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Sona-Chandi Bhav Over Next 2 Years: सोना और चांदी अगले दो साल सिर्फ युद्ध और महंगाई से नहीं चलेंगे. ब्याज दर, डॉलर, केंद्रीय बैंक, रुपये की चाल, चांदी की औद्योगिक मांग और वैश्विक जोखिम इनके भाव बदल सकते हैं. निवेशकों के लिए चरणबद्ध खरीद और इन छह संकेतों पर नजर अहम होगी.
Bullish trend in bullion market in August; why setback in September? अगस्त 2026 की शुरुआत में 24 कैरेट सोने का भाव करीब 1,44,370 रुपये प्रति 10 ग्राम था. 14 अगस्त तक यह करीब 1,55,020 रुपये तक पहुंच गया था. उसी समय चांदी 2,54,900 से 2,55,000 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास थी. यानी अगस्त में कुछ ही दिनों में सोने ने करीब 10,650 रुपये की छलांग लगाई थी. लेकिन सितंबर आते ही तस्वीर फिर बदल गई. 4 सितंबर को एमसीएक्स सोना 1,55,010 रुपये और चांदी 2,40,858 रुपये के आसपास आ गई. यह अंतर बताता है कि बुलियन में तेजी सीधी रेखा में नहीं चलती. ऊंची कीमत के बाद मुनाफावसूली, डॉलर में बदलाव और अमेरिकी ब्याज दर की उम्मीद कुछ ही घंटों में बाजार की दिशा बदल सकती है.
सामान्य निवेशक के लिए इसका मतलब साफ है. आज महंगा दिख रहा सोना कल और महंगा हो सकता है, लेकिन इसका उल्टा भी उतनी ही तेजी से हो सकता है. इसलिए एक ही दिन में पूरी रकम लगाने के बजाय किस्तों में निवेश करना ज्यादा व्यावहारिक रणनीति हो सकती है.
सोने और चांदी पर नजर रखने वाले निवेशकों के लिए अमेरिका की ब्याज दर अगले दो साल का सबसे अहम संकेत हो सकती है. वजह यह है कि सोना ब्याज नहीं देता. जब अमेरिकी ब्याज दर और बॉन्ड यील्ड ऊंची होती है तो निवेशकों के लिए ब्याज देने वाली परिसंपत्तियां ज्यादा आकर्षक हो सकती हैं. वहीं दरों में नरमी की उम्मीद बनने पर सोने पर दबाव कम हो सकता है.
अभी बाजार अमेरिकी रोजगार आंकड़ों पर खास नजर रख रहा है. 4 सितंबर को बाजार में अमेरिकी दर बढ़ने की करीब 62 प्रतिशत संभावना आंकी जा रही थी. यही उम्मीद सोने और चांदी में तत्काल उतार-चढ़ाव पैदा कर रही थी.
रॉयटर्स की 4 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक हाजिर सोना करीब 4,474.78 डॉलर प्रति औंस पर था और सिटी ने अगले 0 से 3 महीने में 4,800 डॉलर तथा 6 से 12 महीने में 5,000 डॉलर तक पहुंचने का अनुमान दिया है. यह अनुमान है, गारंटी नहीं. निवेशक के लिए सबक यह है कि सिर्फ फेड का फैसला न देखें. अमेरिकी महंगाई, रोजगार, बॉन्ड यील्ड और डॉलर को एक साथ पढ़ना होगा.
अगले दो साल के लिए सोने की सबसे दिलचस्प कहानी शायद युद्ध से भी ज्यादा केंद्रीय बैंकों की खरीद है. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के जून 2026 के सर्वे में 89 प्रतिशत रिजर्व मैनेजरों ने कहा कि अगले 12 महीनों में वैश्विक केंद्रीय बैंकों के सोने के भंडार बढ़ने की उम्मीद है. वहीं 45 प्रतिशत ने अपने संस्थान की सोने की होल्डिंग बढ़ाने की उम्मीद जताई.
