बिजनेस
UPSC failure success story: ऑक्सफोर्ड से एमबीए कर चुके आदित्य चोपड़ा ने 8 डिजिट की सालाना सैलरी और रग्स बिजनेस छोड़कर प्लास्टिक फ्री बेबी प्रोडक्ट ब्रांड nübo शुरू किया. 20,000 से ज्यादा ऑर्डर और 700 से अधिक शहरों की पहुंच के बाद अब कंपनी 200 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखती है.
Premium baby products startup: कभी 8 डिजिट की सालाना सैलरी वाली नौकरी, फिर अपना रग्स बिजनेस और उसके बाद ऐसा फैसला जिसने पूरा करियर बदल दिया. चलिए जानें दिल्ली में जन्मे आदित्य चोपड़ा ने आखिर क्यों आरामदायक कमाई छोड़कर बेबी प्रोडक्ट्स का कारोबार शुरू किया. जुलाई 2025 में शुरू हुआ उनका ब्रांड nübo आज 20,000 से ज्यादा ऑर्डर प्रोसेस कर चुका है और 700 से ज्यादा शहरों तक पहुंच चुका है. अब कंपनी अगले चार साल में 200 करोड़ रुपये की रेवेन्यू कंपनी बनने का लक्ष्य लेकर चल रही है. यह कहानी सिर्फ एक स्टार्टअप की नहीं, बल्कि इस सवाल की भी है कि क्या भारतीय पैरेंट्स सस्ते प्रोडक्ट के बजाय बच्चों की सेफ्टी के लिए ज्यादा पैसे खर्च करने को तैयार हैं.
आदित्य चोपड़ा का सफर सीधे स्टार्टअप से शुरू नहीं हुआ था. दिल्ली में जन्मे और पले-बढ़े आदित्य ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. इसके बाद उन्होंने करीब तीन साल यूपीएससी सिविल सर्विसेज परीक्षा की तैयारी की और तीनों बार इंटरव्यू राउंड तक पहुंचे, लेकिन फाइनल सेलेक्शन लिस्ट में जगह नहीं बना पाए.
स्टार्टअपपेडिया के मुताबिक हर साल करीब 11 लाख उम्मीदवार यूपीएससी की परीक्षा में बैठते हैं, जबकि लगभग 1,000 फाइनल वैकेंसी होती हैं. इसके बाद आदित्य ने कॉर्पोरेट वर्ल्ड का रुख किया.
उन्होंने इक्विटी रिसर्च फर्म Trefis में काम किया, जो Goldman Sachs और Bernstein जैसे एंटरप्राइज क्लाइंट्स को सर्विस देती है. करीब चार साल बाद वह Samagra में चले गए, जो शिक्षा, हेल्थकेयर और चाइल्ड डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों में स्टेट और सेंट्रल गवर्नमेंट के साथ काम करने वाली पब्लिक पॉलिसी और इम्पैक्ट कंसल्टिंग फर्म है.
Samagra में करीब आठ साल के दौरान वह Associate से Vice President तक पहुंचे. कंपनी छोड़ने के समय उनकी सालाना कमाई 8 डिजिट से ज्यादा थी. यानी जिस मुकाम तक पहुंचने के लिए बहुत से लोग सालों मेहनत करते हैं, आदित्य ने वही कमाई छोड़कर दोबारा जीरो से शुरुआत करने का फैसला लिया.
उद्यमिता का पहला प्रयोग भी आदित्य ने प्लास्टिक से दूरी बनाने की सोच के साथ किया था. उन्होंने जूट और कॉटन जैसे नैचुरल फाइबर से रग्स बनाने और उन्हें अमेरिका एक्सपोर्ट करने का बिजनेस शुरू किया.
बिजनेस ने शुरुआती दौर में अच्छा रिस्पॉन्स दिया. महज चार से पांच महीने में इसकी मंथली सेल्स 10,000 डॉलर यानी करीब 8.5 लाख रुपये तक पहुंच गईं. लेकिन आदित्य को लगने लगा कि वह जिस समस्या को हल करना चाहते हैं, उसके मुकाबले इसका असर सीमित है.
इसी दौरान ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एलुमनाई नेटवर्क के जरिए उनकी मुलाकात माइक्रोप्लास्टिक रिसर्चर प्रोफेसर Fay Couceiro से हुई. इसी बातचीत ने उन्हें बेबी प्रोडक्ट्स की तरफ मोड़ दिया.
