं है कि सोना कहां सुरक्षित है. असली सवाल यह भी है कि जरूरत पड़ने पर उसे कितनी जल्दी इस्तेमाल किया जा सकता है.
यहां एक दिलचस्प बात समझना जरूरी है. 86 टन का मतलब यह नहीं है कि सारा सोना ट्रकों या विमानों में भरकर अमेरिका से ब्रिटेन पहुंचाया गया. नीदरलैंड्स ने न्यूयॉर्क में करीब 59 टन सोना बेचकर उसके बराबर सोना लंदन में खरीदा. इस तरह इतनी मात्रा को अटलांटिक महासागर के पार भौतिक रूप से भेजने की जरूरत ही नहीं पड़ी.
इसके अलावा 27 टन से ज्यादा सोना अमेरिका और कनाडा से नीदरलैंड्स के ज़ीस्ट शहर में फिजिकल तौर पर भेजा गया. इसके बाद इतनी ही मात्रा को ज़ीस्ट से लंदन भेजा गया.डीएनबी के मुताबिक उसका कुल गोल्ड रिजर्व करीब 612.4 टन है. 2025 के अंत में इसकी कीमत लगभग 72.2 अरब यूरो थी. बदलाव के बाद नीदरलैंड्स के सोने का 32.1 फीसदी हिस्सा लंदन में है, जबकि न्यूयॉर्क और ओटावा में अब 18.5-18.5 फीसदी हिस्सा है.
नीदरलैंड्स का फैसला अकेला मामला नहीं है. फ्रांस ने भी इस साल अमेरिका में रखे अपने सोने के आखिरी हिस्से को यूरोप में शिफ्ट किया. बैंक ऑफ फ्रांस के आंकड़ों के मुताबिक न्यूयॉर्क में रखा 129 टन सोना जुलाई 2025 से जनवरी 2026 के बीच अलग-अलग लेनदेन के जरिए हटाया गया. यहां भी पूरा सोना जहाज या विमान से फ्रांस नहीं लाया गया. पुराने मानकों वाले बार न्यूयॉर्क में बेचकर यूरोप में नए मानकों वाले बार खरीदे गए और उन्हें पेरिस में रखा गया.
फ्रांस के कुल गोल्ड रिजर्व करीब 2,437 टन है. यानी न्यूयॉर्क से हटाया गया 129 टन उसके कुल भंडार का लगभग 5 फीसदी था. इस प्रक्रिया से फ्रांस को करीब 12.8 अरब यूरो का असाधारण वित्तीय लाभ भी हुआ.
यूरोप में सोने की लोकेशन बदलने का सिलसिला नया नहीं है. जर्मनी के बुंडेसबैंक ने भी विदेशों में रखे 216 टन से ज्यादा सोने को शिफ्ट किया था. इसमें न्यूयॉर्क से 111 टन और पेरिस से 105 टन सोना शामिल था. यह प्रक्रिया 2016 में खत्म होने वाले कुछ वर्षों के दौरान पूरी की गई थी.
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक गोल्डमैन सैक्स के रिसर्च एनालिस्ट लीना थॉमस और डैन स्ट्रूवेन ने बताया कि कोल्ड वॉर के दौरान यूरोप के कुछ केंद्रीय बैंकों ने अपने गोल्ड रिजर्व का एक हिस्सा न्यूयॉर्क शिफ्ट किया था. यानी संकट के दौर में सोने की लोकेशन बदलना पहले भी रणनीतिक नीति का हिस्सा रहा है.
यही इस पूरी कहानी का सबसे संवेदनशील सवाल है. लेकिन इसे सीधे अमेरिका से भरोसा उठने के तौर पर देखना सही नहीं होगा. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के वरिष्ठ बाज़ार रणनीतिकार जोसेफ कैवाटोनी ने बीबीसी को बताया कि युद्ध और व्यापारिक तनाव कुछ फैसलों को प्रभावित कर रहे हैं, लेकिन ये फैसले लेने के कारणों की सूची में सबसे ऊपर नहीं हैं. महंगाई, ब्याज दरें और सोने को ऐसी जगह रखना जहां उसका तेजी से कारोबार किया जा सके, इनकी भी अहम भूमिका है. यानी यूरोपीय केंद्रीय बैंक एक तरह से जोखिम बांट रहे हैं. पूरा सोना किसी एक देश या क्षेत्र में रखने के बजाय अलग-अलग जगहों पर रखना संकट की स्थिति में ज्यादा लचीलापन दे सकता है.
