बिजनेस
Gobardhan yojana: केंद्र सरकार की गोबरधन योजना से देश में कंप्रेस्ड बायोगैस का उत्पादन बढ़ेगा, जिससे प्राकृतिक गैस के आयात पर निर्भरता घटेगी और सीएनजी-पीएनजी की कीमतें स्थिर रहने से आम आदमी को राहत मिलेगी.
क्या आपका भी वाहन सीएनजी से चलता है और रसोई में पीएनजी का इस्तेमाल होता है, तो अब आपकी जेब पर विदेशी गैस के महंगे दामों की मार से राहत मिलने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है. सरकार ने एक ऐसा बड़ा दांव चला है जिससे ना सिर्फ गैस के दाम स्थिर रहेंगे, बल्कि आने वाले दिनों में आपकी गाड़ियां खेतों के गोबर और मवेशियों के कचरे से दौड़ती नजर आएंगी.
केंद्र सरकार ने गोबरधन योजना को मंजूरी देकर देश के ऊर्जा क्षेत्र में एक बहुत बड़ा बदलाव लाने की नींव रख दी है. इस योजना का मुख्य मकसद देश में कंप्रेस्ड बायोगैस यानी सीबीजी का उत्पादन तेजी से बढ़ाना है. अभी तक हम अपनी ऊर्जा जरूरतों और प्राकृतिक गैस के लिए बड़े पैमाने पर विदेशों पर निर्भर रहते हैं, जिसकी वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में भाव बदलते ही घरेलू गैस के दाम आसमान छूने लगते हैं. इस योजना के तहत अब कृषि अपशिष्ट, गोबर, चीनी मिलों के कचरे और शहरी गीले कचरे से सीबीजी तैयार की जाएगी. सबसे अच्छी बात यह है कि इसे सीधे गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाली सीएनजी और घरों की पीएनजी में मिलाया जाएगा, जिससे आम आदमी को काफी सहूलियत मिलेगी.
सरकार का मकसद सिर्फ गैस की कीमत कम करना नहीं, बल्कि आयातित प्राकृतिक गैस पर निर्भरता घटाना है. भारत में CNG और PNG के लिए इस्तेमाल होने वाली प्राकृतिक गैस का एक हिस्सा आयात से आता है. अंतरराष्ट्रीय गैस कीमतें बढ़ने पर इसका असर घरेलू ऊर्जा लागत पर पड़ सकता है. CBG यानी Compressed Bio-Gas गोबर, कृषि अवशेष, खाद्य/शहरी गीले कचरे और अन्य जैविक कचरे से बनाई जा सकती है. इसे प्राकृतिक गैस के समान उपयोगों में इस्तेमाल किया जा सकता है.
इसलिए सरकार की सोच मोटे तौर पर यह है:
कचरा → CBG → CNG/PNG में ब्लेंडिंग → प्राकृतिक गैस की जरूरत कम → गैस आयात पर निर्भरता कम
अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर अब सीधे आपकी जेब पर नहीं पड़ेगा. सरकार ने गोबरधन योजना के तहत हर प्लांट को सीधे सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क या ट्रंक पाइपलाइन से एक तय खरीदार के साथ जोड़ने की पुख्ता व्यवस्था कर दी है. इसके साथ ही सरकार खुद सीबीजी की कीमतें तय करेगी, जिससे वैश्विक बाजार में होने वाली उथल-पुथल का घरेलू बाजार पर ज्यादा असर नहीं होगा. जब गैस की कीमतें स्थिर रहेंगी, तो हर महीने रसोई का बजट और गाड़ी का खर्च संभालने वाले आम आदमी को बड़ी मानसिक शांति मिलेगी.
सरकार ने इस योजना को जमीन पर उतारने के लिए बहुत ही सख्त और स्पष्ट लक्ष्य तय किए हैं. देश की सभी सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों को चालू वित्त वर्ष के अंत तक गाड़ियों की सीएनजी और घरों की पीएनजी में कम से कम तीन प्रतिशत सीबीजी मिलाना अनिवार्य कर दिया गया है. इसके बाद वित्त वर्ष 2026 तक इसे बढ़ाकर चार प्रतिशत और वित्त वर्ष 2029 तक पांच प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है. पहले से ही देश भर में दो सौ से ज्यादा सीबीजी प्लांट चालू हो चुके हैं, जो इस दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं. इस डेडलाइन के पूरा होने से बाजार में सीबीजी की उपलब्धता बढ़ेगी और आयातित गैस पर भारत की निर्भरता कम से कम होती चली जाएगी.
1. किसानों और पशुपालकों को -सबसे बड़ा संभावित फायदा
गोबर और कृषि अवशेष, जो पहले कम कीमत वाला या बेकार संसाधन था, CBG प्लांट के लिए कच्चा माल बन सकता है. इससे ग्रामीण इलाकों में अतिरिक्त आय का रास्ता खुलता है.
गांवों के आसपास CBG प्लांट लगने से कचरा संग्रह, परिवहन, प्रोसेसिंग और गैस उत्पादन से जुड़ा पूरा नया बिजनेस इकोसिस्टम बन सकता है.
अगर घरेलू स्तर पर CBG की उपलब्धता बढ़ती है और आयातित गैस पर निर्भरता घटती है, तो लंबे समय में गैस की कीमतों में अंतरराष्ट्रीय उतार-चढ़ाव का दबाव कम हो सकता है. लेकिन यह कहना अभी सही नहीं होगा कि CNG/PNG के दाम तुरंत या निश्चित रूप से कम हो जाएंगे.
गन्ने के अवशेष, प्रेसमड और दूसरे जैविक अपशिष्ट से CBG उत्पादन का अवसर मिलेगा. यानी उद्योग अपने waste को revenue-generating resource में बदल सकता है.
सबसे बड़ा रणनीतिक फायदा ऊर्जा सुरक्षा का है—देश को गैस के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार पर कम निर्भर रहना पड़ेगा और साथ ही कचरा प्रबंधन व ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा मिल सकता है.
पेट्रोल में इथेनॉल की तर्ज पर CNG-PNG में CBG की ब्लेंडिंग का असली मकसद सिर्फ गैस सस्ती करना नहीं है. यह भारत के लिए “कचरे से ईंधन और ईंधन से कमाई” का मॉडल तैयार करने की कोशिश है. इसमें सबसे बड़ा फायदा किसानों, पशुपालकों और ग्रामीण CBG कारोबार को मिल सकता है, जबकि देश को आयातित गैस पर निर्भरता घटाने का रणनीतिक फायदा मिलेगा.
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