बिजनेस
Foods startup entrepreneurship success story: स्टील बिजनेस छोड़ मसालों में उतरे आकाश अग्रवाल को 30 करोड़ का नुकसान हुआ. कंपनी लगभग Zero पर पहुंची, लेकिन ईकॉमर्स के सहारे 4 साल में 150 करोड़+ रेवेन्यू तक पहुंच गई. कभी हीरो बनने निकले आकाश की चलिए सक्सेस स्टोरी पढ़ते हैं.
आकाश अग्रवाल की कहानी की सबसे दिलचस्प बात यह नहीं है कि उन्होंने मसालों का ब्रांड बनाया. असली कहानी उस दौर की है जब खुद की बनाई कंपनी के बारे में किसी के सवाल से भी वह बचना चाहते थे. एक वीडियो में आकाश ने अपनी यह जर्नी बताई है. उनके मुताबिक 2018 में उन्होंने अपने पिता का स्टील बिजनेस छोड़कर मसालों के कारोबार में कदम रखा. शुरुआत में सपना बड़ा था और कंपनी को तेजी से देशभर में ले जाने की कोशिश हुई. लेकिन यही तेजी बाद में सबसे बड़ी समस्या बन गई.
आकाश के मुताबिक कंपनी ने 17 राज्यों में एंट्री की और लगभग 300 लोगों की सेल्स टीम खड़ी कर दी. मार्केटिंग और ऑफलाइन विस्तार पर भी भारी पैसा लगाया गया. नतीजा यह हुआ कि करीब तीन साल में लगभग 30 करोड़ रुपये का नुकसान हो गया. 2021 तक हालात इतने खराब हो चुके थे कि आकाश के मुताबिक एक फैमिली फंक्शन में जाने तक में उन्हें डर लगता था कि कोई बिजनेस का हाल न पूछ ले.
यह हिस्सा नौकरीपेशा और छोटे कारोबारियों के लिए भी महत्वपूर्ण है. बिजनेस का नुकसान सिर्फ बैलेंस शीट में नहीं दिखता, उसका असर आत्मविश्वास और परिवार के सामने जवाब देने की हिम्मत पर भी पड़ता है.
ZOFF की शुरुआती रणनीति जनरल ट्रेड यानी ऑफलाइन दुकानों के जरिए तेजी से विस्तार करने की थी. उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी ने करीब 20 राज्यों तक विस्तार किया और कोविड के दौरान अपनी लगभग 350 लोगों की सेल्स टीम को छोड़ना पड़ा. कंपनी ने इस दौर में करीब 30 करोड़ रुपये गंवाए थे.
आकाश ने बाद में अपनी सबसे बड़ी गलती को इसी तेज विस्तार से जोड़ा. उनके मुताबिक पहले यह साबित करना चाहिए था कि एक बाजार में मॉडल काम कर रहा है, उसके बाद उसे कई राज्यों में दोहराना चाहिए. यानी समस्या सिर्फ यह नहीं थी कि कंपनी ने पैसा खर्च किया. असली समस्या यह थी कि जिस मॉडल की पूरी तरह जांच नहीं हुई थी, उसे बहुत तेजी से बड़ा कर दिया गया.
आज के छोटे कारोबारी के लिए यही सबसे बड़ा सबक है. अगर किसी प्रोडक्ट की एक शहर में मांग साबित नहीं हुई है तो 10 शहरों में दुकान या टीम खड़ी करने से बिक्री अपने आप नहीं बढ़ती. पहले मॉडल, फिर स्केलिंग.
मुश्किल दौर में आकाश के सामने दो रास्ते थे. वह यह सोचते रहते कि ऐसा उनके साथ क्यों हुआ या फिर यह पता लगाते कि अब इसे बदला कैसे जाए. उन्होंने दूसरा रास्ता चुना.
यहीं से ZOFF के बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव आया. कंपनी ने ऑफलाइन पर निर्भरता कम करके ईकॉमर्स और डिजिटल बिक्री पर ध्यान बढ़ाया. आकाश के मुताबिक पैसे के इस्तेमाल को लेकर भी कंपनी ज्यादा सावधान हुई और फाउंडर खुद बिजनेस के करीब आए.
आकाश ने अपनी हालिया लिंक्डइन पोस्ट में भी 2021 के उस दौर को याद करते हुए बताया कि लगभग 30 करोड़ रुपये के नुकसान के बाद कंपनी ने ईकॉमर्स की तरफ रुख किया और धीरे-धीरे वापसी की. उनके मुताबिक चार साल बाद कंपनी 150 करोड़ रुपये के रेवेन्यू के पार पहुंच गई.
यही बदलाव इस कहानी को सिर्फ एक मसाला कंपनी की कहानी नहीं रहने देता. यह बताता है कि कई बार कारोबार को बचाने के लिए ज्यादा पैसा लगाने की नहीं, बल्कि पैसा लगाने का तरीका बदलने की जरूरत होती है.
