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BRICS Benefits for Indian business: ब्रिक्स सम्मेलन का असर सिर्फ शेयर बाजार की चाल तक सीमित नहीं रह सकता. कारोबार आसान हुआ, लोकल करेंसी में पेमेंट बढ़ा और सप्लाई चेन मजबूत हुई तो फिनटेक, एमएसएमई, सेमीकंडक्टर, ग्रीन एनर्जी और लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टरों में नए बिजनेस और निवेश के रास्ते खुल सकते हैं.
ब्रिक्स सम्मेलन में जब दुनिया की नजर बड़े आर्थिक फैसलों और बाजार पर टिकी है, तब भारतीय कारोबार के लिए असली कहानी कहीं ज्यादा जमीनी है. सवाल यह नहीं है कि ब्रिक्स के बाद कौन सा शेयर चढ़ेगा. बड़ा सवाल यह है कि अगर सदस्य देशों के बीच कारोबार करना आसान हुआ तो किन भारतीय सेक्टरों को सीधे नए ग्राहक, निवेश और बाजार मिल सकते हैं.
10 सितंबर की मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय उद्योग ब्रिक्स से व्यापार बाधाएं कम करने, सीमा पार भुगतान आसान बनाने, व्यापार वित्त तक पहुंच बढ़ाने और मजबूत निवेश तथा सप्लाई चेन साझेदारी की मांग कर रहा है. उद्योग संगठनों ने स्थानीय करेंसी में कारोबार, पेमेंट सिस्टम की इंटरऑपरेबिलिटी और छोटे निर्यातकों के लिए वित्तीय मदद जैसे मुद्दे भी उठाए हैं.
यानी ब्रिक्स का संभावित फायदा सिर्फ बड़े कॉरपोरेट तक सीमित नहीं है. इसका असर उन छोटे कारोबारों तक भी पहुंच सकता है जो अभी पेमेंट, कस्टम, लॉजिस्टिक्स या विदेशी बाजार की जटिलताओं के कारण निर्यात नहीं कर पाते.
ब्रिक्स देशों के बीच कारोबार बढ़ाने में सबसे बड़ी अड़चनों में से एक सीमा पार पेमेंट है. भारतीय उद्योग ने लोकल करेंसी में सेटलमेंट बढ़ाने और पेमेंट सिस्टम के बीच बेहतर तालमेल की मांग की है.
मनीकंट्रोल के मुताबिक पीएचडीसीसीआई ने भारत के यूपीआई अनुभव का इस्तेमाल करते हुए इंटरऑपरेबल क्यूआर पेमेंट, तेज ट्रांसफर और साझा तकनीकी मानकों का प्रस्ताव रखा है. छोटे निर्यातकों के लिए इनवॉयस फाइनेंसिंग को टीआरईडीएस जैसे प्लेटफॉर्म से जोड़ने का सुझाव भी दिया गया है.
इसका सीधा मतलब यह है कि भविष्य में भारत का कोई छोटा कारोबारी ब्रिक्स देश के ग्राहक से पैसा लेने में आज की तुलना में कम परेशानी महसूस कर सकता है. बैंकिंग, पेमेंट गेटवे, फिनटेक और ट्रेड फाइनेंस कंपनियों के लिए यही बदलाव बड़ा कारोबारी मौका बन सकता है.
ब्रिक्स देशों के साथ भारत का सामानों का व्यापार वित्त वर्ष 2021 के बाद से दोगुने से ज्यादा हो चुका है. मनीकंट्रोल के अनुसार भारत का ब्रिक्स देशों को निर्यात वित्त वर्ष 2021 के 64.3 अरब डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 95.7 अरब डॉलर हो गया. लेकिन इसी दौरान आयात 138.8 अरब डॉलर से बढ़कर 321.8 अरब डॉलर पहुंच गया और व्यापार घाटा 226.1 अरब डॉलर हो गया. यही आंकड़ा इस कहानी का सबसे अहम छिपा हुआ पहलू है. सिर्फ ब्रिक्स के साथ व्यापार बढ़ना पर्याप्त नहीं है. भारत को अपना हिस्सा निर्यात में बढ़ाना होगा.