स्टार्टअपपेडिया के अनुसार कुछ स्टडीज में शिशुओं के स्टूल में वयस्कों की तुलना में 10 गुना ज्यादा PET माइक्रोप्लास्टिक पाए जाने की बात सामने आई है. रिपोर्ट यह भी बताती है कि बच्चे बोतल, खिलौने, फूड कंटेनर और घरेलू धूल जैसी चीजों के जरिए प्लास्टिक के संपर्क में आते हैं. माइक्रोप्लास्टिक और हेल्थ या न्यूरो-डेवलपमेंट से जुड़े संभावित प्रभावों को लेकर अभी रिसर्च जारी है, इसलिए इसे सीधा कारण मानना सही नहीं होगा. यहीं से आदित्य को लगा कि बेबी केयर कैटेगरी में सेफ्टी और डेवलपमेंट को लेकर बड़ा गैप मौजूद है.
मार्च-अप्रैल 2025 के आसपास आदित्य ने रग्स बिजनेस रोक दिया और nübo पर काम शुरू कर दिया. जुलाई 2025 में कंपनी ने सिर्फ दो सिलिकॉन टीथिंग प्रोडक्ट्स के साथ शुरुआत की. आज nübo के पोर्टफोलियो में Ele Ring Silicone Teether, Kiko No-Drop Wrist Teether, Orbi Ball Sensory Teether, Montessori से प्रेरित न्यूबॉर्न लर्निंग किट्स, हाई-कॉन्ट्रास्ट क्लॉथ बुक्स और डेवलपमेंटल फ्लैशकार्ड्स जैसे प्रोडक्ट शामिल हैं.
स्टार्टअपपेडिया के अनुसार कंपनी के पास फिलहाल 15 SKUs हैं और इस साल के अंत तक इसे 30 SKUs तक ले जाने का टारगेट है. प्रोडक्ट्स की कीमत करीब 300 रुपये से 1,000 रुपये के बीच है. शुरुआती टीथर्स की कीमत 449 से 599 रुपये रखी गई थी.
इन प्रोडक्ट्स में मुख्य तौर पर फूड-ग्रेड सिलिकॉन, कॉटन और पेपर का इस्तेमाल किया जाता है. कंपनी के मुताबिक उसके सिलिकॉन टीथर्स BPA, PVC, फ्थैलेट्स और हेवी मेटल्स से मुक्त होने के लिए BIS IS 9873 स्टैंडर्ड के तहत टेस्ट किए जाते हैं और ISI सर्टिफिकेशन मार्क हासिल करते हैं.
बेबी प्रोडक्ट्स के बाजार में सस्ता और रंग-बिरंगा प्रोडक्ट बेचकर ग्राहकों को आकर्षित करना आम रणनीति है. आदित्य ने इसका उल्टा रास्ता चुना.
स्टार्टअपपेडिया के मुताबिक उनके अनुसार भारत में बिकने वाले करीब 90 फीसदी टीथर्स प्लास्टिक के हैं. इसी वजह से उन्होंने कीमत कम रखने के बजाय सेफ्टी टेस्टिंग और प्रोडक्ट क्वालिटी पर ज्यादा जोर दिया.
कंपनी के मुताबिक मैन्युफैक्चरिंग गुजरात और दिल्ली एनसीआर में कई पार्टनर्स के जरिए होती है. प्रोडक्ट्स के लिए nübo अपने प्रोपराइटरी मोल्ड्स और डिजाइन इस्तेमाल करता है, जबकि पैकेजिंग, क्वालिटी चेक और डिस्पैच फरीदाबाद की अपनी फैसिलिटी से संभाला जाता है.
इसका सीधा असर ग्राहक की जेब पर भी पड़ता है. लेकिन यही इस बिजनेस मॉडल का दिलचस्प हिस्सा है. कंपनी सस्ता बेबी प्रोडक्ट बेचने की जगह ऐसे पैरेंट्स को टारगेट कर रही है जो सेफ्टी और क्वालिटी के लिए प्रीमियम देने को तैयार हैं.
शुरुआत में आदित्य को उम्मीद थी कि nübo की सबसे ज्यादा बिक्री बड़े मेट्रो शहरों से आएगी. लेकिन बिक्री के आंकड़ों ने तस्वीर बदल दी. स्टार्टअपपेडिया के अनुसार किसी एक शहर से कंपनी की रेवेन्यू हिस्सेदारी 8 से 9 फीसदी से ज्यादा नहीं है. दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई मिलकर करीब 35 से 40 फीसदी बिक्री देते हैं, जबकि बाकी 60 से 65 फीसदी बिक्री 700 से ज्यादा शहरों से आती है.
इन शहरों में भोपाल, इंदौर, जबलपुर, रायपुर, कोहिमा, कोयंबटूर, आगरा और जयपुर जैसे बाजार शामिल हैं. कंपनी ने पिछले 12 महीनों में 500 से ज्यादा ग्राहकों से बातचीत और बिक्री डेटा का विश्लेषण भी किया है. यही इस बिजनेस का सबसे अहम छिपा हुआ एंगल है. प्रीमियम बेबी प्रोडक्ट्स की मांग सिर्फ महानगरों तक सीमित नहीं है. छोटे शहरों में भी पैरेंट्स भरोसेमंद और सेफ प्रोडक्ट के लिए ज्यादा कीमत देने को तैयार दिख रहे हैं.
