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Delhi Rent Control Act old shops: दिल्ली के कनॉट प्लेस और चांदनी चौक की प्रॉपर्टी का मालिकाना हक एक जैसा नहीं है. कनॉट प्लेस में सरकारी जमीन और लीज वाली संपत्तियां हैं, जबकि चांदनी चौक में बड़ी संख्या में निजी मालिक हैं. पुराने किराया कानून ने कई प्रॉपर्टी के किराये को बेहद कम रखा है.
कनॉट प्लेस में करोड़ों की कीमत वाली प्रॉपर्टी और किराया सैकड़ों या कुछ हजार रुपये तक, यह सुनकर हैरानी होना स्वाभाविक है. चांदनी चौक में भी कई पुरानी दुकानों और मकानों पर दशकों पुराने किराये के समझौते आज तक असर डाल रहे हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन बाजारों की जमीन का मालिक कौन है और किराया आखिर किसकी जेब में जाता है.
कनॉट प्लेस को सिर्फ एक बाजार मानना सही नहीं होगा. यह दिल्ली के सबसे प्रमुख कारोबारी इलाकों में से एक है और इसकी कई प्रॉपर्टी अलग-अलग तरह की लीज व्यवस्था के तहत रही हैं. केंद्र सरकार की जमीन और संपत्तियों के प्रशासन में लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस यानी एलएंडडीओ की अहम भूमिका है. भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक एलएंडडीओ दिल्ली में भारत सरकार की हजारों लीज वाली संपत्तियों का प्रशासन करता है और इनमें कनॉट प्लेस जैसी प्राइम लोकेशन भी शामिल है.
यानी यह कहना कि कनॉट प्लेस की हर दुकान का मालिक सरकार है, पूरी तरह सही तस्वीर नहीं देता. यहां प्रॉपर्टी के अधिकार और लीज की स्थिति संपत्ति-दर-संपत्ति अलग हो सकती है. संसद में दिए गए एक जवाब में भी बताया गया था कि कनॉट प्लेस और कनॉट सर्कस की दुकानों में अलग-अलग तरह की लीज मौजूद थीं. वहीं इलाके की सड़क, सफाई और सिविक सेवाओं की जिम्मेदारी एनडीएमसी के पास है. एनडीएमसी की अपनी वेबसाइट पर कनॉट प्लेस के लिए अलग डिवीजन और सफाई सर्किल दर्ज हैं.
यहीं से इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा शुरू होता है. किसी दुकान या बिल्डिंग का मालिक कौन है और किराया कौन वसूलता है, ये दोनों हमेशा एक ही बात नहीं होती. अगर कोई प्रॉपर्टी सरकारी लीज पर है तो संबंधित लीज की शर्तों के अनुसार सरकार या संबंधित सरकारी प्राधिकरण को भुगतान हो सकता है. वहीं किसी निजी मालिक की दुकान किराये पर है तो किराया निजी मकान मालिक को जाता है. इसलिए पूरे कनॉट प्लेस का एक ही किराया वसूलने वाला नहीं है.
पुराने किराये की वजह से मामला और पेचीदा हो जाता है. दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट 1958 ने किराये और बेदखली को नियंत्रित करने के लिए कानूनी ढांचा बनाया था. कानून में स्टैंडर्ड रेंट की व्यवस्था है और धारा 6ए के तहत स्टैंडर्ड रेंट या निर्धारित परिस्थितियों में किराया तीन साल में 10 फीसदी बढ़ाने का प्रावधान है.
यही वजह है कि कुछ बेहद पुरानी कमर्शियल प्रॉपर्टी में आज का किराया बाजार की मौजूदा कीमत से बहुत नीचे रह सकता है. इंडियन एक्सप्रेस ने 2025 में दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी के हवाले से बताया था कि कनॉट प्लेस, करोल बाग और चांदनी चौक जैसे पुराने बाजारों में करोड़ों की कीमत वाली कुछ प्रॉपर्टी का मासिक किराया 500 रुपये तक भी हो सकता है.
चांदनी चौक की तस्वीर कनॉट प्लेस से अलग है. यहां बड़ी संख्या में दुकानें और इमारतें निजी मालिकों के पास हैं. कई संपत्तियां पीढ़ियों से परिवारों के पास चली आई हैं, जबकि कुछ प्रॉपर्टी समय के साथ बिक्री और विरासत के जरिए नए मालिकों के पास पहुंची हैं.
दिल्ली की अदालतों में दर्ज कई मामलों से भी इसकी झलक मिलती है. उदाहरण के लिए एक मामले में चांदनी चौक के कूचा महाजनी की दुकान को लेकर निजी मालिक और किरायेदार के बीच विवाद सामने आया था. अदालत के रिकॉर्ड में मालिक और किरायेदार के बीच किराये के संबंध का उल्लेख है.
