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भारत का 'मिनी लंदन' कहलाता है ये शहर, जहां सुकून का बिजनेस कर करोड़ों कमा रहे लोग; एक अनोखे आइडिया से चमकी किस्मत

A lucrative formula for earning lies in this small village in Jharkhand: झारखंड का एक छोटा सा कस्बा, मैकलुस्कीगंज जिसे 'मिनी लंदन' भी कहा जाता है, आज रूरल टूरिज्म और होमस्टे के दम पर एक आत्मनिर्भर इकोनॉमी बन चुका है. 1933 में शुरू हुई यह बस्ती आज लोगों को मानसिक शांति और रोजगार दोनों दे रही है.

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भारत का 'मिनी लंदन' कहलाता है ये शहर, जहां सुकून का बिजनेस कर करोड़ों कमा रहे लोग; एक अनोखे आइडिया से चमकी किस्मत

भारत के 'मिनी लंदन' में मेंटल पीस बेचकर खड़ी की करोड़ों की इकोनॉमी (फोटो एआई)

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Mccluskieganj mini london tourism model: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग जहां एक तरफ डिप्रेशन और मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग इसी तनाव का इलाज बेचकर अपना पूरा घर चला रहे हैं. क्या आपने कभी सोचा है कि सिर्फ 'शांति' और 'गांव का माहौल' किसी जगह की पूरी तकदीर बदल सकता है? झारखंड टूरिज्म विभाग की रिपोर्ट बताती है कि यहां की वादियों में बसा एक छोटा सा कस्बा इन दिनों देश के लिए रूरल टूरिज्म का सबसे बड़ा मॉडल बनकर उभरा है.

इसे लोग 'मिनी लंदन' के नाम से जानते हैं. साल 1933 में एंग्लो-इंडियंस के रहने के लिए बसाया गया यह इलाका आज सिर्फ एक ऐतिहासिक धरोहर नहीं रह गया है, बल्कि यह लोकल लोगों के लिए कमाई का एक बहुत बड़ा जरिया बन चुका है. आइए समझते हैं कि कैसे इस कस्बे ने 'मेंटल पीस' को एक मुनाफे वाले बिजनेस मॉडल में बदल दिया और इससे आम लोगों की जिंदगी कैसे बदल रही है.

1933 का वो सपना जो आज बना है पक्का बिजनेस मॉडल

इस कहानी की शुरुआत आज से करीब नौ दशक पहले 1933 में हुई थी, जब कोलोनाइजेशन सोसाइटी ऑफ इंडिया के तहत अर्नेस्ट टिमोथी मैकलुस्की ने इस जगह को एंग्लो-इंडियन कम्युनिटी के लिए बसाने का सपना देखा था. इसे 'मैकलुस्कीगंज' नाम दिया गया. उस दौर में बने बँगले और यूरोपियन स्टाइल के घर आज भी यहां की पहचान हैं. लेकिन वक्त बदला और यहां के पुराने लोग धीरे-धीरे पलायन कर गए. कई सालों तक यह जगह सुनसान पड़ी रही.

कोलोनाइजेशन सोसाइटी ऑफ इंडिया के ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार असली बदलाव तब आया जब लोगों ने इन पुराने और खाली पड़े बंगलों को होमस्टे में बदलना शुरू किया. जो विरासत कभी इतिहास के पन्नों में खोने वाली थी, उसे आज के युवाओं ने एक बेहतरीन बिजनेस टूल बना दिया है. आज यह जगह पुरानी यादों और आधुनिक सुख-सुविधाओं का एक ऐसा कॉम्बिनेशन बन चुकी है, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से लोग खिंचे चले आ रहे हैं.

रूरल टूरिज्म की नई परिभाषा: होमस्टे और लोकल कारोबार से बदली तस्वीर

आमतौर पर टूरिज्म का मतलब होता है बड़े-बड़े होटल्स, पक्के रास्ते और चकाचौंध. लेकिन इस 'मिनी लंदन' ने इस सोच को पूरी तरह से बदल दिया है. यहां आने वाले सैलानी किसी फाइव स्टार होटल में ठहरने के बजाय मिट्टी की खुशबू, स्थानीय भोजन और पुराने बंगलों में वक्त बिताना पसंद करते हैं.

लोकल लोगों ने अपने घरों के खाली कमरों को होमस्टे में कनवर्ट कर लिया है. इससे न सिर्फ पर्यटकों को कम बजट में रहने की जगह मिल जाती है, बल्कि स्थानीय परिवारों को हर महीने एक बंपर और बंधी-बंधाई इनकम भी मिल रही है. इसके साथ ही लोकल गाइड, ट्रेडिशनल खाना बनाने वाले रसोइये और खेतों से सीधे ताजी सब्जियां बेचने वाले किसानों की भी सीधे तौर पर चांदी हो रही है.

जब मानसिक शांति बन गई एक सफल और बड़ा बिजनेस

आज के दौर में सबसे महंगी चीज क्या है? इसका सीधा जवाब है- सुकून. इस कस्बे के टूरिज्म मॉडल ने इसी बात को बहुत बारीकी से पकड़ा है. कंक्रीट के जंगलों और शहरों के शोर से परेशान लोग यहां सिर्फ वीकेंड बिताने नहीं आते, बल्कि वे यहां 'मेंटल डिटॉक्स' के लिए आते हैं.

यहां के घने जंगल, साफ हवा और शांत वातावरण को सैलानियों के सामने एक थेरेपी की तरह पेश किया जा रहा है. सुबह पक्षियों की चहचहाहट के साथ उठना और शाम को पहाड़ों के पीछे ढलते सूरज को देखना- यही वो प्रोडक्ट है जिसे आज का टूरिस्ट खरीदना चाहता है. मैकलुस्कीगंज के लोगों ने इस नेचुरल ब्यूटी को बिना नुकसान पहुंचाए इसे एक बेहतरीन और सस्टेनेबल बिजनेस में तब्दील कर दिया है.

रोजगार के नए अवसर हो रहे डेवलप

इस पूरे इकोसिस्टम का सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि इसमें किसी बाहरी बड़ी कंपनी का एकाधिकार नहीं है. यहां होने वाली कमाई का सीधा हिस्सा स्थानीय निवासियों की जेब में जाता है. पहले जहां यहां के युवाओं को रोजगार की तलाश में बड़े शहरों का रुख करना पड़ता था, वहीं अब वे अपने ही घर में रहकर टूरिज्म बिजनेस के जरिए सम्मानजनक कमाई कर रहे हैं.

किराने की दुकान चलाने वाले से लेकर ऑटो रिक्शा चलाने वाले तक, हर कोई इस चेन से जुड़ा हुआ है. सैलानियों के आने से स्थानीय कला, हस्तशिल्प और पारंपरिक व्यंजनों की मांग में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिससे महिलाओं को भी घर बैठे आत्मनिर्भर बनने का मौका मिल रहा है.

क्या है इस मॉडल की सबसे बड़ी सीख

झारखंड का यह छोटा सा कस्बा आज पूरे देश के सामने एक मिसाल है. यह साबित करता है कि टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए हमेशा बड़ी-बड़ी इमारतों या सरकारी बजट की जरूरत नहीं होती. अगर आपके पास कोई ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, प्राकृतिक सुंदरता या सिर्फ शांत माहौल भी है, तो आप उसे एक बेहतरीन रूरल टूरिज्म मॉडल में बदल सकते हैं. जरूरत है तो बस अपनी जड़ों को पहचानने की और उसे आधुनिक दुनिया की जरूरतों के हिसाब से पेश करने की.

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