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के जुलाई आंकड़ों के अनुसार 2026 की दूसरी तिमाही में केंद्रीय बैंकों की शुद्ध सोना खरीद 288.9 टन रही, जबकि पहली तिमाही का संशोधित आंकड़ा 57 टन था. यानी दूसरी तिमाही में खरीदारी में तेज वापसी देखने को मिली. यही वह बदलाव है जिसे आम निवेशक अक्सर नजरअंदाज कर देता है. अगर केंद्रीय बैंक अपने विदेशी भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ाते रहते हैं तो कीमतों को लंबी अवधि में एक अलग तरह का आधार मिल सकता है. इसका मतलब यह नहीं कि सोना हर महीने बढ़ेगा, बल्कि बड़ी गिरावट पर मांग लौटने की संभावना बनी रह सकती है.
तीसरा संकेत डॉलर और रुपया, क्योंकि भारतीय निवेशक के लिए असली कीमत यहीं बदलती है. भारत में सोने की कीमत सिर्फ अंतरराष्ट्रीय सोने के भाव से तय नहीं होती. डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल भी बड़ा असर डालती है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना स्थिर हो, लेकिन रुपया कमजोर हो जाए तो भारत में सोना महंगा हो सकता है.
4 सितंबर को रॉयटर्स के मुताबिक रुपये पर कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का दबाव था और भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपये को सहारा देने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया. रुपया करीब 94.46 प्रति डॉलर पर खुला. इसका मतलब भारतीय निवेशक के लिए एक बेहद उपयोगी बात है. अमेरिका में सोने की कीमत देखकर ही भारत में अगले दिन का भाव तय करने की कोशिश न करें. डॉलर और रुपये का अंतर भी देखें.
भू-राजनीतिक तनाव सोने के लिए सुरक्षित निवेश की मांग बढ़ा सकता है, लेकिन कहानी यहां थोड़ी उलटी भी हो सकती है. अगर युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमत तेजी से बढ़ती है और इससे महंगाई बढ़ती है, तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में नरमी टाल सकते हैं. उस स्थिति में सोने पर दबाव भी आ सकता है.
जुलाई 2026 में रॉयटर्स ने इसी तरह का उदाहरण दिया था. मध्य पूर्व तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से महंगाई की चिंता बढ़ी और अमेरिकी ब्याज दर बढ़ने की उम्मीद मजबूत हुई, जिसका सोने पर दबाव पड़ा. इसलिए अगले दो साल में निवेशक को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि युद्ध बढ़ा या घटा. असली सवाल होगा कि उस घटना से तेल, महंगाई, डॉलर और ब्याज दर पर क्या असर पड़ा.
चांदी को सिर्फ सस्ता सोना समझना सबसे बड़ी गलती हो सकती है. इसमें निवेश मांग के साथ औद्योगिक मांग भी होती है. सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरी औद्योगिक गतिविधियों की मांग चांदी की खपत को प्रभावित करती है.
सिल्वर इंस्टीट्यूट के 2026 अनुमान के मुताबिक वैश्विक चांदी बाजार लगातार छठे साल घाटे में रहने की उम्मीद है. हालांकि औद्योगिक निर्माण की मांग 2026 में 2 प्रतिशत घटकर करीब 650 मिलियन औंस रहने का अनुमान है. संस्था ने सोलर क्षेत्र में चांदी की कम मात्रा इस्तेमाल करने और कुछ जगह उसके विकल्प अपनाए जाने को इसके पीछे की वजह बताया है.
यहीं अगले दो साल का सबसे दिलचस्प जोखिम छिपा है. एक तरफ चांदी की सप्लाई कम पड़ने की समस्या कीमत को सहारा दे सकती है, दूसरी तरफ तकनीक में चांदी की कम खपत मांग को सीमित कर सकती है. इसलिए चांदी में तेजी की संभावना के साथ सोने की तुलना में ज्यादा उतार-चढ़ाव का जोखिम भी रहेगा.
कमोडिटी विशेषज्ञ देवकृष्ण पांडेय के उपलब्ध बाजार आकलन में एमसीएक्स सोने के लिए 1.53 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम का स्तर महत्वपूर्ण सपोर्ट बताया गया था. इसके टूटने पर करीब 1.49 लाख रुपये का अगला सपोर्ट बताया गया. दूसरी तरफ 1.55 लाख रुपये के ऊपर मजबूती से टिकने पर 1.60 लाख रुपये का स्तर अगला बड़ा लक्ष्य बताया गया था.
