बिजनेस
Cafe Delhi Heights success story: जिस कैफे के शुरुआती नौ महीनों में 90 दिन तक एक भी बिल नहीं कटा, वही कैफ़े दिल्ली हाइट्स (Cafe Delhi Heights) आज 17 शहरों में 50 से ज्यादा आउटलेट वाला ब्रांड है. विक्रांत बत्रा की कहानी बताती है कि बिजनेस में धैर्य, अनुशासन और भरोसा क्यों जरूरी है.
बिजनेस शुरू करते समय सबसे बड़ा डर अक्सर पैसा नहीं, बल्कि यह होता है कि अगर ग्राहक ही नहीं आए तो क्या होगा. विक्रांत बतरा की कहानी इसी डर को सामने रखती है. जोश टॉक्स के वीडियो में कैफे दिल्ली हाइट्स के को-फाउंडर विक्रांत बत्रा ने अपनी उद्यमी यात्रा साझा की है.
वह बताते हैं कि 2011 में जब उन्होंने कैफे दिल्ली हाइट्स शुरू किया, तब शुरुआती नौ महीने आसान नहीं थे. इनमें 90 दिन ऐसे भी रहे जब एक भी बिल नहीं कटा. रात करीब 12 बजे तक बालकनी में खड़े होकर वह इस इंतजार में रहते थे कि कोई ग्राहक आए और एक बिल कटे.
आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. जोश टॉक्स के मुताबिक कैफे दिल्ली हाइट्स की मौजूदगी 17 शहरों में है और 50 से ज्यादा आउटलेट तक पहुंच चुकी है. Fortune India की मई 2026 की रिपोर्ट भी ब्रांड के 50 से अधिक आउटलेट और 17 शहरों में विस्तार की पुष्टि करती है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह सफर सिर्फ रेस्टोरेंट खोलने की कहानी नहीं है. यह उस दौर की कहानी है जब एक कारोबारी को लंबे समय तक बिना नतीजे के काम करते रहना पड़ा.
Vikrant Batra जिस परिवार से आते हैं, वहां बिजनेस की शुरुआत भी संघर्ष से हुई थी. उनके माता-पिता ने 1700 रुपये के लोन से अपना कारोबार शुरू किया था. बचपन से ही उन्होंने परिवार को बिजनेस की मुश्किलों और मेहनत के बीच काम करते देखा. यही अनुभव आगे चलकर उनके काम की बुनियाद बना. परिवार का कारोबार बैंक्वेट और केटरिंग से जुड़ा था. विक्रांत भी कम उम्र से ही इस काम से जुड़े रहे.
उनके लिए रेस्टोरेंट कारोबार बाहर से दिखने वाली चमक-दमक का नाम नहीं था. इसके पीछे खाना, कर्मचारी, सप्लाई, ग्राहक, लॉजिस्टिक्स और लगातार कई घंटे काम करने की हकीकत थी. फॉर्च्यून इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार केटरिंग ने बत्रा को ऑपरेशंस, लॉजिस्टिक्स, पीपल मैनेजमेंट और प्रेशर से निपटने का ग्राउंड एक्सपीरियंस दिया. यही एक्सपीरियंस बाद में कैफे दिल्ली हाइट्स के ऑर्गेनाइज्ड रेस्टोरेंट मॉडल में काम आया.
Vikrant Batra की कहानी का एक ऐसा हिस्सा है जो किसी भी नए कारोबारी को रेस्टोरेंट बिजनेस की असली तस्वीर दिखाता है. शादियों के सीजन में वह कई-कई महीने घर से दूर रहते थे. कई बार उनकी रात अपनी Scorpio गाड़ी में ही गुजरती थी. काम खत्म होने के बाद घर लौटने की बजाय अगले कार्यक्रम के लिए वहीं रुकना पड़ता था. यह अनुभव इसलिए भी महत्व रखता है क्योंकि आज जब रेस्टोरेंट बिजनेस बाहर से ग्लैमरस दिखाई देता है, उसके पीछे कितनी मेहनत होती है, यह आम ग्राहक को दिखाई नहीं देती.