ZOFF की कहानी में अगला बड़ा पड़ाव शार्क टैंक इंडिया रहा. कंपनी की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक ZOFF को शार्क टैंक इंडिया सीजन 2 से जुड़ाव मिला और बाद में जेएम फाइनेंशियल का समर्थन भी मिला.
कंपनी ने इसके बाद सीरीज ए फंडिंग में 40 करोड़ रुपये जुटाए. 2026 में इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक ZOFF ने जेएम फाइनेंशियल से करीब 2 मिलियन डॉलर की फंडिंग भी जुटाई थी और ईकॉमर्स तथा ऑफलाइन वितरण को मजबूत करने की योजना बताई थी. कंपनी ने वित्त वर्ष 2025 में 103 करोड़ रुपये का रेवेन्यू दर्ज किया था.
यहां एक दिलचस्प बदलाव दिखाई देता है. जिस कंपनी ने कभी ऑफलाइन विस्तार में भारी नुकसान झेला, वही बाद में ऑफलाइन को पूरी तरह छोड़ने के बजाय डिजिटल, क्विक कॉमर्स और ऑफलाइन चैनलों को संतुलित करने की दिशा में बढ़ी. यानी कमबैक का मतलब पुराने मॉडल को फिर से जस का तस अपनाना नहीं था. कमबैक का मतलब गलतियों से सीखकर नया मॉडल बनाना था.
ZOFF ने सिर्फ मसालों को बेचने पर भरोसा नहीं किया. कंपनी ने कूल ग्राइंडिंग तकनीक, साफ प्रोसेसिंग और जिप लॉक पैकेजिंग जैसे पहलुओं को अपनी ब्रांड पहचान का हिस्सा बनाया. कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक उसका फोकस शुद्धता, ताजगी और आधुनिक प्रोसेसिंग पर रहा है.
यह रणनीति ऐसे बाजार में महत्वपूर्ण है जहां ग्राहक अक्सर मसालों को सिर्फ कीमत और स्वाद के आधार पर चुनता है. आकाश की कंपनी ने इसी जगह भरोसे और पैकेजिंग को भी प्रोडक्ट का हिस्सा बनाने की कोशिश की.
आउटलुक बिजनेस के मुताबिक ZOFF की रायपुर फैक्ट्री में तकनीक आधारित मैन्युफैक्चरिंग और क्लीन प्रोसेसिंग पर जोर दिया गया है. रिपोर्ट के अनुसार कंपनी के 300 से ज्यादा कर्मचारियों में 50 से 60 फीसदी महिलाएं हैं. यानी इस कहानी का असर सिर्फ कंपनी के रेवेन्यू तक सीमित नहीं है. एक स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस किस तरह रोजगार और सप्लाई चेन भी तैयार कर सकता है, यह उसका दूसरा पहलू है.
आकाश अग्रवाल की कहानी में सबसे उपयोगी बात 150 करोड़ रुपये का आंकड़ा नहीं है. असली सीख उस 30 करोड़ रुपये के नुकसान में छिपी है. कंपनी ने पहले विस्तार को सफलता का पर्याय मान लिया. ज्यादा राज्य, बड़ी सेल्स टीम और ज्यादा मार्केटिंग खर्च से बिजनेस अपने आप मजबूत नहीं हुआ. जब मॉडल बदला गया और ईकॉमर्स पर ध्यान आया, तब वही कारोबार दोबारा खड़ा होने लगा.
आकाश ने जो चार पिलर बताए हैं, उनमें मजबूत माइंडसेट, पैसे का सही इस्तेमाल, सही लोगों की कंपनी और फाउंडर का अपने बिजनेस पर कंट्रोल शामिल हैं. छोटे कारोबारी के लिए इसका सीधा मतलब है कि हर ग्रोथ अच्छी ग्रोथ नहीं होती. अगर बिक्री बढ़ रही है लेकिन हर नई बिक्री के साथ नुकसान भी बढ़ रहा है तो कारोबार वास्तव में मजबूत नहीं हो रहा.
इसी तरह फंडिंग मिल जाना भी सफलता की गारंटी नहीं है. पैसा मिलने के बाद अगर बिजनेस मॉडल साफ नहीं है तो बड़ा निवेश नुकसान को सिर्फ बड़ा कर सकता है. ZOFF की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि यहां कमबैक किसी एक फंडिंग राउंड या शार्क टैंक के बाद नहीं हुआ. पहले गलती पहचानी गई, फिर बिजनेस मॉडल बदला गया और उसके बाद स्केलिंग की गई.
यही शायद इस पूरी कहानी का सबसे उपयोगी संदेश है. बिजनेस में कभी कभी सबसे महंगा सबक वही होता है जो सबसे ज्यादा पैसा गंवाने के बाद मिलता है. लेकिन अगर फाउंडर उस सबक को अगली रणनीति में बदल दे तो वही नुकसान भविष्य की सबसे बड़ी सीख भी बन सकता है.
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