जुलाई 2025 में दो प्रोडक्ट से शुरू हुई nübo अब 20,000 से ज्यादा ऑर्डर प्रोसेस कर चुकी है. कंपनी के मुताबिक करीब 30 से 40 फीसदी बिक्री बिना पेड एक्विजिशन के आती है. पैरेंट ग्रुप्स, वर्ड ऑफ माउथ और मार्केटप्लेस इसके प्रमुख सोर्स हैं. मंथली रेवेन्यू करीब 25 फीसदी महीने-दर-महीने की दर से बढ़ रहा है. कंपनी Amazon, Flipkart, Blinkit और Ozi के अलावा अपनी वेबसाइट के जरिए भी प्रोडक्ट बेचती है.
कंपनी का दावा है कि सेफ बेबी टीथर्स से जुड़ी सर्च में उसे Google, Perplexity, Claude और ChatGPT पर भी प्रमुख विजिबिलिटी मिल रही है. यह डिजिटल ब्रांड के लिए खास मायने रखता है क्योंकि पैरेंट्स किसी भी बेबी प्रोडक्ट को खरीदने से पहले ऑनलाइन रिसर्च करने की आदत रखते हैं.
nübo को खड़ा करने के लिए आदित्य ने अपने दोस्तों और पूर्व सहकर्मियों से पैसा जुटाया और खुद भी पूंजी लगाई. शुरुआती रकम का बड़ा हिस्सा प्रोडक्ट डिजाइन, सेफ्टी टेस्टिंग और इन्वेंट्री में गया.
कंपनी फिलहाल EBITDA-पॉजिटिव लेवल के करीब होने का दावा करती है और अब स्केल बढ़ाने के लिए फंडिंग जुटाना चाहती है. आदित्य के मुताबिक अगली फंडिंग का इस्तेमाल सर्वाइवल के बजाय स्केल के लिए किया जाएगा.
दो लोगों की शुरुआती टीम अब करीब आठ कर्मचारियों तक पहुंच चुकी है. कंपनी अगले छह से सात महीनों में कम से कम 15 नए प्रोडक्ट लॉन्च करने की योजना बना रही है. कलर और साइज वेरिएंट जोड़ने के बाद कंपनी करीब 30 SKUs तक पहुंचना चाहती है.
फिलहाल फोकस न्यूबॉर्न पर है, लेकिन प्लान बच्चों की उम्र के साथ प्रोडक्ट रेंज बढ़ाने का है. कंपनी छह महीने से एक साल और फिर पांच साल तक की उम्र के बच्चों के लिए प्रोडक्ट्स विकसित करना चाहती है.
विदेशी बाजार में भी एंट्री की तैयारी है. कुछ साल बाद मिडिल ईस्ट में दुबई से शुरुआत करने का प्लान है. इसके लिए EN71 टॉय सेफ्टी सर्टिफिकेशन हासिल करने की दिशा में काम किया जा रहा है. आगे कंपनी UK और US जैसे बाजारों में जाने की योजना रखती है.
अगला बड़ा पड़ाव 1 करोड़ रुपये की मंथली रेवेन्यू तक पहुंचना है. इसके बाद चार साल में nübo को 200 करोड़ रुपये की बेबी प्रोडक्ट कंपनी बनाना लक्ष्य है.
आदित्य चोपड़ा की कहानी का सबसे बड़ा सबक सिर्फ यह नहीं है कि नौकरी छोड़कर बिजनेस किया जा सकता है. असली बात यह है कि उन्होंने एक ऐसी कैटेगरी चुनी जिसमें पैरेंट्स की चिंता सीधे प्रोडक्ट की वैल्यू से जुड़ती है.
बेबी प्रोडक्ट खरीदते समय ग्राहक सिर्फ डिजाइन या कीमत नहीं देखता. सेफ्टी, मटेरियल, सर्टिफिकेशन और बच्चे के डेवलपमेंट से जुड़ी उपयोगिता भी फैसला बदल सकती है. यही वजह है कि nübo ने बड़े शहरों के बजाय छोटे शहरों से मिल रही मांग को अपने बिजनेस मॉडल का अहम संकेत माना है.
हालांकि 200 करोड़ रुपये का लक्ष्य अभी कंपनी का भविष्य का टारगेट है, मौजूदा 20,000 से ज्यादा ऑर्डर, 700 से अधिक शहरों की पहुंच और करीब 25 फीसदी मंथली रेवेन्यू ग्रोथ यह दिखाती है कि शुरुआती प्रोडक्ट-मार्केट फिट के संकेत जरूर मिल रहे हैं.
अपनी राय और अपने इलाके की खबर देने के लिए जुड़ें हमारे गूगल, फेसबुक, x, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सऐप कम्युनिटी से.