अगर यूरोप अमेरिका से कुछ सोना हटा रहा है तो सवाल है कि उसे लंदन ही क्यों भेजा जा रहा है. इसकी बड़ी वजह लंदन का ग्लोबल गोल्ड ट्रेडिंग सेंटर होना है. बैंक ऑफ इंग्लैंड दुनिया का सबसे बड़ा गोल्ड कस्टोडियन है. सेंट्रल लंदन में मौजूद करीब 300 साल पुरानी इस संस्था की तिजोरियों में लगभग चार लाख गोल्ड बार रखे हैं, जिनकी कीमत 200 अरब पाउंड से ज्यादा बताई गई है. संकट के समय सोने को तेजी से बेचना या खरीदना हो तो लंदन में मौजूद बड़ा बाजार इसे अपेक्षाकृत आसान बनाता है. यही वजह है कि सोने की सुरक्षा के साथ उसकी लिक्विडिटी भी केंद्रीय बैंकों के लिए अहम हो गई है.
यह बदलाव सिर्फ यूरोप तक सीमित नहीं है. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के 2026 सेंट्रल बैंक गोल्ड रिजर्व सर्वे के मुताबिक पिछले चार वर्षों में केंद्रीय बैंकों ने औसतन करीब 1,000 टन सोना प्रति वर्ष जमा किया है, जबकि इससे पहले के दशक में यह औसत करीब 500 टन था.
2026 की दूसरी तिमाही में केंद्रीय बैंकों और अन्य संस्थानों की नेट गोल्ड खरीद 288.9 टन रही. यह पहली तिमाही के संशोधित 57 टन से करीब पांच गुना ज्यादा थी. जुलाई 2026 में भी केंद्रीय बैंकों ने नेट 23 टन सोना खरीदा. इसमें चीन ने 20 टन और पोलैंड ने 8 टन सोना जोड़ा. इससे साफ है कि दुनिया के केंद्रीय बैंक सोने को सिर्फ पुराने जमाने की संपत्ति नहीं मान रहे. जियोपॉलिटिकल रिस्क, आर्थिक अनिश्चितता और रिजर्व डायवर्सिफिकेशन के दौर में इसकी रणनीतिक अहमियत फिर बढ़ी है.
इस पूरी कहानी का आम निवेशक से सीधा कनेक्शन है. जब दुनिया के केंद्रीय बैंक लगातार बड़ी मात्रा में सोना खरीदते हैं और अपने रिजर्व की लोकेशन को लेकर भी ज्यादा सतर्क हो जाते हैं, तो सोने की मांग को सपोर्ट मिलता है.
बीबीसी की रिपोर्ट में गोल्डमैन सैक्स के रिसर्चरों के हवाले से कहा गया है कि 2026 के अंत तक गोल्ड की कीमत 4,900 डॉलर प्रति औंस तक पहुंचने का अनुमान है. यह अगस्त की कीमत से करीब 300 डॉलर अधिक बताया गया है. रिसर्चरों के मुताबिक केंद्रीय बैंकों की मांग सोने की कीमत में तेजी का एक प्रमुख कारण है.
यह खबर सीधे तौर पर आम आदमी के बैंक खाते को नहीं बदलती, लेकिन इसका असर सोने की कीमत के रास्ते से पड़ सकता है. अगर केंद्रीय बैंक सोने को अपने रिजर्व का ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं और खरीद जारी रखते हैं, तो लंबे समय में डिमांड मजबूत रह सकती है. इसका मतलब यह है कि भारत में सोना खरीदने वाले लोगों के लिए अंतरराष्ट्रीय केंद्रीय बैंक की नीतियां अब पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई हैं.
दूसरा बड़ा संकेत यह है कि केंद्रीय बैंक अब सिर्फ कितना सोना रखना है, यह नहीं सोच रहे. वे यह भी देख रहे हैं कि सोना किस जगह रखा जाए, कितनी जल्दी उसे इस्तेमाल किया जा सके और किसी संकट में उस तक पहुंच बनी रहे.
यही इस पूरी कहानी का छिपा हुआ एंगल है. यूरोप का सोना इधर से उधर जाना महज तिजोरी बदलने की कहानी नहीं है. यह बताता है कि दुनिया के बड़े केंद्रीय बैंक आने वाले दौर में सुरक्षा, लिक्विडिटी और भू-राजनीतिक जोखिम को अपने रिजर्व मैनेजमेंट का ज्यादा बड़ा हिस्सा मान रहे हैं.
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