अगर बाजार तक पहुंच आसान होती है, गैर-टैरिफ बाधाएं घटती हैं और कस्टम तथा भुगतान प्रक्रिया तेज होती है तो इंजीनियरिंग सामान, फार्मास्यूटिकल्स, केमिकल्स, टेक्सटाइल, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, रिन्यूएबल एनर्जी और डिजिटल सेवाओं से जुड़े एमएसएमई को फायदा मिल सकता है. फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशंस ने भी व्यापार को निवेश, तकनीक और मजबूत सप्लाई चेन से जोड़ने पर जोर दिया है. ([Moneycontrol][1])
ब्रिक्स का दूसरा बड़ा फायदा उस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को मिल सकता है जिसे भारत पिछले कुछ सालों में तेजी से तैयार कर रहा है. जेफरीज की 9 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार भारत में करीब 20 अरब डॉलर का सेमीकंडक्टर निवेश पहले से चल रहा है और करीब 13 अरब डॉलर का अतिरिक्त प्रोत्साहन कार्यक्रम इस इकोसिस्टम को और गहरा कर सकता है. इसी रिपोर्ट के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक्स में मोबाइल कंपोनेंट्स की घरेलू वैल्यू एडिशन हिस्सेदारी छह साल में 20 फीसदी से कम से बढ़कर करीब 50 फीसदी हो सकती है.
अगर ब्रिक्स देशों से तकनीक, पूंजी और सप्लाई चेन साझेदारी बढ़ती है तो फायदा सिर्फ चिप बनाने वाली कंपनियों को नहीं होगा. कंपोनेंट निर्माता, इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली, टेस्टिंग, पैकेजिंग, इंडस्ट्रियल मशीनरी और लॉजिस्टिक्स जैसे छोटे कारोबार भी इस चेन का हिस्सा बन सकते हैं.
साफ ऊर्जा भी ब्रिक्स सहयोग का एक बड़ा कारोबारी क्षेत्र बन सकती है. भारत में सोलर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता तेजी से बढ़ रही है. जेफरीज के मुताबिक करीब 35 गीगावॉट सोलर सेल क्षमता चालू है और लगभग 100 गीगावॉट अतिरिक्त क्षमता निर्माणाधीन है.
भारत के 2026 ब्रिक्स एजेंडे में क्लीन एनर्जी सहयोग और टिकाऊ औद्योगिक विकास भी प्रमुख क्षेत्रों में शामिल हैं. आईबीईएफ के अनुसार भारत ने ब्रिक्स के तहत एमएसएमई, स्टार्टअप इनोवेशन, क्लीन एनर्जी सहयोग और तकनीक आधारित लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम को आगे बढ़ाने पर जोर दिया है. इसका असर सोलर सेल से आगे जा सकता है. बैटरी, पावर इक्विपमेंट, ग्रिड टेक्नोलॉजी, एनर्जी स्टोरेज और ग्रीन इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स में भी निवेश और साझेदारी की गुंजाइश बन सकती है.
ब्रिक्स की सबसे कम चर्चा वाली लेकिन सबसे अहम कहानी लॉजिस्टिक्स की हो सकती है. व्यापार बढ़ाने के लिए सिर्फ ऑर्डर मिलना काफी नहीं है. माल को समय पर, कम लागत में और भरोसेमंद तरीके से एक देश से दूसरे देश पहुंचाना भी जरूरी है.
भारतीय उद्योग ने मजबूत सप्लाई चेन, बेहतर कस्टम प्रक्रिया, निवेश साझेदारी और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को ब्रिक्स सहयोग की प्राथमिकताओं में शामिल करने की मांग की है. मनीकंट्रोल की रिपोर्ट में इंडस्ट्री ने ट्रेड बैरियर दूर करने के लिए कस्टम, पेपरवर्क, मानकों और रेगुलेटरी अड़चनों को हल करने वाली व्यवस्था की जरूरत बताई है. यहीं से वेयरहाउसिंग, पोर्ट सेवाएं, फ्रेट, ट्रकिंग, शिपिंग, ट्रेड डॉक्यूमेंटेशन और सप्लाई चेन टेक्नोलॉजी से जुड़े कारोबारों के लिए नया बाजार बन सकता है.