एक दूसरे मामले में चांदनी चौक के कटरा नील की प्रॉपर्टी को निजी मालिक की संपत्ति बताया गया था. ऐसे अदालती रिकॉर्ड यह दिखाते हैं कि चांदनी चौक की सभी दुकानों को किसी एक सरकारी मालिक की प्रॉपर्टी समझना सही नहीं है.
चांदनी चौक में सिविक व्यवस्था और जमीन का मालिकाना हक दो अलग चीजें हैं. दिल्ली नगर निगम यानी एमसीडी इलाके में सफाई, सड़क और दूसरी बुनियादी नगर सेवाओं की जिम्मेदारी निभाती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वहां मौजूद हर दुकान या मकान एमसीडी का है. यही फर्क अक्सर आम लोगों को भ्रमित करता है. किसी इलाके का रखरखाव नगर निगम कर रहा हो, इसका अर्थ यह नहीं कि उस इलाके की हर प्रॉपर्टी का मालिक नगर निगम है.
चांदनी चौक की पुरानी दुकानों में किराये का मामला कई बार बेहद उलझा हुआ हो जाता है. पुराने किरायेदार, उत्तराधिकार, किराया समझौते और मालिकाना हक से जुड़े विवाद अदालतों तक पहुंचते रहे हैं.
दिल्ली हाईकोर्ट के अलग-अलग मामलों में चांदनी चौक की दुकानों के मालिक और किरायेदारों के बीच विवाद दर्ज हैं. एक मामले में 1979-80 से दुकान पर किरायेदारी का उल्लेख मिलता है, जबकि दूसरे मामले में मालिकाना हक और किरायेदारी को लेकर विवाद अदालत में पहुंचा.
यानी कई मामलों में आज की बाजार कीमत और पुराने किराये के बीच जमीन-आसमान का अंतर हो सकता है. यही अंतर मकान मालिक और किरायेदार के बीच विवाद की बड़ी वजह बनता है.
इसका जवाब सिर्फ इतना नहीं है कि मकान मालिक किराया नहीं बढ़ा सकता. असल कहानी पुराने किराया नियंत्रण कानून और उससे पैदा हुई ऐतिहासिक किरायेदारी व्यवस्था की है.
दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट का मकसद किरायेदारों को मनमानी बेदखली और अत्यधिक किराये से सुरक्षा देना था. लेकिन समय के साथ दिल्ली के कई पुराने कारोबारी इलाकों में प्रॉपर्टी की कीमत कई गुना बढ़ गई, जबकि कुछ पुराने किराये उसी अनुपात में नहीं बढ़े. दिल्ली हाईकोर्ट ने भी 2025 में ऐसे मामलों में पुराने किराया कानून के दुरुपयोग और बाजार पर उसके असर को लेकर कड़ी टिप्पणियां की थीं.
इसका एक छिपा हुआ असर यह भी है कि महंगी जमीन पर मौजूद कुछ पुराने किरायेदारी अधिकार खुद एक तरह की आर्थिक संपत्ति बन जाते हैं. दूसरी तरफ मकान मालिक को बाजार मूल्य के मुकाबले बहुत कम किराया मिलने की स्थिति पैदा हो सकती है.
अगर आप कनॉट प्लेस या चांदनी चौक में दुकान लेने की सोच रहे हैं तो केवल बाजार का किराया देखकर फैसला करना काफी नहीं है. पुरानी प्रॉपर्टी में लीज की शर्त, मालिकाना हक, किरायेदारी का इतिहास और दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट की स्थिति समझना भी जरूरी है.
यही कारण है कि एक ही इलाके में दो दुकानों का किराया बहुत अलग हो सकता है. एक नई या बाजार दर पर उपलब्ध दुकान का किराया बहुत ज्यादा हो सकता है, जबकि दशकों पुरानी किरायेदारी वाली दुकान का भुगतान बेहद कम हो सकता है.
इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि कनॉट प्लेस और चांदनी चौक किसी एक व्यक्ति या संस्था की पूरी तरह मालिकाना संपत्ति नहीं हैं. कनॉट प्लेस में सरकारी लीज और निजी अधिकारों का मिश्रण मिलता है, जबकि चांदनी चौक में बड़ी संख्या में निजी मालिक हैं. किराया उसी प्रॉपर्टी के वास्तविक मालिक या वैध लीज व्यवस्था के अनुसार जाता है. एनडीएमसी या एमसीडी का सिविक प्रबंधन करना अपने आप में जमीन का मालिक होना नहीं है.
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