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भारत में यह शहर कमाई में नंबर-1, लेकिन खर्च में कौन? जानिए सबसे ज्यादा कर्ज किस शहर पर है!

India city wise income and spending study: देश के शहरों में कमाई और खर्च की तस्वीर एक जैसी नहीं है. बेंगलुरु औसत कमाई और सेविंग्स में आगे है, मुंबई अमीर परिवारों में नंबर वन है, चंडीगढ़ खर्च में, चेन्नई कर्ज में और दिल्ली-एनसीआर खपत बाजार में सबसे आगे है.

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भारत में यह शहर कमाई में नंबर-1, लेकिन खर्च में कौन? जानिए सबसे ज्यादा कर्ज किस शहर पर है!

कमाई में आगे, खर्च में आगे और कर्जे में नंबर-1... जानिए आपके शहर का क्या है हाल (फोटो एआई)

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Metro cities income spending-savings-deb: किस शहर में रहने पर कमाई का बड़ा हिस्सा बच सकता है और कहां ज्यादा कमाकर भी खर्च का दबाव बढ़ जाता है. देश के बड़े शहरों की कमाई, खर्च, बचत और कर्ज का पैटर्न यही कहानी बताता है.

प्राइस-टाटा की 100 सिटी स्टडी द मेनी अर्बन इंडियाज में शहरों की आर्थिक तस्वीर के कई ऐसे पहलू सामने आए हैं, जो नौकरी, बिजनेस और शहर चुनने वाले लोगों के लिए काफी मायने रखते हैं. कमाई में बेंगलुरु सबसे आगे है, अमीर परिवारों के मामले में मुंबई नंबर एक है, जबकि खपत के लिहाज से दिल्ली-एनसीआर सबसे बड़ा बाजार बनकर सामने आया है.

कमाई में बेंगलुरु सबसे आगे

औसत सालाना घरेलू कमाई के मामले में बेंगलुरु देश के शहरों में सबसे आगे है. यहां एक परिवार की औसत सालाना घरेलू कमाई 28.3 लाख रुपये है. यह कोलकाता के मुकाबले 1.7 गुना ज्यादा है.

इस लिस्ट में चंडीगढ़ दूसरे नंबर पर है. वहीं वडोदरा और दिल्ली की औसत सालाना घरेलू कमाई 25.9 लाख रुपये है.

आम नौकरीपेशा व्यक्ति के लिए इसका सीधा मतलब यह है कि शहर की औसत कमाई सिर्फ सैलरी का मामला नहीं है. रोजगार के अवसर, बिजनेस गतिविधियां और परिवार की कुल आय मिलकर शहर की आर्थिक ताकत तय करते हैं.

मुंबई में अमीर परिवारों की संख्या सबसे ज्यादा

अगर सवाल यह हो कि सबसे ज्यादा अमीर परिवार कहां रहते हैं, तो तस्वीर बदल जाती है. मुंबई इस मामले में सबसे आगे है. मुंबई में 26.1 फीसदी परिवारों की सालाना कमाई 36 लाख रुपये या उससे अधिक है. दिल्ली में यह आंकड़ा 22.4 फीसदी है. इसके बाद चेन्नई 12.6 फीसदी, कोलकाता 10.4 फीसदी, हैदराबाद 8.8 फीसदी और बेंगलुरु 8 फीसदी पर है.

मिडिल इनकम परिवारों के मामले में हैदराबाद सबसे आगे है. यहां 68.1 फीसदी परिवारों की सालाना कमाई 6 से 36 लाख रुपये के बीच है. वहीं 1.5 से 6 लाख रुपये सालाना कमाने वाले परिवारों का सबसे बड़ा हिस्सा कोलकाता में है, जहां यह आंकड़ा 35.2 फीसदी है.

यानी हर शहर की पहचान सिर्फ इस बात से नहीं होती कि वहां औसत कमाई कितनी है. किसी शहर की असली तस्वीर यह देखकर समझ आती है कि वहां किस आय वर्ग के कितने परिवार रहते हैं.

चंडीगढ़ में कमाई के मुकाबले खर्च का दबाव ज्यादा महसूस हो सकता है

सबसे ज्यादा सालाना घरेलू खर्च की बात करें तो यहां कमाई की तस्वीर से बिल्कुल अलग नतीजा सामने आता है. प्रति परिवार सालाना खर्च के मामले में चंडीगढ़ पहले नंबर पर है. यहां एक परिवार औसतन 19.2 लाख रुपये सालाना खर्च करता है.

इसके बाद तिरुवनंतपुरम, वडोदरा, तिरुपुर, सूरत, बेंगलुरु, पुणे, दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई और कोलकाता का नंबर आता है.

चंडीगढ़ के खर्च में खाने-पीने की हिस्सेदारी 29.9 फीसदी है. हाउसिंग पर 23.3 फीसदी, ट्रांसपोर्टेशन पर 22.2 फीसदी, एजुकेशन पर 7 फीसदी, फैशन पर 5.7 फीसदी और हेल्थकेयर पर 5.2 फीसदी खर्च होता है.