विक्रांत का संदेश यही है कि अगर कोई व्यक्ति फूड या रेस्टोरेंट बिजनेस में उतरना चाहता है तो उसे पहले जमीन पर काम समझना चाहिए. वेटर, शेफ और मैनेजर के काम को समझे बिना सिर्फ पैसा लगाकर रेस्टोरेंट खोलना जोखिम भरा हो सकता है. वह ज़मीनी स्तर का अनुभव को अहम बताते हैं.
2011 में विक्रांत बत्रा ने केटरिंग के पारिवारिक कारोबार से अलग होकर एक
संगठित व्यवसाय खड़ा करने का फैसला किया. यह फैसला ऐसे समय में आया जब खानपान का काम चल रहा था, लेकिन उसे बड़े पैमाने पर आगे बढ़ने की सीमा भी दिखाई दे रही थी.
उन्होंने गुड़गांव में कैफे दिल्ली हाइट्स का पहला आउटलेट शुरू किया. शुरुआत क्रॉस पॉइंट मॉल से हुई थी. फॉर्च्यून इंडिया के अनुसार, यह वही व्यवसाय था जिसे बत्रा ने खानपान की सीमा से आगे ले जाने के लिए शुरू किया था.
परिवार की तरफ से भारतीय रेस्तरां खोलने जैसी सलाह भी मिली, लेकिन विक्रांत का विचार कुछ अलग था. वह ऐसा कैफे बनाना चाहते थे जहां अलग-अलग उम्र और पसंद के लोग एक साथ आ सकें.
कैफे दिल्ली हाइट्स की एक अहम सोच यही बनी कि दादा, पिता और पोता एक ही जगह मुस्कुराते हुए अपनी-अपनी पसंद का खाना खा सकें. 2025 में प्रकाशित बिजनेस ऑफ फूड की रिपोर्ट में भी इस परिवार-उन्मुख अवधारणा को ब्रांड की शुरुआती सोच का हिस्सा बताया गया है.
यहीं से बिजनेस का एक छिपा हुआ सबक सामने आता है. केवल खाना अच्छा होना काफी नहीं है. ग्राहक किस तरह की जगह पर बार-बार लौटना चाहता है, यह समझना भी उतना ही जरूरी है.
पहले आउटलेट की मुश्किलों के बाद कहानी ने धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ी. Cafe Delhi Heights ने ऐसा format तैयार किया जिसमें कैजुएल डायनिंग, परिवारों के लिए माहौल और अलग-अलग तरह के भोजन के चुनाव को साथ रखा गया.
विक्रांत के मुताबिक 2011 में भारत में रेस्टोरेंट आमतौर पर दोपहर और रात के तय समय के बीच चलते थे. Cafe Delhi Heights ने all-day cafe का विचार अपनाया, यानी लोग दिन के अलग-अलग समय पर वहां आ सकें.
यह मॉडल अपने समय में अलग था. 2011 में शुरू हुए पहले आउटलेट से आगे बढ़ते हुए ब्रांड ने कई शहरों में विस्तार किया. 2025 की Business of Food रिपोर्ट में 48 आउटलेट और 17 शहरों का आंकड़ा दिया गया था, जबकि 2026 की Fortune India रिपोर्ट में यह संख्या 50 से अधिक आउटलेट और 17 शहरों तक पहुंचने की जानकारी देती है. यानी असली बदलाव सिर्फ आउटलेट की संख्या बढ़ाने में नहीं था. एक ऐसा format तैयार करना था जिसे दूसरे शहरों में भी दोहराया जा सके.
जब कारोबार पटरी पर आ चुका था, तभी कोविड महामारी ने रेस्टोरेंट इंडस्ट्री को जोरदार झटका दिया. आउटलेट बंद हुए, ग्राहक घरों में रहे और hospitality sector के सामने नकदी बचाए रखने की बड़ी चुनौती आ गई.
विक्रांत के लिए यह दौर भी आसान नहीं था. Josh Talks में वह बताते हैं कि संकट के दौरान उन्होंने अपनी property बेचकर vendors का पैसा चुकाया. यानी कारोबार बंद होने के बावजूद जिन लोगों से कंपनी का लेनदेन था, उनके भुगतान को प्राथमिकता दी. यह फैसला बिजनेस के लिहाज से भी बड़ा सबक देता है. किसी कारोबार की असली साख केवल तब नहीं बनती जब बिक्री अच्छी हो. मुश्किल समय में कर्मचारियों, वेंडर और पार्टनर के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है, उससे भी भविष्य का भरोसा तय होता है.
