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रुपये को विदेशी मुद्रा की भारी आवक और आरबीआई के हस्तक्षेप से मजबूती मिली है. 4 सितंबर को रुपया 94.48 पर पहुंचा. लेकिन महंगा कच्चा तेल और अमेरिकी फेड की नीतियां आगे रुपये की चाल बिगाड़ सकती हैं.
26 अगस्त के बाद से रुपये और डॉलर की चाल पर नजर रखने वालों के लिए एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. कभी 93.55 तक मजबूत हुआ रुपया अब 94.48 के आसपास कारोबार कर रहा है, लेकिन इसके पीछे की कहानी सिर्फ डॉलर के कमजोर होने की नहीं है.
सबसे अहम बात यह है कि भारत में डॉलर की सप्लाई अचानक बढ़ी है. आरबीआई की विशेष योजनाओं से 31 अगस्त तक करीब 136.4 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा भारत में आई है. ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि रुपया क्यों मजबूत हुआ, बल्कि यह भी है कि आम आदमी की जेब पर इसका क्या असर पड़ सकता है और यह मजबूती कितने दिन टिकेगी.
रुपये को सबसे बड़ा सहारा भारत में आई भारी विदेशी मुद्रा से मिला है. आरबीआई की विशेष योजनाओं के जरिए 31 अगस्त तक करीब 136.4 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा भारत में आई. इसमें अकेले एफसीएनआर (बी) जमा के जरिए करीब 127.23 अरब डॉलर जुटाए गए.
सीधी भाषा में समझें तो भारतीय बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़ी है. जब किसी करेंसी की सप्लाई बढ़ती है और उसकी मांग तुलनात्मक रूप से कम रहती है, तो उसकी कीमत पर दबाव आ सकता है. यही वजह है कि डॉलर के मुकाबले रुपये को कुछ मजबूती मिली.
इसका असर आम लोगों पर भी पड़ सकता है. अगर रुपये में मजबूती लंबे समय तक बनी रहती है तो विदेश से आने वाले कुछ सामान, इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट और डॉलर में होने वाले कुछ भुगतान पर दबाव कम हो सकता है. हालांकि इसका फायदा तुरंत हर चीज की कीमत में दिखाई देना जरूरी नहीं है.
रुपये की चाल में आरबीआई की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है. जब बाजार में रुपये पर ज्यादा दबाव आता है तो केंद्रीय बैंक डॉलर बेचकर बाजार में डॉलर की सप्लाई बढ़ा सकता है. इससे रुपये की अचानक होने वाली गिरावट को रोकने में मदद मिलती है.
4 सितंबर को भी ट्रेडर्स ने विदेशी मुद्रा बाजार में आरबीआई के हस्तक्षेप की जानकारी दी. इसका मकसद रुपये को किसी एक तय स्तर पर रोकना नहीं, बल्कि उसमें होने वाले अचानक और तेज उतार-चढ़ाव को कंट्रोल करना है.
यही वह फैक्टर है जिसे आम निवेशक को समझना चाहिए. रुपये की मजबूती केवल बाजार की स्वाभाविक चाल नहीं है, बल्कि इसमें केंद्रीय बैंक की सक्रिय भूमिका भी शामिल है.
भारत में डॉलर की सप्लाई बढ़ने के साथ ही ग्लोबल स्तर पर भी अमेरिकी डॉलर पर दबाव देखने को मिला है. जापानी येन की मजबूती और अमेरिकी मौद्रिक नीति को लेकर बदलती उम्मीदों ने डॉलर की चाल को प्रभावित किया है.
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर कमजोर होता है तो भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की करेंसी को भी कुछ राहत मिल सकती है. यही वजह है कि रुपये की मौजूदा मजबूती को केवल घरेलू कारणों से जोड़कर देखना सही नहीं होगा.
यानी रुपये की कहानी इस समय दो तरफ से बन रही है. एक तरफ भारत में डॉलर की आवक बढ़ी है और दूसरी तरफ ग्लोबल बाजार में डॉलर पर दबाव है.
विदेशी मुद्रा की बड़ी आवक का सीधा फायदा भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को भी मिल रहा है. रिपोर्टों के मुताबिक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 729 अरब डॉलर तक पहुंच गया है और आगे इसमें और बढ़ोतरी की उम्मीद है.
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार आरबीआई को रुपये में तेज गिरावट आने पर बाजार में हस्तक्षेप करने की ज्यादा ताकत देता है.
आम लोगों के लिए इसका मतलब यह है कि देश के पास बाहरी झटकों से निपटने के लिए पहले की तुलना में बेहतर सुरक्षा कवच मौजूद है. हालांकि मजबूत रिजर्व रुपये को हमेशा मजबूत बनाए रखेगा, ऐसा मानना भी सही नहीं होगा.
रुपये की मौजूदा मजबूती के बीच सबसे बड़ा खतरा कच्चे तेल से सामने आ रहा है. पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं और ब्रेंट क्रूड 96 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया है.
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है. इसलिए तेल महंगा होने पर भारतीय कंपनियों को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. इससे डॉलर की मांग बढ़ सकती है और रुपये पर दोबारा दबाव बन सकता है.
यही इस पूरी कहानी का सबसे अहम छिपा हुआ पहलू है. अभी डॉलर की ज्यादा सप्लाई रुपये को सहारा दे रही है, लेकिन अगर तेल के लिए डॉलर की मांग तेज हो गई तो यह फायदा कमजोर पड़ सकता है.
रुपये के मजबूत होने का मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल, मोबाइल, कार या विदेश यात्रा तुरंत सस्ती हो जाएगी. कीमतों पर असर इस बात पर निर्भर करता है कि कंपनियां आयात लागत में हुई कमी का कितना फायदा ग्राहकों तक पहुंचाती हैं.
लेकिन लंबे समय तक रुपया मजबूत रहने पर आयातित सामान की लागत पर राहत मिल सकती है. विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों, विदेश यात्रा करने वाले परिवारों और डॉलर में भुगतान करने वाले लोगों के लिए भी मजबूत रुपया कुछ राहत दे सकता है.
इसके उलट भारत से बाहर कमाई करके पैसा भेजने वालों के लिए मजबूत रुपया अलग तस्वीर पेश करता है. समान डॉलर को रुपये में बदलने पर उन्हें पहले की तुलना में कम रुपये मिल सकते हैं.
फिलहाल रुपये को विदेशी मुद्रा की भारी आवक और आरबीआई के समर्थन का फायदा मिल रहा है. लेकिन आगे की दिशा तय करने में कई संकेतक अहम रहेंगे.
कच्चे तेल की कीमत सबसे बड़ा घरेलू जोखिम बनी हुई है. इसके अलावा अमेरिकी रोजगार के आंकड़े, डॉलर इंडेक्स और अमेरिकी फेड की ब्याज दरों को लेकर बाजार की उम्मीदें भी रुपये की दिशा प्रभावित करेंगी.
इसलिए 94 के आसपास पहुंचे रुपये को देखकर यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि डॉलर के मुकाबले भारतीय करेंसी की बड़ी और स्थायी तेजी शुरू हो गई है. मौजूदा मजबूती को समझने के लिए डॉलर की सप्लाई के साथ तेल की कीमत और वैश्विक ब्याज दरों पर भी नजर रखनी होगी.
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