ब्रिक्स सहयोग का असर सिर्फ पारंपरिक मैन्युफैक्चरिंग पर नहीं रुकता. जेफरीज के अनुसार भारत की डेटा सेंटर क्षमता पिछले पांच वर्षों में पांच गुना बढ़कर करीब 2 गीगावॉट हो गई है और अगले पांच वर्षों में 10 गीगावॉट तक पहुंच सकती है. इससे करीब 45 अरब डॉलर के निवेश का अवसर बन सकता है. यह आंकड़ा बताता है कि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भी आने वाले समय में सीमा पार निवेश और तकनीकी साझेदारी का बड़ा क्षेत्र हो सकता है.
ब्रिक्स के फैसलों का असर अगले दिन आपके बैंक खाते या बाजार भाव में दिखे, यह जरूरी नहीं है. इसका असर धीरे-धीरे कारोबार की लागत और रोजगार के रास्ते से दिखाई दे सकता है. अगर पेमेंट आसान हुआ तो निर्यातक का समय और बैंकिंग लागत घट सकती है. अगर लॉजिस्टिक्स बेहतर हुआ तो सामान भेजने का खर्च कम हो सकता है. अगर इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर में निवेश बढ़ा तो मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े नए रोजगार बन सकते हैं. ग्रीन एनर्जी में निवेश बढ़ने पर सोलर, बैटरी और ऊर्जा उपकरणों से जुड़े कारोबारों को नए ऑर्डर मिल सकते हैं.
लेकिन एक बड़ा रिस्क भी है. ब्रिक्स व्यापार बढ़ने का मतलब अपने आप भारत का फायदा होना नहीं है. वित्त वर्ष 2026 में भारत का ब्रिक्स व्यापार घाटा 226.1 अरब डॉलर रहा है. इसलिए असली सफलता इस बात से मापी जाएगी कि भारत कितना ज्यादा निर्यात करता है, कितनी वैल्यू भारत में जुड़ती है और कितने निवेश तथा तकनीकी साझेदारी देश में आते हैं.
ब्रिक्स के असर को सिर्फ शेयर बाजार की तेजी या गिरावट से देखना शायद सबसे छोटा नजरिया होगा. असली परीक्षा इस बात की है कि क्या भारत के कारोबारियों के लिए नए बाजार खुलते हैं, पेमेंट आसान होता है, विदेशी निवेश आता है और भारतीय कंपनियां ग्लोबल सप्लाई चेन में ऊपर जाती हैं.
यही वजह है कि फिनटेक और डिजिटल पेमेंट, एमएसएमई और एक्सपोर्ट, सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स, ग्रीन एनर्जी तथा लॉजिस्टिक्स को ब्रिक्स की कारोबारी कहानी के पांच अहम सेक्टर माना जा सकता है.
खासकर एमएसएमई के लिए यह बदलाव सबसे अहम हो सकता है. क्योंकि बड़ी कंपनी के पास विदेशी बाजार में उतरने के लिए विशेषज्ञ टीम और पूंजी होती है, लेकिन छोटे कारोबारी के लिए पेमेंट, सर्टिफिकेशन, कस्टम और लॉजिस्टिक्स की एक छोटी अड़चन भी पूरा ऑर्डर रोक सकती है.
अगर ब्रिक्स सहयोग इन अड़चनों को कम करने में सफल होता है, तो असली फायदा किसी एक दिन के शेयर बाजार से ज्यादा उन कारोबारों को होगा जो भारत को अगले वैश्विक सप्लाई चेन नेटवर्क का हिस्सा बनाने में मदद करेंगे.
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