बिजनेस
What is kitchen inflation fund: मानसून की अनिश्चितता के कारण दाल और सब्जियों की बढ़ती कीमतों ने रसोई का बजट बिगाड़ दिया है. अब इस महंगाई से निपटने के लिए बैंक एफडी के बजाय एक नया कमोडिटी-लिंक्ड 'किचन इन्फ्लेशन फंड' मॉडल गृहणियों की मदद करेगा.
क्या सब्जी मंडी जाने पर आपकी जेब भी खाली हो रही है? पिछले कुछ महीनों में जिस तरह टमाटर, प्याज और दालों की कीमतों में आग लगी है, उसने हर घर के बजट को पूरी तरह हिलाकर रख दिया है. मानसून की बेरुखी और मंहगाई की दोहरी मार ने मध्यमवर्गीय परिवारों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर इस लगातार बढ़ती महंगाई से कैसे निपटा जाए. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस सब्जी के दाम बढ़ने से आपकी जेब ढीली होती है, उसी सब्जी के दाम बढ़ने पर आपको मुनाफा भी हो सकता है?
चार्टर्ड अकाउंटेंट्स (CA) और वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, पारंपरिक बचत के तरीके जैसे बैंक एफडी (FD) अब खाद्य महंगाई को मात देने में नाकाफी साबित हो रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि आम परिवारों को अब 'इंफ्लेशन हेजिंग' (Inflation Hedging) को समझना होगा. अगर कोई परिवार अपनी मासिक बचत का सिर्फ 10% से 15% हिस्सा एग्री-कमोडिटी फंड या ईटीएफ (ETF) में लगाता है, तो यह रसोई के बजट के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम कर सकता है. जब खाद्य वस्तुओं के दाम 20% से 40% तक बढ़ते हैं, तो कमोडिटी मार्केट से मिलने वाला रिटर्न इस बढ़े हुए खर्च की भरपाई कर देता है.
एंजेल वन (Angel One) की कमोडिटी मार्केट रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार मानसून की अनिश्चितता और अल नीनो (El Nino) के प्रभाव के चलते दालों, प्याज और टमाटर जैसी जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों में ऐतिहासिक रूप से 20% से लेकर 40% तक की उछाल देखी गई है. इसी ट्रेंड को देखते हुए गृहणियों के लिए बैंक एफडी (जो आमतौर पर 6.5% से 7.5% का रिटर्न देती है) की तुलना में एग्री-कमोडिटी आधारित फंड को महंगाई से मुकाबला करने का बेहतर वित्तीय जरिया माना गया है.
मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) और भारतीय म्यूचुअल फंड संस्थाओं (AMFI) के एग्री-इंडेक्स डेटा बताते हैं कि भारत में उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (CFPI) लगातार बढ़ रहा है. वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कोई परिवार अपनी मासिक बचत का केवल 10% से 15% हिस्सा एग्री-कमोडिटी फंड या ईटीएफ (ETF) में निवेश करता है, तो यह निवेश खाद्य सामग्री की कीमतें बढ़ने पर सीधे तौर पर सुरक्षा कवच (हेजिंग टूल) की तरह काम करता है और बढ़े हुए किचन खर्च की भरपाई करने में मदद करता है.
मौसम में लगातार हो रहे बदलाव और एल नीनो के असर के कारण समय पर बारिश न होना अब एक आम बात हो गई है. जब भी देश में सूखे जैसे हालात बनते हैं, तो खेतों में खड़ी फसलें बर्बाद हो जाती हैं. सप्लाई कम होने की वजह से बाजार में सबजियां और अनाज बेहद महंगे हो जाते हैं. आम लोग अक्सर गूगल पर "खाने-पीने की चीज़ों की कीमतों पर मॉनसून का असर" खोजते हैं ताकि समझ सकें कि दाल-रोटी के दाम कब कम होंगे. जब हालात ज्यादा बिगड़ते हैं, तो लोग अपनी जरूरतों के लिए "बारिश की कमी के दौरान गोल्ड लोन" जैसे विकल्प भी तलाशने लगते हैं. असल में मानसून की इस अनिश्चतता का सीधा असर हमारे किचन पर पड़ता है और हमारी जमा-पूंजी धीरे-धीरे खत्म होने लगती है.
इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए फाइनेंशियल मार्केट में एक बेहद अनोखा और नया सोल्यूशन सामने आ रहा है, जिसे 'किचन इन्फ्लेशन फंड' या रसोई मुद्रास्फीति कोष कहा जा रहा है. आमतौर पर हम अपने बच्चों की पढ़ाई, शादी या फिर रिटायरमेंट के लिए बचत करते हैं. लेकिन यह नया मॉडल पूरी तरह से कमोडिटी-लिंक्ड शॉर्ट टर्म फंड पर आधारित है. इसका सीधा मतलब यह है कि आप अपने पैसों का एक छोटा हिस्सा उन कृषि उत्पादों में निवेश करते हैं जो रोजमर्रा के जीवन में काम आते हैं. जब बाहर बाजार में दाल या सब्जियां महंगी होती हैं, तो आपके इस फंड का रिटर्न भी तेजी से बढ़ता है. यानी बाहर महंगाई बढ़ेगी तो आपके निवेश का मुनाफा भी बढ़ेगा, जो आपके बढ़े हुए रसोई खर्च की आसानी से भरपाई कर देगा.
मध्यमवर्ग आज भी अपनी बचत के लिए बैंक की पारंपरिक फिक्स्ड डिपॉजिट यानी एफडी पर सबसे ज्यादा भरोसा करता है. लेकिन कड़वा सच यह है कि एफडी पर मिलने वाला ब्याज मंहगाई दर को मात देने में पूरी तरह नाकाम साबित होता है. अगर एफडी पर आपको सात फीसदी ब्याज मिल रहा है और खाने-पीने की चीजें दस फीसदी महंगी हो रही हैं, तो असल में आपके पैसे की वैल्यू कम हो रही है. किचन इन्फ्लेशन फंड इस मामले में सबसे बड़ी सुरक्शा देता है क्योंकि इसका सीधा संबंध कृषि उत्पादों की कीमतों से होता है. यह पारंपारीक निवेश से अलग हटकर सीधे महंगाई की रफ्तार के साथ आगे बढ़ता है, जिससे आपका पैसा सुरक्षित रहता है.
इस नए बचत मॉडल का सबसे बड़ा व्यावहारिक असर हमारे घर की महिलाओं और बजट संभालने वालों पर पड़ेगा. अभी तक महंगाई बढ़ने पर सिर्फ कटौती करना ही एकमात्र रास्ता बचता था. लेकिन इस कमोडिटी-लिंक्ड सेविंग प्लान की मदद से अब गृहणियां अपने किचन के बजट को खुद मैनेज कर सकेंगी. जब भी मानसून बिगड़ेगा और दाल-सब्जियों की कीमतें आसमान छूने लगेंगी, तब इस फंड से मिलने वाला रिटर्न उनके बैंक खाते में सीधे क्रेडिट होगा. इससे घर की आर्थिक स्थिति संतुलित रहेगी और त्योहारों या शादियों के सीजन में महंगाई का रोना नहीं रोना पड़ेगा. यह कदम भारतीय परिवारों को महंगाई के चक्रव्यूह से निकालने का एक बेहतरीन जरिया बन सकता है.
डिस्क्लेमर कमोडिटी मार्केट या किसी भी वित्तीय फंड में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है. किसी भी योजना में निवेश करने से पहले अपने वित्तीय सलाहकार या सीए से परामर्श जरूर लें.
अपनी राय और अपने इलाके की खबर देने के लिए जुड़ें हमारे गूगल, फेसबुक, x, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सऐप कम्युनिटी से.