बिजनेस
एक समय में नौकरी ढूंढने वाले शशि धरन आज अपने साथ 100 से ज्यादा कर्मचारियों को रोजगार दे रहे हैं, जो सीधे तौर पर 100 परिवारों की आजीविका चलाना है.
नौकरी में सीमित सैलरी और धीमी तरक्की के बीच बस यही ख्याल आता है कि अपना काम शुरू कर लें, लेकिन पैसों की कंपनी असफलता का डर और रिस्क की बात सोचकर कुछ लोग वहीं काम करते रहते हैं, लेकिन जिन लोगों को पास हौसला और सही सोच होती है. वे इन सभी परेशानियों के बीच भी छोटी सी शुरुआत कर बड़ा मुकाम हासिल कर लेते हैं. तमिलनाडु के कोयंबटूर के रहने वाले 34 वर्षीय शशि धरन भी उन्हीं में से एक हैं, लेकिन उनकी कहानी उन तमाम युवाओं के लिए एक आंखें खोल देने वाला जवाब है, जो संसाधनों की कमी का बहाना बनाकर अपने सपनों को टालते रहते हैं.
तमिलनाडु के 34 वर्षीय शशि ने महज 9000 रुपये की मामूली सैलरी से नौकरी की शुरुआत की थी. मैकेनिकल इंजीनियर होने के साथ खूब मेहनत करने के बाद वे सालों बाद 60,000 रुपये की सैलरी तक पहुंचे इसबीच नौकरी से परेशान होकर शशि ने बिना किसी बड़े इंवेस्टर के घर के 1000 स्क्वायर फीट के बेसमेंट से एक ऐसा इनोवेटिव बिजनेस शुरू किया, जो आज 8 करोड़ का टर्नओवर दे रहा है, लेकिन इस कामयाबी की सबसे बड़ी सीख यह है कि सफलता के लिए किसी बड़े आइडिया से ज्यादा जरूरी सही समय पर मांग पहचानना और कदम उठाना है.
करियर के शुरुआती दौर में शशि धरन को सिर्फ 9000 की नौकरी मिली थी. मेहनत से वे 60,000 की मंथली सैलरी तक पहुंचे, लेकिन उनका ध्यान हमेशा इस बात पर था कि भारतीय फूड और रिटेल मार्केट में तेजी से क्या बदल रहा है. आखिरकार 2020 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और बिजनेस की दुनिया में कदम रखा. शशि ने कुल 6 लाख रुपये की शुरुआती पूंजी से काम शुरू किया. इसमें 2 लाख रुपये की अपनी बचत थी और 4 लाख रुपये सरकार की PMEGP (प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम) लोन योजना से लिये थे.
शुरुआत में शशि की कंपनी 'कोवई कियोस्क' (Kovai Kiosk) सिर्फ होटलों और रेस्टोरेंट के लिए भारी-भरकम किचन इक्विपमेंट बनाती थी. काम चल तो रहा था, लेकिन कोई बड़ा आॅर्डर नहीं मिल रहा था, लेकिन वे लगे रहे. असली बदलाव साल 2022 में आया, जब एक लोकल वेंडर ने शशि से 1.8 लाख में फिश फ्राई बेचने के लिए एक कस्टमाइज्ड मोबाइल कियोस्क फूड स्टॉल बनाने को कहा. शशि ने अपनी इंजीनियरिंग स्किल्स का इस्तेमाल कर बेहद आकर्षक और टिकाऊ कियोस्क तैयार किया. वह स्टॉल सिर्फ एक ढांचा नहीं था, बल्कि किसी भी नये स्ट्रीट-फूड बिजनेसमैन के लिए एक चलता-फिरता आउटलेट बन गया. इसके बाद देखते ही देखते उन्हें ऐसे कस्टमाइज्ड कियोस्क के सैकड़ों ऑर्डर मिलने लगे. हाल ही में उनकी कंपनी ने 60 लाख रुपये का एक विशाल कियोस्क प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक पूरा किया है.
जिस काम की शुरुआत घर के बेसमेंट में सिर्फ 2 लोगों से हुई थी, वह आज 80,000 स्क्वायर फीट की विशाल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में बदल हो चुका है. शशि की कंपनी अब सिर्फ फूड स्टॉल ही नहीं, बल्कि आधुनिक पोर्टेबल कैप्सूल हाउस भी बना रही है. ये ऐसे मॉडर्न रेडीमेड घर होते हैं, जिन्हें कुछ ही घंटों में कहीं भी असेंबल या शिफ्ट किया जा सकता है. आजकल इको-टूरिज्म, रिसॉर्ट्स और फार्महाउस मालिकों के बीच यह कैप्सूल हाउस काफी लोकप्रिय हो रहे हैं.
आज शशि की कंपनी सिर्फ एक ही प्रोडक्ट पर काम नहीं करती है. उनकी कंपनी की कमाई में 60 प्रतिशत हिस्सा पोर्टेबल कियोस्क से आता है. वहीं 20 प्रतिशत कमर्शियल किचन इक्विपमेंट से आता है. बाकी 20 प्रतिशत पोर्टेबल कैप्सूल हाउस बनाकर आता है. वे अपने इन दोनों प्रोडक्ट्स का धीरे धीरे विस्तार कर रहे हैं. आज JSW स्टील से लेकर HCL और वंडरला (Wonderla) जैसी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियां भी आज इनकी क्लाइंट लिस्ट में शामिल हैं.
बिजनेसमैन का टर्नओवर देखकर तो हर कोई आकर्षित हो जाता है, लेकिन यह रातों रात खड़ा नहीं होता. इसे बनाने के लिए दिन रात एक करनी पड़ती है. इसके साथ ही इस टर्नओवर के पीछे की वित्तीय कड़वी सच्चाई छिपी होती है. शशि की कहानी में भी एक ऐसा ही पहलू उनकी पत्नी धनु, जो खुद आईटी कंपनी में नौकरी करने के साथ ही अपनी सैलरी से पति के बिजनेस में सहारा देती रही. बिजनेस शुरू करने के डेढ़ साल बाद तक कोवई कियोस्क से कोई खास मुनाफा नहीं हो रहा था. इस दौरान धनु जो अपनी पूरी सैलरी से घर का खर्च भी चलाती थीं और कंपनी के कर्मचारियों को तनख्वाह भी बांटती थीं. इसी से उन्होंने अपना बड़ा बिजनेस खड़ा किया.