चांदी के लिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बाजार में 64 डॉलर प्रति औंस को महत्वपूर्ण सपोर्ट और 66 डॉलर के ऊपर टिकने को तेजी के लिए सकारात्मक संकेत माना था. इन स्तरों को दो साल की गारंटी या निश्चित लक्ष्य नहीं माना जा सकता. इनका महत्व यह समझने में है कि बाजार में तेजी के बीच भी कौन-से स्तर निवेशक की धारणा बदल सकते हैं.
बुलियन बाजार में किसी एक तारीख को अगली बड़ी तेजी का दिन बताना मुश्किल है. लेकिन छह संकेत एक ही दिशा में आने लगें तो तेजी का माहौल मजबूत हो सकता है.
अगर अमेरिकी ब्याज दरों में नरमी की उम्मीद बढ़े, डॉलर कमजोर हो, बॉन्ड यील्ड नीचे आए, केंद्रीय बैंक सोना खरीदते रहें, वैश्विक जोखिम बना रहे और रुपये में कमजोरी हो तो भारतीय सोने को एक साथ कई तरफ से सपोर्ट मिल सकता है.
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल का जुलाई 2026 का आकलन भी बताता है कि 2026 के बाकी हिस्से में निवेश मांग सोने की मांग की प्रमुख वृद्धि का स्रोत बन सकती है. केंद्रीय बैंक महत्वपूर्ण खरीदार बने रहने की उम्मीद है, जबकि ऊंची कीमतों के कारण आभूषण मांग पर दबाव रह सकता है.
यानी अगले दो साल में सोने की कहानी सिर्फ शादी और आभूषण की मांग की कहानी नहीं रह गई है. निवेश मांग और केंद्रीय बैंकों की खरीद ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
मौजूदा बाजार में सबसे बड़ा सवाल यही है. 1.55 लाख रुपये के आसपास सोना देखकर कई छोटे निवेशक सोच सकते हैं कि अब कीमत बहुत ऊपर निकल चुकी है. दूसरी तरफ तेजी छूट जाने का डर भी बना रहता है.
ऐसे माहौल में उपलब्ध बाजार आकलन चरणबद्ध निवेश की तरफ इशारा करता है. देवकृष्ण पांडेय के अगस्त के आकलन में भी एकमुश्त निवेश के बजाय चरणबद्ध खरीदारी की रणनीति को प्राथमिकता दी गई थी. व्यावहारिक तौर पर इसका मतलब है कि पूरी रकम एक ही भाव पर लगाने के बजाय अलग-अलग स्तरों पर खरीद की जाए. खासकर तब, जब निवेश का समय दो साल या उससे ज्यादा हो.
लेकिन एक बात याद रखना जरूरी है. सोने और चांदी की कीमतें ऊंची होने का मतलब यह नहीं कि हर गिरावट खरीदारी का मौका ही होगी. निवेशक को अपनी अवधि, जोखिम और पहले से मौजूद सोने-चांदी की हिस्सेदारी देखकर फैसला करना चाहिए.
अगले 24 महीने में बुलियन बाजार का सबसे बड़ा बदलाव यह हो सकता है कि सोने और चांदी को एक ही नजर से देखना काम नहीं करेगा. सोना केंद्रीय बैंकों, डॉलर, ब्याज दर और वैश्विक जोखिम से ज्यादा प्रभावित होगा, जबकि चांदी में औद्योगिक मांग और सप्लाई का खेल भी उतना ही महत्वपूर्ण रहेगा.
इसलिए अगली बार सोना 2,000 रुपये बढ़े या चांदी 5,000 रुपये गिरे तो सिर्फ कीमत देखकर फैसला लेने के बजाय छह सवाल पूछिए. फेड क्या कर रहा है, डॉलर किस तरफ जा रहा है, बॉन्ड यील्ड क्या कह रही है, केंद्रीय बैंक कितना सोना खरीद रहे हैं, रुपये की स्थिति क्या है और चांदी की औद्योगिक मांग कैसी है.
यही छह संकेत अगले दो साल में यह समझने में मदद कर सकते हैं कि बाजार की तेज चाल सिर्फ एक उछाल है या किसी बड़ी बुलियन तेजी की शुरुआत.
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