कोविड के दौरान कैफे दिल्ली हाइट्स ने कॉन्टैक्टलेस ट्रांजैक्शन और डिलीवरी जैसे तरीकों का भी इस्तेमाल किया था। इंडियन एक्सप्रेस की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, लॉकडाउन के दौरान कंपनी ने कई आउटलेट से डिलीवरी शुरू की और कॉन्टैक्टलेस ऑर्डरिंग तथा पेमेंट जैसे ऑप्शन अपनाए.
Vikrant Batra की कहानी में discipline का हिस्सा भी काफी अहम है. Josh Talks के वीडियो के मुताबिक उन्होंने 2011 से 2018 तक एक भी weekly off नहीं लिया. यह बात किसी नए कारोबारी के लिए खास तौर पर मायने रखती है. बिजनेस शुरू करना सिर्फ investment का सवाल नहीं है. शुरुआती वर्षों में मालिक को product, customer, staff, supplier और cash flow, हर चीज पर नजर रखनी पड़ सकती है.
हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि हर entrepreneur को बिना छुट्टी लगातार काम करना चाहिए. असली सीख discipline की है. काम को system में बदलना, quality बनाए रखना और मुश्किल समय में भी consistency बनाए रखना लंबे समय में ज्यादा महत्वपूर्ण है.
एक दिलचस्प बात यह भी है कि Cafe Delhi Heights का सफर पूरी तरह बाहरी फंडिंग के सहारे नहीं बना. Fortune India ने अप्रैल 2026 में इसे bootstrapped और profitable restaurant chain के तौर पर रिपोर्ट किया.
आज बहुत से लोग रेस्टोरेंट, कैफे या cloud kitchen शुरू करने का सपना देखते हैं. सोशल मीडिया पर सफल आउटलेट्स और बड़ी कमाई की तस्वीर देखकर यह काम आसान भी लग सकता है. लेकिन विक्रांत बतरा की कहानी उसका दूसरा पक्ष दिखाती है.
पहले ग्राहक का इंतजार, कई महीनों तक संघर्ष, परिवार की अलग राय, कारोबार को scale करने की चुनौती और फिर कोविड जैसी अप्रत्याशित मुसीबत. इन सबके बीच एक बिजनेस को टिकाए रखना किसी एक वायरल आइडिया से नहीं होता.
यही इस कहानी का सबसे बड़ा टेकअवे है. बिजनेस में शुरुआत की असफलता हमेशा अंतिम नतीजा नहीं होती. लेकिन सिर्फ धैर्य रखना भी काफी नहीं है. ग्राहक को समझना, सही बिजनेस मॉडल बनाना, क्वालिटी कायम रखना, खर्च पर नियंत्रण रखना और भरोसेमंद टीम व वेंडर्स के साथ रिश्ता बनाए रखना उतना ही जरूरी है.
विक्रांत बतरा ने Josh Talks में एक सीधा संदेश भी दिया है कि मेहनत और discipline का कोई विकल्प नहीं है. उनके शब्दों में, हाथ तभी मैले होते हैं जब कोई काम करता है. यही सोच एक ऐसे बिजनेस की कहानी को अलग बनाती है जिसने 90 दिन के zero-bill दौर से निकलकर Cafe Delhi Heights जैसा ब्रांड खड़ा किया.
आज उपलब्ध आंकड़ों को देखें तो Cafe Delhi Heights 50 से ज्यादा आउटलेट और 17 शहरों तक पहुंच चुका है. Fortune India के अनुसार FY25 में कंपनी का operating revenue 164 करोड़ रुपये था और FY26 में करीब 200 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान विक्रांत बतरा ने बताया था.
इसलिए विक्रांत बतरा की कहानी का सबसे बड़ा सबक शायद 175 करोड़ रुपये का रेवेन्यू या 50 से ज्यादा outlets नहीं है. असली सबक वह दौर है जब सामने ग्राहक नहीं था, लेकिन कारोबारी फिर भी अगले दिन दुकान खोलकर खड़ा हो जाता था.
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