यह आंकड़ा आम परिवार के लिए एक अहम संकेत देता है. शहर में रहने की लागत समझते समय केवल किराया या घर की कीमत देखना काफी नहीं है. खाना, आने-जाने का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और हेल्थकेयर मिलकर घरेलू बजट पर बड़ा असर डालते हैं.

बेंगलुरु कमाता भी ज्यादा है और बचाता भी ज्यादा

कमाई के साथ बचत को जोड़कर देखें तो बेंगलुरु की तस्वीर और मजबूत दिखाई देती है. देश के छह बड़े शहरों में परिवार अपनी आय का औसतन 42 फीसदी हिस्सा बचाते हैं, जबकि पूरे देश में यह आंकड़ा 25 फीसदी है.

बेंगलुरु में परिवार अपनी आय का 45.9 फीसदी हिस्सा सेव करते हैं. इसके बाद दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद और चेन्नई का नंबर आता है.

इसका मतलब यह नहीं है कि हर बेंगलुरु निवासी अपनी आय का इतना ही हिस्सा बचाता है. यह स्टडी में बताए गए परिवारों के औसत पैटर्न का आंकड़ा है. लेकिन इससे यह जरूर पता चलता है कि ज्यादा कमाई वाला शहर अगर बेहतर सेविंग पैटर्न भी बनाए रखे, तो वहां परिवारों की फाइनेंशियल स्थिति मजबूत हो सकती है.

चेन्नई में कर्ज का दबाव सबसे ज्यादा

उधारी के मामले में चेन्नई सबसे आगे है. यहां डेट टू इनकम रेश्यो 27.7 फीसदी है. यानी परिवारों की आय की तुलना में कर्ज का बोझ अन्य बड़े शहरों के मुकाबले ज्यादा है. छह बड़े शहरों का औसत डेट टू इनकम रेश्यो 18.5 फीसदी है. इस मामले में कोलकाता दूसरे और मुंबई तीसरे नंबर पर है.

दिल्ली का रेश्यो 18 फीसदी, बेंगलुरु का 15.7 फीसदी और हैदराबाद का 14 फीसदी है. यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़ी कमाई का मतलब हमेशा कम कर्ज नहीं होता. घर खरीदने, कारोबार बढ़ाने, एजुकेशन या दूसरी बड़ी जरूरतों के लिए लिया गया कर्ज परिवार के मासिक बजट को लंबे समय तक प्रभावित कर सकता है.

दिल्ली-एनसीआर बना देश का सबसे बड़ा खपत बाजार

अगर सवाल कमाई या बचत का नहीं, बल्कि यह हो कि लोग सबसे ज्यादा पैसा कहां खर्च कर रहे हैं, तो दिल्ली-एनसीआर सबसे आगे निकल जाता है. दिल्ली-एनसीआर में करीब 75 लाख परिवार हैं. ये परिवार सालाना औसतन करीब 15 लाख रुपये खर्च करते हैं. इससे इस क्षेत्र का कुल मार्केट साइज करीब 11.2 लाख करोड़ रुपये पहुंचता है.

खास बात यह है कि दिल्ली-एनसीआर का मार्केट साइज मुंबई और बेंगलुरु के कंबाइंड मार्केट के बराबर है. यही वजह है कि कंपनियों के लिए दिल्ली-एनसीआर सिर्फ एक बड़ा शहर नहीं, बल्कि बहुत बड़ा कंज्यूमर मार्केट है. रिटेल, फूड, एजुकेशन, हेल्थकेयर, ट्रांसपोर्टेशन, फैशन और दूसरी कंज्यूमर कैटेगरी के बिजनेस के लिए यहां बड़ी डिमांड मौजूद है.

कमाई और खर्च के बीच छिपी है शहरों की असली कहानी

इस स्टडी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि हर आर्थिक पैमाने पर एक ही शहर नंबर वन नहीं है. बेंगलुरु औसत कमाई और सेविंग्स में आगे है, मुंबई अमीर परिवारों में सबसे आगे है, चंडीगढ़ प्रति परिवार खर्च में नंबर वन है, चेन्नई कर्ज के मामले में आगे है और दिल्ली-एनसीआर कुल खपत बाजार में सबसे बड़ा है.

आम लोगों के लिए इसका सीधा सबक यह है कि नौकरी या बिजनेस के लिए शहर चुनते समय केवल सैलरी पैकेज देखना सही तरीका नहीं है. असली तस्वीर कमाई, रहने का खर्च, बचत की क्षमता और कर्ज के बोझ को एक साथ देखने पर सामने आती है. एक ही कमाई पर अलग शहर में रहने वाले दो परिवारों की आर्थिक स्थिति इसलिए बिल्कुल अलग हो सकती है. यही इस स्टडी का सबसे उपयोगी और छिपा हुआ एंगल है.

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